लिखती तो मैं पहले भी थी (कविता )

लिखती तो मैं पहले भी थी। कभी कुछ छप जाता था। तब खुश हो लेती

थी। कभी लिखे पन्ने रखे-रखे पीले पड़ समय की भीड़ में कहीं खो

जाते थे। पर धन्यवाद ब्लॉग की दुनिया। मन की बातें लिखने के लिए

इतना बड़ा आसमान और इतनी बड़ी धरती दे दी है । ढेरो जाने-

अनजाने पाठक और आलोचक। सबको धन्यवाद।

अब मन की हर बात, हर विचार को जब चाहो लिख डालो। मन में भरे

ख़ज़ाने और उमड़ते-घुमड़ते विचारों को पन्ने पर उतारने की पूरी छूट

है। लिखती तो मैं पहले भी थी, पर अब लिखने में मज़ा आने लगा है।

14 thoughts on “लिखती तो मैं पहले भी थी (कविता )

  1. This line is perfect – “धन्यवाद ब्लॉग की दुनिया। मन की बातें लिखने के लिए
    इतना बड़ा आसमान और इतनी बड़ी धरती दे दी है ।”

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  2. हाँ। बिलकुल सही कहा आपने। लिखने के साथ-साथ ढेरो लोगों के विचार भी पढ़ने का अवसर मिलता है।

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  3. Hi Shammi di! Aap bahut achcha likhti hain. Aapka yeh hidden talent padhkar bahut achcha laga. You express so beautifully. Abhi aur kaafi padhna baaki hai.

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    1. Earlier I was a study material write in Nalanda open University Patna. अब ब्लॉग लिखने में अच्छा लागने लगा है।

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  4. बहुत ही सरल शब्दों के साथ आपने सामान्य मानुष ब्लाग की उपयोगिता का वर्णन किया है,वाकई आप बधाई की पात्र हैं!
    बहुत खूब रेखा जी!
    इस बात से और भी खुशी होती है आप इतना ज़्यादा पढ़ा-लिखा होने के बावजूद अपनी हिन्दी भाषा का इस्तेमाल करती हैं,वरना जिसे देखो हिन्दुस्तानी होने के बावजूद इंग्लीश का मास्टर बना बैठा है!प्रशन हिन्दी में सुनेंगे पर जवाब इंग्लीश में देंगे?

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    1. तारीफ़ के लिये दिल से धन्यवाद. नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर के अनुसार लेखकों को अपने मातृभाषा में लिखना चहिये. मैं भी उनके इस बात से सहमत हूँ.
      पर भाषा को लेखन में बाधक नहीँ बनने देना चहिये. अंग्रेजी की पहुँच हिंदी की अपेक्षा अधिक लोगों तक हैं. विशेष कर हमारे भरत जैसे अनेक भाषा वाले देश में.

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    2. बस आप ऐसे ही लिखते रहिये. अच्छा लिखते हैं आप. साथ ही मेरे आलोचक /क्रिटिक बन कर सुझाव देते रहिये.

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