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चाँदनी अौर साल्मन ( बाल कथा -बाल मनोविज्ञान ) Chandni and Salmon -story for children, based on child psychology.

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स्कूल बैग बालू पर फेंक कर वह एक चट्टान पर पर जा कर बैठ गई। उसकी आँखों से आँसू बह रह थे। उसने स्कूल के कपड़े भी नहीं बदले थे। उसके आँसू समुन्द्र के पानी में टपक कर उसे और भी खारा बना रहे थे। समुद्र की चाँदी जैसी झिमिलाती लहरें चट्टान से टकरा कर शोर मचाती वापस लौट रहीं थीं।

9 वर्ष की चाँदनी रोज़ स्कूल की छुट्टी के बाद भागती हुई समुन्द्र के किनारे आती थी। यह उसका रोज़ का नियम था। पिछले महीने ही जब उसे शहर के सब से अच्छे स्कूल में दाखिला मिला तब वह खुशी से नाच उठी थी। उसके माता-पिता भी बहुत खुश थे। चाँदनी बहुत मेधावी छात्रा थी। उसके माता-पिता उसे बहुत अच्छी और ऊंची शिक्षा देना चाहते थे। पर छोटे से गाँव में यह संभव नहीं था।

इसीलिए इस स्कूल में दाखिला के लिये चाँदनी ने बहुत मेहनत की थी। पर तब उसे यह कहाँ पता था कि हॉस्टल में रहना इतना खराब लगेगा। नया स्कूल भी उसे अच्छा नहीं लग रहा था।वैसे तो स्कूल बड़ा सुंदर था। आगे बहुत बड़ा खेल का मैदान था। पीछे एक बड़ा बगीचा था। स्कूल कंटीले तारों से घिरा था। स्कूल के पीछे था बालू और फिर फैला था नीला, गहरा समुद्र।

मम्मी-पप्पा से दूर, उसे यहाँ बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। यहाँ न तो कोई टीचर उसे पहचानते थे, न कोई अच्छी सहेली थी। पुराने स्कूल की वह सबसे अच्छी छात्रा थी। सभी टीचर उसे पहचानते थे और सभी उसे बहुत प्यार करते थे। क्लास के शरारती और कम अंक लाने वाले बच्चों को उसका उदाहरण दिया जाता था। सहेलियां पढ़ाई में उसकी मदद लेती रहती थीं । राधा बुआ ने तो अपनी बेटी श्रेया को हमेशा चाँदनी के साथ रहने कह दिया था, ताकि वह भी चाँदनी की तरह होनहार और होशियार बन सके।

हॉस्टल के हर खाने का स्वाद उसे एक जैसा लगता था। माँ के हाथों के स्वादिष्ट खाने को याद कर उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे और वह बिना खाये ही उठ जाती थी। उसे सिर्फ शनिवार का दिन अच्छा लगता था क्योंकि उस दिन छुट्टी होती थी। साथ ही यह घर से फोन आने का दिन भी होता था। मम्मी पप्पा के फोन का इंतज़ार करते हुए सोचती रहती कि इस बार वह उन्हें साफ-साफ बोल देगी कि वह यहाँ नहीं रहना चाहती है। पर मम्मी की आवाज़ सुन कर ही समझ जाती कि वे अपनी रुलाई रोक रहीं हैं। पप्पा की बातों से भी लगता कि वे उसे बहुत याद करतें हैं। पप्पा उसे बहादुर, समझदार और न जाने क्या- क्या कहते रहते। वे उसके उज्ज्वल भविष्य की बातें समझाते रहते और वह बिना आवाज़ रोती रहती।

आज़ उसे गणित के परीक्षा में बहुत कम अंक मिले थे। उसकी शिक्षिका हैरानी से उसे देख रहीं थीं क्योंकि वह चाँदनी के क्लास परफॉर्मेंस से वह बहुत खुश थीं। उन्हें मालूम था कि चाँदनी बहुत ज़हीन छात्रा है। उन्हों ने चाँदनी को बुला कर प्यार से समझाया भी। पर आज वह इतनी दुखी थी कि उसे कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लग रहा था। इतने कम अंक तो उसे कभी नहीं आए थे। आज़ सागर किनारे बैठे-बैठे उसे लग रहा था कि वह मम्मी-पप्पा के सपने को साकार नहीं कर पाएगी। उसे अपनी योग्यता पर शक होने लगा था।

आज़ उसका मन वापस हॉस्टल जाने बिल्कुल नहीं था। आँखों से बहते आँसू उसके गुलाबी गालों से बह कर पानी में टपक रहे थे। अचानक उसे मीठी और महीन आवाज़ सुनाई दी, जैसे उससे कोई कुछ पूछ रहा है। हैरानी से वह नज़र घुमाने लगी। पर कुछ समझ नहीं आया। तभी आवाज़ फिर सुनाई दी- “तुम कौन हो? क्यों रो रही हो?”

