किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

banaras

नयना का सपरिवार बनारस घूमने का पहला अवसर था। दोनों बेटियों और पति के साथ बड़ी कठिनाइयों से यह कार्यक्रम बन पाया था। सुबह, सबसे पहले गंगा स्नान कर वे चारो विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा-अर्चना किया। बनारस के विभिन्न मंदिरों और पर्यटन स्थलों को घूमने में दो दिन कैसे निकल गए, उसे पता हीं नहीं चला।

यहाँ आ कर नयना को, पिंजरे से आज़ाद परिंदे जैसा अहसास हो रहा था। उसे वापस घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। अतः उसने काशी प्रवास और बढ़ा लिया। काशी आ कर गंगा में नौका विहार नहीं किया तो यात्रा अधूरी होगी। जबकी, उसके पति को रुकने का मन बिलकुल नहीं था।

नयना की शादी कम उम्र में हो गई थी। तब उसकी पढ़ाई भी अधूरी थी। ससुराल वाले और पति उसे काम करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। विशेष कर उसकी जेठानी उसे बड़ा परेशान करती थी। नयना का अकर्मण्य, मोटा पति हितेश, अक्ल से भी मोटा था। अतः भाभी के आँचल के पल्लू से बंधा रहता। भाभी सुगमता से अपने देवर को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती। वह अपनी कमाई से मात्र सौ रुपए नयना को देता और बाकी सारी कमाई माया यानि भाभी के कालिमायुक्त, कलुषित चरणों में चढ़ा देता। ना जाने छोटी कुटिल आँखों वाली कदर्य माया भाभी में नयना के पति को क्या सौंदर्य दिखता था।

तब तक नयना से अनजाने में भूल हो गई। एक-एक कर वह दो पुत्रियों की जननी बन गई। सारा ससुराल उससे नाराज़ हो गया। पुत्रवती भाभी का जादू उसके मूढ़ पति के सर चढ़ कर बोलने लगा। घर का सारा धन और पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे माया को चढ़ावा में चढ़ता गया। नयना जब पति को बेटियों के भविष्य के बारे में समझाना चाहती, उसका पति उसके ऊपर तरह-तरह के दोष मढ़, नयना से नाराज़ हो, माया भाभी के साथ कोप भवन में चला जाता था।

नयना ने जेठ की तरफ एक दो बार आशापूर्ण निगाहों से देखा। पर कुछ काम ना करनेवाले जेठ अपनी पत्नी की योग्यता से बड़े प्रभावित थे। जिसने सोने की अंडा देनेवाली मुर्गी अर्थात नयना के सरकारी पदाधिकारी, पति को अपने वश में कर रखा था। नयना ने जहां भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, कोरे आश्वासन के अलावा कोई मदद नहीं मिली। तब नयना ने सारे अत्याचार, बेटियों के भविष्य की वजह से झेलना स्वीकार कर लिया। नयना ने अपनी पढ़ाई बड़ी कठिनाईयों से पूरी की तथा  नौकरी करने लगी। जिस से बेटियों की पढ़ाई ठीक से चल सके। पर पति और माया भाभी का तोता- मैना प्रेम कथा प्रकरण चलता रहा।

ऐसी  कालिख की कोठारी से दो-तीन दिन के लिए बाहर निकल कर नयना को बड़ी शांती मिल रही थी। मान्यतानुसार शिव की त्रिशूल पर बसा बनारस, शांति और आध्यात्म की नगरी है। जहां ज्योतिर्लिंग, शक्ति पीठ और गंगा एक साथ हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक है। नयना, गलियों में बसे बनारस के अनोखे आकर्षण में उलझ कर रह गई। बनारसी और रेशमी कपड़ों के अद्भुत संसार  जैसे उसे एक नई दुनिया में ले गए । गंगा तट पर सैकड़ो घाट है। नौका विहार के समय नाविक सारे घाटों के बारे में बतला रहा था। तभी नयना के पति को माया भाभी का फोन आया।

किनारे माणिकर्णिका घाट नज़र आ रही थी। जहाँ अनेकों चिताएँ जल रहीं थीं। नयना ने किनारे दिख रहे एक आलीशान भवन के बारे में जानना चाहा। नाविक ने बताया कि यह डोम राजा का महल है। डोम राजा पारंपरिक रूप से शमशान घाट के कर्ता-धर्ता और स्वामी होतें हैं। साथ हीं वे श्मशान में चिताओं को दिया जानेवाली अग्नि के  संरक्षक होते है। उसके अनुमति से अग्नि प्राप्त की जाती है और चिता जलाया जाता है। यह परंपरा राजा हरिश्चंद्र के समय से चल  रही है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार एक चाण्डाल ने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद अपना दास बना लिया था। वह चांडाल मणिकर्णिका घाट का स्वामी था। उसने राजा हरिशचंद्र को इस घाट पर अन्त्येष्टि करने वाले लोगों से “कर” वसूलने का काम दिया था।

