बगुला भगत ( कहानी )

crane

यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है।

 इस कहानी पर पाठकों के विचार सादर आमंत्रित है।

खूब गोरा रंग, ऊँची कद काठी, तीन भाईयों की प्यारी बहन और माँ-पापा की लाड़ली बेटी थी वैदेही । अगल-बगल की गलियों में ना जाने उसकी कितनी सखी-सहेलियाँ रहतीं थी। उसका सारा दिन सहेलियों के साथ हुड़दंग करने में बीतता। कभी गोलगप्पे, कभी दही भल्ले या आलू टिकिया खाना या फिर छत पर बैठ गप्पें करना उस के पसंदीदा शगल थे। हाँ गप्प के साथ बुनाई और क्रोशिये का काम भी चलता रहता।

रात को जब बड़े भईया और पापा के घर आने का समय होता, वैदेही अपने टेबल पर किताबें खोल कर ऐसा शमा बाँध देती, जैसे सारा दिन पढ़ाई कर रही हो। पर उसके कान और आँखें लगे होते गली की ओर। पहले मंजिल की उसकी कमरे की खिड़की से जैसे ही भैया दूर गली के कोने पर नज़र आते, वह सीढ़ियाँ कूदती-फाँदती दरवाजा खोलने पहुँच जाती। बड़े भईया रोज़ कुछ ना कुछ लिए हुए घर पहुँचते- जलेबी, गर्म समोसे, मिठाईयाँ, फल या चॉकलेट। जो वे हमेशा प्यार से वैदेही को हीं पकड़ाते थे।

उस दिन भईया के हाथों में कुछ ज्यादा हीं सामान था और साथ में था एक नवयुवक – रणजीत। वह भईया के आफिस में काम करता था। भईया और पापा उसके शांत स्वभाव और कर्मठ व्यवहार से बड़े खुश थे। जल्दी हीं वैदेही सारा माज़रा समझ गई। यह सब उसके विवाह की तैयारी थी। वह भी खुश थी, जैसे इस उम्र की हर लड़की शादी के नाम से होती है। दोनों परिवार एक दूसरे से मिले और जल्दी हीं शादी हो गई। विवाह के बाद भईया ने मदद कर रणजीत का अलग व्यवसाय करवा दिया। व्यवसाय बड़ा अच्छा चल निकला।

शादी के बाद, कुछ दिनों में हीं वैदेही को पता चल गया कि रणजीत का शांत स्वभाव, वास्तव में तूफान के पहले की शांती थी। दरअसल वह बड़ा हीं गुस्सैल स्वभाव का था। पीना-पिलाना और देर रात तक ताश खेलना उसके रोज़ के नियम थे। नशे में वह अपना आपा और भी खो देता। रोज़ का झगड़ा और हो हल्ला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। इस बीच वैदेही तीन पुत्रों और एक पुत्री की जननी बन चुकी थी। पापा के गुजर जाने की वजह से उसे भईया-भाभी या माँ को यह सब बताने में हिचक होती थी। उसे यह भी लगता था, शायद समय के साथ रणजीत में सुधार आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

रणजीत को समझाने की वैदेही की कोशिश आग में घी का काम करती। वैदेही को नए कपड़ों और साड़ियों का बड़ा शौक था। हाथ में पैसे आते हीं वह भोला के दुकान से नई-नई साड़ीयाँ खरीद लाती। एक रात नशे में रणजीत ने हद कर दी। गुस्से में रणजीत नें वैदेही के सारी दामी कपड़े और साड़ियाँ इकट्ठे कर आग के हवाले कर दिये। वैदेही बड़े होते बच्चों के सामने तमाशा नहीं करना चाहती थे। पर ये बातें रणजीत की समझ में नहीं आती थीं।