चाँदनी ने हैरानी से नीचे पानी में चाँदी जैसी चमकती एक सुंदर मछली को देखा। तो क्या यह इस मछली की आवाज़ है? पर उसे विश्वाश नहीं हुआ। उसने आँसू से धुंधली आँखों को हथेलियों से पोछ कर फिर से देखने की कोशिश की। एक सुंदर झिलमिलाती मछ्ली पानी की सतह पर तैर रही थी। मछ्ली के रुपहले शरीर पर पड़ती सूरज की किरणे उसे और चमकदार और सुंदर बना रहीं थीं। यह मछली शायद बड़ी चुलबुली थी। वह कभी पानी के सतह पर आती कभी अंदर डुबकी लगा लेती। वह लगातार इधर-उधर शरारत से तैर रही थी। चाँदनी रोना भूल कर मछली को निहारने लगी। एक बार तो मछली पानी से बाहर ऊपर उसके करीब कूद कर वापस पानी में चली गई। चाँदनी को मछली की हरकतों को देखने में इतना मज़ा आ रहा था कि उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। अचानक मछली के पंखो पर डूबते सूरज की लालिमा चमकते देख चाँदनी ने नज़रे उठाई। शाम ढाल रही थी। वह घबरा गई। वह बैग उठा कर स्कूल हॉस्टल की ओर लपकी। गनीमत था कि किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वह वह बहुत देर से हॉस्टल से बाहर थी। रात में बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचती रही कि क्या सचमुच वह मछली बोल रही थी। सपने में भी उसे वही मछली नज़र आती रही।

अगली दिन स्कूल के बाद वह दौड़ती हुई समुद्र के किनारे चट्टान पर पहुँच गई। आज उसकी आँखों में आँसू नहीं, उत्सुकता थी। उसकी आँखें उसी मछली को खोज रही थीं । पर वह नज़र नहीं आई। चाँदनी मायूस हो गई। तभी अचानक मुँह से बुलबुले निकालती वही मछली पानी की सतह पर आ गई। चाँदनी एकाएक पूछ बैठी- तुम ने इतनी देर क्यों लगाई? तुम्हारा नाम क्या है?

मछली जैसे जवाब देने को तैयार बैठी थी। उसने कहा- मैं सैल्मन मछली हूँ । मेरा नाम चमकीली है। मैं इस समुद्र में रहती हूँ। तुम कौन हो? चाँदनी हैरान थी। अरे! यह तो सचमुच बातें कर रही है। चाँदनी ने उसे अपना नाम बताया। दोनों ने ढेर सारी बातें की। सैल्मन उसे सागर के अंदर की दुनियाँ के बारे मे बताने लगी कि वह भोजन की तलाश में समुद्र में दूर-दूर तक तक जाती है। आज भी वह भोजन की तलाश में दूर निकाल गई थी। इसीलिए उसे यहाँ आने में देर हो गई।

थोड़ी देर मे चाँदनी सैल्मन को बाय-बाय कर गाना गुनगुनाते हुए हॉस्टल लौट चली।आज चाँदनी खुश थी क्योंकि उसे एक सहेली जो मिल गई थी। अब वह अक्सर सागर किनारे अपनी सहेली से बातें करने पंहुच जाती थी। उसे दिन भर की बातें और अपनी परेशानियाँ बताती थी। सैल्मन उसकी बातें सुनती रहती और पानी की सतह पर इधर -उधर तैरती रहती। कभी अपना मुँह गोल कर बुलबुले निकलती। उसकी चुलबुली हरकतों को देख कर चाँदनी अपनी सारी परेशानियों को भूल, खिलखिला कर हँसने लगती और हॉस्टल से चुपके से लाये रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े सैल्मन को देने लगती। बहुत बार सैल्मन पानी से ऊपर कूद कर रोटी के टुकडों को मुँह में पकड़ने की कोशिश करती तो चाँदनी को बड़ा मज़ा आता। वह सोचने लगती, काश वह भी मछली होती। तब जिंदगी कितनी अच्छी होती। मज़े मे अपने घर मे रहती। जहाँ मन चाहे तैरती रहती।