जलती चिताओं को देखते हुए, नयना के पति ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि नयना ने पुत्रजननी न बनने का अक्षम्य अपराध किया है। अतः मरने पर उन्हें कोई आग देनेवाला नहीं है। माया भाभी एक बड़ा उपकार करने के लिए तैयार है। नयना और हितेश  के  मरने पर उनकी  चिता को आग माया भाभी अपने पुत्र से दिलवा देगी। बदले में अभी अपनी सारी चल-अचल संपाति माया के पुत्र के नाम करना होगा। माया भाभी चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये। इसलिए हमें तत्काल वापस लौटना होगा।

नयना  और उसकी  युवा बेटियाँ हैरान उस कलुषित हृदय के व्यक्ति का चेहरा देख रहीं  थीं। नयना को  ख़्याल आया कि अभी तो मैं जिंदा हूँ। फिर मेरे अग्नि संस्कार की जल्दी  क्यों? और माया अपने पुत्र से  किराये ले कर  अग्नि दिलवाने के लिए क्यों तैयार है? इसके पीछे मात्र धन की लालसा है या कुछ और सत्य छुपा है ? दो लायक, होनहार और सुंदर इंजीनियर पुत्रियों का पिता इतना निर्दयी, नासमझ और नीच हो सकता है क्या? सिर्फ इसलिए कि वे बेटियाँ हैं? क्या वे बेटियाँ पिता को इस व्यवहार के लिए  क्षमा कर पाएँगी?

कहते हैं जाति और उसके साथ जुटे कर्म, जन्म से प्राप्त होते हैं। पर यहाँ तो अपनी ही स्वार्थी और लालची जननी, माया भाभी ने अपने पुत्र के नये  कर्म  को नियत कर दिया था – एक श्मशान चांडाल की रूप में।नयना ने सोंचा,  अगर अगली बार बनारस दर्शन का अवसर मिला, तब माणिकर्णिका घाट पर या डोम राजा के विशाल प्रासाद के नीचे मायावी माया भाभी का होनहार सुपुत्र चिता में आग देने के लिए, हाथों में अग्नि मशाल ले, किराये का पुत्र बनने को तत्पर दिखेगा। पुत्रविहीन माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए किराये का पुत्र सरलता से उपलब्ध होगा। किराये के बोर्ड पर लिखा होगा उसके किराये के रेट।

***

वर्षों बाद नयना को पुनः बनारस जाने का अवसर मिला है। पुरानी सारी बातें चलचित्र की तरह याद आने लगीं। उसे एक बार पुनः माणिकर्णिका घाट देखने की कामना हो रही थी। वह घाट जहाँ पार्वती जी ने अपने कान की मणी छुपाई थी, ताकि यायावर और घुमक्कड़ शिव उसे खोजतें रहें  और उनके साथ पार्वती को ज्यादा वक्त व्यतित करने का अवसर मिल सकें।

नयना ने अपने मणी का भी यहीं परित्याग किया था। वह पति के साथ उसकी आखरी यात्रा थी। उसके बाद वह बेटियों के साथ उनके नौकरी के स्थान पर चली गई थी और फिर कभी हितेश के पास वापस नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद उड़ती -उड़ती खबरें ज़रूर सुनने में आईं थीं कि माया भाभी ने सारे रुपये और जायदाद ले कर, हितेश को उसके ही घर से बाहर कर दिया था.
अभी वह गलियों से गुजर कर घाट की ओर बढ़ रही थी कि उसके कदम थम गए। दोनों बेटियों और दामाद ने देखा, सामने अर्ध विक्षिप्त भिक्षुक के रूप में हितेश भिखारियों की पंक्ति में बैठा है।

 

image taken from internet.

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6 thoughts on “किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

  1. bahut khub likha hai Rekhaji… aapke posts read kar ke meri Hindi mein improvements aa rahe hain, varna angrezi ke chakkar mein to hum sab hindi bhool hi rahe hain… dhanyavaad 🙂

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    1. Thanks for your compliment. आपने कहानी इतने मनोयोग से पढ़ा. यह जान कर खुशी हुई. बहुत आभार.😊

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