दिन भर खुशमिजाज़ दिखने वाली वैदेही अंदर हीं अंदर घुलती रहती। अपनी सहेलियों को कुछ भी बताने से हिचकती थी। पर दीवारों के भी कान होते हैं। सारा आस पड़ोस बिना टिकट रोज़ का यह नाटक देखता था। एक रात रणजीत ने आने में बहुत देर कर दी। वैदेही का दिल धड़कने लगा। नशे में कहीं कुछ हो तो नहीं गया? लगभग आधी रात रणजीत घर पहुँचा। चिंतित वैदेही उस से देर से आने का कारण पूछने की भूल कर बैठी।
नशे में चूर रणजीत ने गाली-गलौज, हंगामा और झगड़ा शुरू कर दिया । बच्चे आँखें मलते जाग गए। रौद्र रूप धारण किए पति ने वैदेही को धक्के मार कर घर से बाहर कर दिया। बच्चों ने रोकना चाहा। उन सब को भी आधी रात में रणजीत ने घर से बाहर कर दिया। पीने-पिलाने के चक्कर में व्यवसाय का भी बुरा हाल था।

बड़ी होती बेटी और तीन बेटों की माँ आज असहाय अपने घर के बाहर आधी रात के समय लाचार खड़ी थी। दो-चार दिन अपने मायके में रह कर वह वापस लौटी। तब पता चला कि रणजीत को किसी केस की वजह से पुलिस खोज रही है। अतः वह फरार है। रणजीत के ना रहने से घर में शांती तो बहुत थी। पर पैसों के बिना घर चलना मुश्किल हो गया। पर कहते हैं ना कि ईश्वर सब सहने की हिम्मत देता है। एक ही रात में वैदेही के चारो बच्चे जैसे सयाने और समझदार हो गए। चारों ने अपनी योग्यतानुसार जो भी काम मिला करने लगे। वैदेही ने भी बुनाई-कढ़ाई जैसे काम शुरू कर दिये।

उनके पास जो था, जैसा था। उसमें हीं खुश थे। अब उन सब की जिंदगी सुकून भारी थी। तभी अचानक वैदेही की बेटी रौशनी के लिए अपने आप एक अच्छा रिश्ता आया। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शादी की तिथी पास आने लगी। अपने गहने बेच कर वैदेही ने पैसों का इंतज़ाम किया। बेटों ने अपनी-अपनी नौकरी से भी कुछ अग्रिम पैसे ले लिए थे। लड़के वालों की कोई फर्माइश नहीं थी। पर शादी का खर्च तो था हीं।

तभी एक विचित्र बात हुई। अचानक रणजीत घर वापस आ गया। परंतु उसका रूप-रंग बदला हुआ था। वह गेरुए धोती-कुर्ते में था। हाथों में था एक लंबा त्रिशूल, गले में लंबा रुद्राक्ष माला, लालट पर भभूत और पैरों में खड़ाऊँ। चेहरे पर कभी शिकन ना लानेवाली वैदेही को समझ नही आ रहा था कि सन्यासी पति के प्रत्यागमन पर वह रोए या हँसे।

चार बच्चों के साथ, बीच मझधार में वैदेही को अकेले छोड़ देने वाले पति ने उसे बताया कि वह बदल चुका है। अब वह परिवार में बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहता है। जब रात में वह जमीन पर कंबल बिछा कर सोने लगा, तब वैदेही को उस पर दया आ गई। वैदेही ने जानना चाहा कि इतने सालों तक वह कहाँ था। पूरी रात रणजीत अपनी दुख और कष्ट भरी कहानी सुनाता रहा। उसकी कितनी कठिन जिंदगी थी। उस रात नशे में तेज़ चलाते बाईक से दुर्घटना हो गई और उस व्यक्ती की वहीं मृत्यु हो गई। पुलिस से छुपने के कोशिश में वह घर से फरार हो गया।वह पहचाना ना जा सके, इसलिए उसने दाढ़ी-मूंछे बढ़ा ली थीं। भटकते-भटकते वह ईश्वर के द्वार, हरिद्वार पहुँचा। वहाँ वह गंगा तट पर गुरु जी से मिला। वैदेही के साथ किए गए अन्याय और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए बीमारों, कोढ़ियों और गरीबों की सेवा करता रहा इतने वर्षों तक। अब उसने सभी बुरी आदतें छोड़ दीं है।