अगली शाम उसे सैल्मन के चमकते पंखो पर कुछ खरोचें नज़र आई। पूछने पर सैल्मन ने बताया कि वह मछुआरों के जाल मे फँस गई थी। पर जाल में एक छेद होने कि वजह से किसी तरह से बाहर निकल गई। ये खरोचें उसी जाल के तारों से लग गए हैं । सैल्मन ने कहा -” शुक्र है मेरी जान बच गई।” चाँदनी सिहर उठी। वह बोल पड़ी- चमकीली क्या सागर में तुम्हें खतरे भी है? सैल्मन ने कहा- सागर में खतरे ही खतरे हैं। बड़ी- बड़ी मछलियां, शार्क, सील और मछुआरों के जालों जैसे खतरे हमेशा बने रहते हैं।

अचानक चाँदनी को सैल्मन होने की अपनी कल्पना पर अफसोस होने लगा। उसकी ज़िदगी तो में तो ऐसी कोई परेशानी ही नहीं थी। उसे तो सिर्फ मन लगा कर पढ़ाई करना है। आज उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह अच्छी तरह से पढ़ाई करेगी। अब उसे स्कूल पहले से अच्छा लगने लगा था और पढ़ाई में भी मन लगने लगा था। पर घर की याद उसे हमेशा सताते रहती थी।

शनिवार को सुबह- सुबह ही मम्मी-पप्पा का फोन आ गया। पप्पा ने अच्छी और बुरी दोनों खबरें सुनाई। बुरी खबर थी कि मम्मी को बुखार था। उनकी आवाज़ भी भारी थी। उसका मन उदास हो गया। पर अपनी प्यारी बिल्ली किटी के तीन प्यारे,सुंदर और सफ़ेद बच्चों के होने की खबर से वह खुश हो गई। पप्पा से उसने प्रश्नो की झड़ी लगा दी।

बहुत दिनों बाद चाँदनी की चहकती आवाज़ सुन पप्पा भी हँस-हँस कर उसकी बातों का जवाब देते रहे। उसने पप्पा को बताया कि उसे क्लास- टेस्ट में वहुत अच्छे अंक आए है और उसके परीक्षा की तिथि भी बता दी गई है। परीक्षा खत्म होते ही स्कूल में लंबी छुट्टी हो जाएगी। तब वह घर आएगी। तब किटी और उसके बच्चों के साथ खूब खेलेगी। वास्तव में उसे परीक्षा से ज्यादा इंतज़ार छुट्टियों की थी। पर फोन रखते ही उसे रोना आने लगा। उसका मन करने लगा कि वह उड़ कर घर पंहुच जाये।

वह आँसू भरी आँखों के साथ चट्टान पर जा बैठी और चमकीली को आवाज़ देने लगी। पर चमकीली का कहीं पता नहीं था। चाँदनी ज़ोरों से डर गई। उसे सैल्मन के जाल में फँसनेवाली घटना याद आ गई। वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसे पता ही नहीं चला की सुबह का सूरज कब ऊपर चढ़ आया। अचानक उसके चेहरे पर पानी के छींटे पड़े। उसने दोनों हथेलियो के उल्टी तरफ से अपनी आँखें पोछने की कोशिश की। तभी उसकी नज़र चमकीली पर पड़ी। वह अपनी पूंछ से उसकी ओर पानी उछाल रही थी। चमकीली ने घबराई आवाज़ में पूछा- तुम आज सुबह-सुबह कैसे आ गई? इतना रो क्यों रही हो?

चमकीली को देख कर चाँदनी का डर गुस्से में बदल गया। सुबकते हुए, नाराजगी से उसने कहा-” तुम ने आने में इतनी देर क्यों लगाई। मैं तो डर गई थी। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती हूँ। तुम्हारे सिवा यहाँ मेरा कौन है? मेरे मम्मी-पप्पा यहाँ से बहुत दूर है।” चमकीली ने हँस कर कहा -” बस इतनी सी बात? आज तो एक शार्क मेरे पीछे ही पड़ गई थी। उससे बचने के लिए मैं सागर की अतल गहराई में मूंगा चट्टानों के बीच जा कर छुप गई थी। अभी-अभी मेरी सहेलियों के मुझे बताया, तुम मुझे आवाज़ दे रही हो।” चाँदनी को अभी भी सुबकते देख कर चमकीली उसे बहलाते हुए बोली- “अरे, तुम तो बहादुर और समझदार लड़की हो। इतनी छोटी-छोटी बातों से मत घबराओ। तुम्हें बहुत पढ़ाई करनी है और जिंदगी में बहुत आगे बढ़ाना है।”

अभी भी चाँदनी की बड़ी-बड़ी सुंदर आँखों से गाल पर टपकते आँसू देख कर चमकीली ने कहा- “अच्छा, आराम से बैठो। मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनती हूँ । तब तुम्हें समझ आएगा कि छोटी-छोटी बातों से नहीं घबराना चाहिए। तुम्हें तो दुनिया की सब सुविधाएँ मिली हैं । राह दिखाने के लिए मम्मी-पप्पा हैं । तुम्हें तो बस मन लगा कर पढना है।”

तुम्हारी कहानी? चाँदनी ने आश्चर्य से पूछा। तुम तो अपने मम्मी-पप्पा और ढेरो सहेलियों के साथ इस खूबसूरत समुद्र में इठलाते रहती हो। तुम क्या जानो मेरी परेशानियां। मुझे घर से दूर हॉस्टल में रहना पड़ता है। ढेरो पढ़ाई करनी पड़ती है। फिर ऊपर से परीक्षा की मुसीबत भी रहती है। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि थोड़े ही दिनों में मेरी छुट्टियाँ होनेवाली हैं। फिर मैं घर जाने वाली हूँ। लेकिन तुरंत ही चाँदनी उत्सुकता से आँखें गोल कर बोल पड़ी- “अच्छा, चलो अपनी कहानी जल्दी मुझे सुनाओ।” सैल्मन पानी पर गोल-गोल चक्कर लगा कर सतह पर बिल्कुल चाँदनी के सामने आ गई। फिर मुँह से ढेर सारे बुलबुले निकाल कर कुछ याद करने लगी।

चमकीली कुछ सोचते-सोचते बोलने लगी-” जानती हो चाँदनी, मेरा घर यहाँ से सैकड़ो मील दूर ताजे पानी के झरने और नदियों में है। मेरे माता-पिता तो इस दुनियां में हैं ही नहीं। हमें तो हर बात अपने आप ही सीखना होता है। पूरी ज़िंदगी हम अपना रास्ता स्वयं खोजते हैं। हम जन्म तो ताज़े पानी की नदियों में लेते हैं, पर उसके बाद हम नदियों के बहाव के साथ समुद्र में चले आते हैं । यह विशाल सागर हमारे लिए एकदम अनजान होता है। हमें राह दिखने वाला कोई नहीं होता है। यह विस्तृत सागर देखने में तो सुंदर है। पर खतरों से भरा होता है। हर तरफ शिकारी हम जैसी मछलियों को पकड़ने की ताक में रहते हैं। हमारी एक भूल भी जानलेवा हो सकती है।”

मेरा जन्म यहाँ से बहुत दूर एक ताज़े पानी के झरने में हुआ था। मेरी माँ ने झरने की गहराइयों में घोसलें में अंडे के रूप में मुझे जन्म दिया। चाँदनी पूछ बैठी-” घोंसला? वह तो चिड़ियों का होता है। पानी के अंदर कैसे घोंसला बनता है?’ सैल्मन शरारत से चाँदनी के एकदम सामने तक कूद कर पानी के छींटे उडाती वापस पानी के अंदर चली गई। फिर वह चाँदनी को समझाने लगी-” हमारा घोंसला चिड़ियों की तरह तिनकों का नहीं, बल्की कंकड़ों का होता है। मेरी माँ ने झरने के तल में एक छोटे से स्थान को अपनी पूंछ से साफ किया। फिर गड्ढा बनाया कर चारो ओर से कंकड़ो से घेर कर घोंसला बनाया था। उस घोंसले में मेरी माँ ने ढेरो अंडे दिए। इस तरह अंडे के रूप में मेरा जन्म हुआ। मेरे माता-पिता ने कुछ हफ्ते हमारी और घोंसले की देख-भाल की। उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।”