रणजीत ने अगले दिन से बाज़ार के काम और सब्जियाँ लाने जैसे काम अपने जिम्मे ले लिया। जिंदगी पटरी पर आ गई थी। सभी बड़े खुश थे। बच्चे पिता के बदले रूप और स्वभाव से प्रसन्न थे। वैदेही शादी के कामों में उलझी थी। विवाह की पूर्वसंध्या पर संगीत कार्यक्रम में सभी व्यस्त थे। नाच -गाने का उल्लासपूर्ण माहौल था। तभी वैदेही को उनकी प्रिय सहेली ने इशारे से बुलाया।

वह वैदेही को चुप रहने का इशारा कर आपने साथ पीछे के गैरेज की ओर ले गई। जो प्रायः खाली और बंद पड़ा रहता था। द्वार के दरार से वैदेही ने देखा, रणजीत शराब पीने में व्यस्त है और अपने किसी मित्र से कह रहा है –“ यह मेरा सुरक्षित कमरा है। यहाँ पीने पर किसी को शक नहीं होता है। हाँ, मुझे पैसों की तंगी तो होती है। पर हाट-बाज़ार से पैसे बचा कर बोतल खरीद लाता हूँ। सोचता हूँ, कल रोशनी की बारात आने के ठीक पहले पीने का नाटक कर वैदेही से दस-बीस हज़ार रुपए झटक लूँगा। मैंने उसके पास काफ़ी रुपये देखे हैं।“ गेरुए वस्त्रधारी बगुले भगत का असली रूप देख वैदेही सन्न रह गई। उसे लगा, धरती फट जाये और वह भी सीता की तरह उसमें समा जाये।

उसके चेहरे पर घबराहट छा गई। यह कैसा पिता है, जो अपनी बेटी का शत्रु है। वह गैरेज की ओर आगे बढ़ी। तभी उसकी सहेली ने उसे हाथ पकड़ कर खींच लिया। दोनों ने कुछ बातें की और वैदेही के चेहरे पर कुछ निर्णायक भाव आ गए। अगले दिन शाम में शादी की भीड़-भाड़ अपने सबाब पर थी। दुल्हन बनी रोशनी बड़ी सुंदर लग रही थी। तभी नशे में झूमता रणजीत वैदेही से उज्जड तरीके से शराब खरीदने के लिए पैसे माँगने लगा।

तत्काल वैदेही ने बेटों से कह कर रणजीत के लिए शराब की बोतलें मँगवा दिया । तुरंत पैसे लाने का आश्वासान देते हुई रणजीत को शान्त रहने का निवेदन करने लगी । अपना काम इतनी सरलता से बनता देख रणजीत खुश हो गया और गटागट पीना शुरू कर दिया। वैदेही का तीर ठीक निशाने पर लगा था। थोड़ी देर में रणजीत नशे में चूर हो गया।तीनों बेटों ने उसे चुपचाप पीछे के उसी गैरेज में ड़ाल,बाहर से ताला बंद कर दिया।

रोशनी की शादी उसके अकर्मण्य पिता के अनुपस्थिती में बड़े अच्छे से सम्पन्न हो गया। अगले दिन उसकी बिदाई होने के बाद सभी मेहमानों को बिदा कर वैदेही  गैरेज के पास पहुँची। बेटों ने ताला खोला। रणजीत का नशा उतार चुका था। पर उस की आँखें अभी भी लाल थीं। बिखरे बाल, मुँह से शराब की दुर्गंध उसके चेहरे को कदर्य और भद्दा बना रही थीं।

अपना वार खाली जाते देख बौखलाया रणजीत, पहले की तरह झगड़े और मार-पीट पर उतारू हो गया। पर तभी वहाँ पुलिस आ गई। वैदेही को पुलिस अफसर ने धन्यवाद देते हुए कहा –“ आपने इसकी सूचना हमें दे कर अच्छा किया । बहुत दिनों से पुलिस इसे नशे में एक्सिडेंट करने की वजह से खोज रही थी। हरिद्वार की एक महिला ने भी इस पर केस दर्ज किया है। उस महिला ने बताया कि रणजीत ने हरिद्वार में उस से झूठ बोल कर विवाह किया था। कुछ साल उसके साथ बीताया। कुछ महीनों पहले उसके रुपये और गहने चोरी कर फरार हो गया था।

वैदेही आज बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था, काश वह पहले इतनी हिम्मत जुटा कर रणजीत को अपनी जिंदगी से बाहर कर पाती। 

 

images taken from internet.

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