चाँदनी आश्चर्य से सैल्मन को देख रही थी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। पर उसने चुपके से उन्हे पोंछ लिया। इतने दर्दनाक जीवन की शुरुआत के बाद चमकीली जब इतना मस्त रहती है। तब चाँदनी का इतना कमजोर होना अच्छा नहीं है। उसे भी चमकीली की तरह समझदार और साहसी बनाना होगा। चाँदनी ने पूछा –” फिर?”

चमकीली ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई। वह बोली-‘ कुछ समय बाद मैं अंडे से बाहर आई। तब मैं बिलकुल छोटी थी ।तब अक्सर मैं और मेरे भाई-बहन कंकड़ो और चट्टानों के बीच दुबके रहते थे। क्योंकि हमारे चारो ओर खतरा ही खतरा था। बड़ी मछलियाँ, कीड़े और पंछी हमें खाने की ताक में रहते थे। चट्टानों, पत्थरो और पौधों के बीच छुप कर मैंने अपना बचपन गुजारा।

जब मैं अंडे से निकली थी तब मुझे तैरना भी नहीं आता था। मै अपना पूंछ हिला कर घोंसले में ही इधर-उधर करती रहती थी। धीरे-धीरे मैंने तैरना सीखा।” चाँदनी ने आश्चर्य से पूछा –”चमकीली, तब तुम्हें खाना कौन देता था?” “अरे बुद्धू, हमें तुम बच्चों जैसा खाना बना कर देनेवाला कोई नहीं होता है। हम जिस अंडे से निकलते हैं। उसका कुछ हिस्सा हमारे पेट के साथ लगा रहता है। वही हमारा भोजन होता है-” चमकीली ने समझाया। फिर उसने कहा-“जानती हो चाँदनी, मेरा वह झरना बहुत सुंदर था। जैसे तुम्हें अपना घर याद आता है वैसे ही मुझे भी अपना झरना याद आता है। जैसे तुम अपने घर जाना चाहती हो, वैसे ही मुझे भी एक दिन अपने घर जाना है। मेरा झरना विशाल था। ऊपर पहाड़ पर जमा बर्फ गल कर झरने के रूप में बहता था। झरने से मीठी कल-कल की आवाज़ गीत जैसी लगती थी। मेरा झरना एक विशाल नदी में गिरता था, जिसका नीला, ठंडा और निर्मल पानी इतना साफ था कि उसकी तल साफ नज़र आती थी।”

चाँदनी अब चट्टान पर पेट के बल लेट कर बड़े ध्यान से सुन रही थी। वह ठुड्डी को दोनों हथेलियों पर टिका कर कोहनी के बल लेट गई थी। चमकीली की बात सुन कर वह बोली-” इतने साफ पानी में तैरने में बड़ा मज़ा आता होगा?” चमकीली बोली-” मज़ा? अरे मज़ा से ज्यादा तो खतरा रहता था। शिकारियों से छुपने और बच कर भागने में बडी मुश्किल होती थी।

थोड़े बड़े होने पर मैं अपने मित्रो के साथ झुंड बना कर खाने के खोज में बाहर निकलने लगी। फिर हमारा झुंड नदी की धार के साथ आगे बढ़ने लगा। हम सभी नदी के मुहाने पर पहुँचने के बाद कुछ समय वहीं रुक गए। हमारे आगे विशाल सागर लहरा रहा था।” चाँदनी ने कहा-” रुको-रुको, तुम पहले मुझे बताओ ‘मुहाने’ का क्या मतलब होता है? और तुम वहाँ पर रुक क्यों गई?” चमकीली ने पानी से बाहर छलाँग लगाई, पूंछ से चाँदनी के चेहरे पर पानी के छीटे उड़ाती हुई वापस छपाक से पानी के अंदर चली गई। चाँदनी खिलखिला कर हँसने लगी और बोली- चमकीली, शैतानी मत करो। नहीं तो मैं भी पानी में कूद पड़ूँगी।’ सैल्मन ने हड्बड़ा कर कहा-” चाँदनी, भूल कर भी ऐसा मत करना। यह सागर बड़ा गहरा है और तुम्हें तैरना भी नहीं आता है। जब तुम बड़ी हो जाओगी और तैरना सीख लोगी तब समुद्र में गोते लगाना। तब तुम समुन्द्र और हमारे बारे में पढ़ाई भी करना।” अच्छा-अच्छा अब आगे बताओ न चमकीली –चाँदनी बेचैनी से बोल पड़ी।

सैल्मन ने समझाया- “चाँदनी, मुहाना वह जगह है जहाँ नदी सागर में मिलती है। अर्थात समुद्र और नदी का मिलन स्थल। यहाँ तक पानी मीठा होता है। जबकि सागर का पानी नमकीन होता है। यहाँ पर कुछ समय तक रह कर हम अपने-आप को नमकीन पानी में रहने लायक बनाते हैं। तभी हम समुद्र में रह पाते है। हम झुंड में लगभग एक वर्ष की आयु तक मुहाने पर रहते हैं। फिर हम सब समुद्र की ओर बढ़ जाते हैं। अगले कुछ वर्षो तक समुद्र ही हमारा घर बन जाता है।” सैल्मन ने समझदारी के साथ समझाया।

फिर अचानक चमकीली ने चाँदनी से पूछा- “चाँदनी, आज तुम मेरे लिए रोटी लाना भूल गई क्या? चाँदनी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। चाँदनी को याद आया कि आज उसने नाश्ता ही नही किया है। पापा- मम्मी से बातें करने के बाद से वह यहाँ आ गई है। अब दोपहर हो गया है। चाँदनी घबरा गई।हॉस्टल में सभी उसे खोज रहे होंगे। चाँदनी ने जल्दीबाजी में सैल्मन से कहा-‘ चमकीली, अब मुझे जाना होगा। बड़ी देर हो गई है। तुम्हारी बाकी कहानी बाद में सुनूगीं। ठीक है न? बाय- बाय सैल्मन !”

वह तेज़ी से भागते हुए स्कूल के पीछे के बाउंड्री के पास पहूँची जो कटीले तारों का बना था। उन तारों के ऊपर बसंत-मालती की लताएँ फैली थी। लताओं पर गुच्छे के गुच्छे खूबसूरत सफ़ेद-गुलाबी बसंत मालती के फूल झूल रहे थे। फूलों की खुशबू चारो ओर फैली हुई थी। उसे ये फूल और इनकी खुशबू बहुत पसंद थी। पर अभी उसका ध्यान कहीं और था। उसने बड़ी सावधानी से एक जगह की लताओं को उठाया और अपने छुपे छोटे से रास्ते से लेट कर सरकती हुई अंदर चली गई। अंदर जा कर उसने अपने कपड़े में लगे बालू को झाड़ा और हॉस्टल की ओर भागी। फूलों और लताओं ने झूल कर रास्ते को फिर छुपा दिया।

कुछ दिनो तक चाँदनी को सागर के किनारे जाने का मौका नहीं मिला। परीक्षा के कारण वह पढ़ाई में व्यस्त हो गई। चमकीली ने ठीक कहा था- “तुम्हें जीवन की सारी सुविधाएँ मिली हैं। बस मन लगा कर पढ़ना है।” पर चमकीली की आगे की कहानी जानने के लिए वह बेचैन थी। उसकी परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थीं।

शनिवार की सुबह उसने जल्दी से नाश्ता किया और चमकीली के पास जा पहूँची। आज वह चमकीली के लिए रोटी लाना नहीं भूली थी। चमकीली उसे देखते ही खुश हो गई। चमकीली ने पूछा – “पढ़ाई मे व्यस्त थी क्या? तुम खूब मन लगा कर पढ़ो और क्लास में अव्वल आओ।” चाँदनी ने कहा-” तुम्हारी बात मान कर मैंने मन लगा कर पढाई की है। अब तुम मेरी बात मान कर अपनी कहानी सुनाओ और तुम्हें एक बात बतलाऊँ? आज शाम में पप्पा मुझे लेने आ रहे हैं। मैं छुट्टियों में खूब मस्ती करूंगी। पर छुट्टियां खत्म होते वापस जरूर आऊँगी। तुम्हारी वजह से मुझे अपना स्कूल और हॉस्टल अच्छा लगने लगा है। घर पर तुम्हें बहुत याद करूंगी। अच्छा बताओ, तुम कब घर जाओगी चमकीली? मेरे वापस लौटने तक तुम भी जरूर आ जाना।’ चमकीली कुछ याद करते हुए बोली-” हाँ, मुझे भी कुछ समय में अपने घर जाना है।”

तुम्हारा घर कितनी दूर है? तुम्हें लेने कौन आएगा? तुम कब यहाँ वापस लौटोगी? तुम अपनी कहानी कब पूरी करोगी? चाँदनी ने रुआंसी आवाज़ में ढेर सारे प्रश्न पूछ लिए। दरअसल सैल्मन के घर जाने की बात सुन कर उसे रोना आने लगा।

” अरे, रुको तो। तुम ने इतने सारे प्रश्न एक साथ पूछ लिए है। मैं तुम्हें सारी बातें बताती हूँ। पहले मैं अपनी कहानी पूरी करती हूँ। तुम्हें सब प्रश्नों का उत्तर भी मिल जाएगा। पर पहले तुम्हें मुस्कुराना होगा”- चमकीली ने कहा। चाँदनी जल्दी से आँसू पोंछ कर मुस्कुराने लगी। सैल्मन अपनी कहानी आगे बताने लगी। चमकीली ने कहा- “जैसे तुम अपने घर जाना चाहती हो वैसे ही मुझे भी एक दिन अपने घर जाना है।

सागर में कुछ साल बिताने के बाद हमारा झुंड वापस अपने जन्म स्थान पर लौटता है। जो यहाँ से सैकड़ो किलोमीटर दूर है। हमें कोई लेने नहीं आता है, चाँदनी। हमें अपने आप ही लौटना पड़ता है।” चाँदनी ने पूछा-” तुम्हें अपना पता तो याद है न? सैल्मन पूंछ से पानी उड़ाते हुए हँस पड़ी और बोली-“हमारा कोई पता नहीं होता हैं। हमें अपने याद और समझदारी के सहारे वापस लौटना होता है।”

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सागर से हम झरने के मुहाने पर पहुचते हैं। फिर हमें झरने के पानी में बहाव के उल्टे दिशा में तैरना पड़ता है। कहीं-कहीं तो ऊँची छलांग लगा कर ऊपर जाना पड़ता है। यह बहुत थका देने वाली यात्रा होती है। रास्ते में जंगली भालू और पंछी हमें शिकार बनाने के फिराक में रहते हैं। हमें इन सब से बचते-बचते अपने घर पहुँचना पड़ता है। यहाँ पहुँच कर हम अंडे देते है।

जिससे हमारी नई पीढ़ी शुरू होती है। जहाँ हमारी जिंदगी शुरू होती है अक्सर वहीं हमारी जिंदगी खत्म होती है।” यही हमारी जीवन कथा है। ईश्वर ने हमें ऐसा ही बनाया है।सैल्मन अपनी कहानी सुना कर उदास हो गई। चाँदनी का मन द्रवित हो उठा। पर मन ही मन वह चमकीली को दाद देने लगी। वह बोल पड़ी- “अरे, तुम तो सुपर-फिश हो।’ सोलोमन ने पूछा-“सुपर-फिश मतलब?” चाँदनी ने कहा-” अरे, जैसे सुपर-मैन होता है, वैसे ही तुम सुपर-फिश हो। मतलब बहुत बहादुर सैल्मन।” दोनों सहेलियां खिलखिला कर हँसने लगी, लेकिन चाँदनी के चेहरे पर उदासी छा गई। उसने पूछा-” तब क्या तुम वापस नहीं लौटोगी? ऐसा मत करना। तुम जरूर वापस लौट आना। तुम मेरी दोस्त हो न? मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी?” सैल्मन ने जवाब दिया- अच्छा, तुम चिंता मत करो। हमारी दोस्ती बनी रहेगी।

छुट्टियों के बाद चाँदनी स्कूल लौटी। वह बहुत खुश थी। वह अपनी कक्षा मे प्रथम आई थी। वह चट्टानों पर भागती हुई सागर के किनारे पहुँची। उसका मन उत्साह और भय के मिले-जुले एहसास से भरा था। उसे मालूम नहीं था कि अब उसे चमकीली से भेंट होगी या नहीं। वह बहुत देर चट्टान पर बैठे-बैठे सैल्मन का इंतज़ार करती रही। चमकीली नहीं आई। वह हॉस्टल लौट गई। जब काफी दिन बीत गए और चमकीली नहीं नज़र आई तब चाँदनी को विश्वास हो गया कि चमकीली अपने झरने मेँ लौटते समय अपनी जान गँवा बैठी है।या फिर वह भी अपने माता-पिता की तरह अंडे दे कर अपने झरने मेँ मौत की नींद सो गई।

आज काफ़ी लंबे अरसे बाद, फिर भारी मन से वह सागर किनारे से वापस लौटने वाली थी। तभी नीचे पानी में हलचल दिखी। वह गौर से देखने लगी। नीचे कुछ झिलमिलाता सा लगा पर फिर कुछ नज़र नहीं आया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और अनजाने मेँ ही वह चमकीली को आवाज़ देने लगी।

अचानक आवाज़ आई- तुम मेरी माँ को जानती हो क्या? उसका नाम चमकीली था। मैं यहाँ रोज़ तुम्हें बैठे देखती हूँ। पर डर से ऊपर नहीं आती थी। तुम मुझसे दोस्ती करोगी क्या? एक छोटी रुपहली मछ्ली पानी की सतह पर तैर रही थी। चाँदनी अविश्वास के साथ छोटी सी चमकीली को देख रही थी। चमकीली ने जाने से पहले ठीक कहा था-” तुम चिंता मत करो। हमारी दोस्ती बनी रहेगी।” उसके आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहें थे। कभी सामने डूबते लाल सूरज को देखती कभी प्यारी सी नन्ही चमकीली को। दरअसल वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी। साथ ही प्रकृति के अनोखे खेल से हैरान थी।

तभी किसी ने उसके पीठ पर हाथ रखा। उसके हॉस्टल की अध्यापिका खड़ी थीं। उन्होने चाँदनी से पूछा- बेटा, तुम अकेली यहाँ क्या कर रही हो?तुम्हें इस तरह अकेले यहाँ नहीं आना चाहिए। क्या तुम्हें सागर और उसके जीवों को देखना पसंद है? प्रकृति और पशु-पक्षियों से हमें अनेक सीख मिलती हैं । चलो, अब मैं तुम सब बच्चों को शाम में सागर किनारे लाया करूंगी। चाँदनी चुपचाप छोटी चमकीली को निहार रही थी और सोच रही थी – क्या कोई मेरी और चमकीली के दोस्ती की कहानी पर विश्वाश करेगा?

(यह कहानी अभिभावकों को बाल मनोविज्ञान की जानकारी देती है। बच्चों को प्रकृति और जानवरों का साहचर्य आनंद, खुशी और अभिव्यक्ति का अवसर देता है। पशु-पक्षी न सिर्फ मनोरंजन का स्रोत है ,बल्कि वे बच्चों के कोमल मानसिकता को प्रभावित करते हैं। वे बच्चों और उनके अंतर्मुखी मन की बातों को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करतें हैं। यह कहानी इसी बात को दर्शाती है। साथ ही इस कहानी के माध्यम से बच्चों को सैल्मन मछली के जीवन-चक्र की जानकारी मिलती है।)

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I am PhD. in Psychology, a PGDM in HR, hold a certificate in Child Guidance and Counsel ling and a writer, not necessarily in that order. My work experience includes teaching MBA students in Usha Martin and Amity Colleges in Patna and teaching Psychology in various college of Patna to B.A. and M.A. students and to law students in Swami Vivekanand law College in Lucknow. I've also taught primary school students in DPS, Dhanbad. I got married at the age of 19, in my first year of BA Psychology Hons. I finished my studies and developed my interest in women and children studies in India. My thesis is about the urban, educated Indian women. I have written Hindi articles for Hindustan, Dhanbad and the MA Psychology study course for Nalanda Open University in Patna. My interest in writing is something that happened subconsciously. But lately, after having written deep, psychological and spiritual articles and having produced books for Post Graduate Psychology students, I realized how much I love writing for children. I find it refreshing and heartening to write about their innocence, faith, fears and fearlessness. My two daughters have grown on a staple diet of magic and fairy tales and I must confess that I have enjoyed their childhood perhaps more than they did themselves. I wish to keep writing for these little people who are the bright future of our country, our civilization and our world.

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