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धोखा (कहानी)

यह एक सच्ची कहानी के ताने-बाने पर बुनी कथा है।

सुषमा बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था.

अचानक ही एक दिन बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा – सब इतना अच्छा है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ?

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता. सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते. उसे लगता , यह सब सपना तो नहीँ है ?

हाँ , दो पुत्रियों की माता , उसकी जेठानी ज़रूर थोड़ी उखड़ी -उखड़ी रहती. पर वह रसोई और बेटियों मॆं ही ज्यादा उलझी रहती. कभी उनकी दोनों प्यारी -प्यारी बेटियाँ छोटी माँ – छोटी माँ करती हुई उसके पास पहुँच जाती. ऐसे में एक दिन जेठानी भी उनके पीछे -पीछे उसके कमरे मॆं आ गई. कुछ अजीब सी दृष्टि से उसे देखती हुई बोल पड़ी -” क्यों जी , दिन भर कमरे मॆं जी नहीँ घबराता ? जानती हो … ” वह कुछ कहना चाह रहीं थी.

अभी जेठानी की बात अधूरी ही थी. तभी उसकी सास कमरे में पहुँच गई. बड़ी नाराजगी से बड़ी बहू से कहने लगी -” सुषमा को परेशान ना करो. नई बहू है. हाथों की मेहन्दी भी नहीँ छूटी है. घर के काम मैं इससे सवा महीने तक नहीँ करवाऊगी. यह तुम्हारे जैसे बड़े घर की नहीँ है. पर मुन्ना की पसंद है.” सुषमा का दिल सास का बड़प्पन देख भर आया.

नाग पंचमी का दिन था. सुषमा पति के साथ मंदिर से लौटते समय गोलगप्पे खाने और सावन के रिमझिम फुहार मॆं भीगने पति को भी खींच लाई. जब गाना गुनगुनाते अध भीगे कपडों में सुषमा ने घर में प्रवेश किया. तभी सास गरज उठी -“यह क्या किया ? पानी मॆं भींगने से मुन्ना की तबियत खराब हो जाती है.” वे दवा का डब्बा उठा लाईं. जल्दी-जल्दी कुछ दवाईया देने लगी. सुषमा हैरान थी. ज़रा सा भीगने से सासू माँ इतना नाराज़ क्यों हो गई ?

शाम होते ही उसके पति को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया. सास उससे बड़ी नाराज थीं. पारिवारिक , उम्रदराज डाक्टर आये. वह डाक्टर साहब के लिये चाय ले कर कमरे के द्वार पर पहुँची. अंदर हो रही बातें सुनकर सन्न रह गई. डाक्टर सास से धीमी आवाज़ मॆं कह रहे थे – लास्ट स्टेज में यह बदपरहेजी ठीक नहीँ है. आपको मैंने इसकी शादी करने से भी रोका था.

सुषमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. लगा जैसे चक्कर खा कर गिर जायेगी. तभी न जाने कहाँ से आ कर जेठानी ने उसे सहारा दिया. उसे बगल के कमरे में खींच कर ले गई. उन्होने फुसफुसाते हुए बताया , उसके पति को कैंसर है. इस बात को छुपा कर उससे विवाह करवाया गया. ताकि उसका पति मरने से पहले गृहस्थ सुख भोग ले.

सास ने सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोचा. पर उसका क्या होगा ? पति से उसे वितृष्णा होने लगी. ऐसे सुख की क्या लालसा , जिसमे दूसरे को सिर्फ भोग्या समझा जाये. तभी सास उसे पुकारती हुई आई – ” सुषमा….सुषमा..तुम्हें मुन्ना बुला रहा है. जल्दी चलो. वह भारी मन से कमरे के द्वार पर जा खड़ी हुई.।

बिस्तर पर उसका पति जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था. पीडा से ओठ नीले पड गये थे. सुषमा ने कभी मौत को इतने करीब से नहीँ देखा था. घबराहट से उसके क़दम वही थम गये. तभी अचानक उसके पति का शरीर पीडा से ऐंठ गया और आँखों की पुतलिया पलट गई.

सास जलती नज़रों से उसे देख कर बुदबुदा उठी – भाग्यहीन , मनहूस, मेरे बेटे को खा गई. उससे लाड़ करनेवाला ससुराल , और उसे प्यार से पान के पत्ते जैसा फेरने वाली सास पल भर में बदल गये. सास हर समय कुछ ना कुछ उलाहना देती रहती.सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर रह गई. उसके बाद सुषमा को कुछ सुध ना रहा. सास ने ठीक तेरहवीं के दिन, सफेद साड़ी में, सारे गहने उतरवा कर घर के पुराने ड्राइवर के साथ उसे उसके मैके भेज दिया.

सुषमा की माँ ने दरवाजा खोला. सुषमा द्वार पर वैधव्य बोझ से सिर झुकाये खड़ी थी. वह सचमुच पत्थर बन गई थी. वह पूरा दिन किसी अँधेरे कोने मॆं बैठी रहती. सास के कहे शब्द उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन, मनहूस…. उसका पूरा परिवार सदमें मॆं था. तभी एक और झटका लगा. पता चला सुषमा माँ बनने वाली हैं.

तब सुषमा के पिता ने कमर कस लिया. वैसी हालत में ही सुषमा का दाखिल तुरंत नर्सिंग की पढाई के लिये पारा मेडिकल कॉलेज में करवा दिया. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करते रहती. उसके पापा हर रोज़ अपनी झुकती जा रही कमर सीधी करते हुए, बच्चों की तरह उसका हाथ पकड़ कर कालेज ले जाते और छुट्टी के समय उसे लेने गेट पर खड़े मिलते.

मई की तपती गर्मी में सुषमा के पुत्र ने जन्म लिया. सुषमा अनमने ढंग से बच्चे की देखभाल करती. कहते हैं, समय सबसे बड़ा मरहम होता है. सुषमा के घाव भी भरने लगे थे. पर पुत्र की और से उसका मन उचाट रहता. जिस समय ने उसके घाव भरे थे. उसी बीतते समय ने उसके वृद्ध होते पिता को तोड़ दिया था. ऊपर से शांत दिखने वाले पिता के दिल में उठते ज्वार-भाटे ने उन्हें दिल के दौरे से अस्पताल पहुँचा दिया. अडिग चट्टान जैसा सहारा देने वाले अपने पिता को कमजोर पड़ते देख सुषमा जैसी नींद से जागी. उसने पिता की रात दिन सेवा शुरू कर दी.

पिता की तबियत अब काफी ठीक लग रही थी. उनके चेहरे पर वापस लौटती रंगत देख सुषमा आश्वस्त हो गई. वह रात में पापा के अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सोती थी. वह पुनम की रात थी. खिड़की से दमकते चाँद की चाँदनी कमरे के अंदर तक बिखर गई थी. तभी पापा ने उसे अपने पास बुला कर बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले बोले -” बेटा, तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मज़बूती से….समझी ?

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ” पिता ने उसकी बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन नहीँ हो.बस एक धोखे और दुर्घटना की शिकार हो. जिसमें गलती तुम्हारी नहीँ , मेरी थी. अक्सर मुझे पश्चाताप होता है. तुम्हारी शादी करने से पहले मुझे और छानबीन करनी चहिये थी.”

भीगे नेत्रों से उन्हों ने अपनी बात आगे बढाई -“पर जानती हो बिटिया, असल गुनाहगार धोखा देनेवाले लोग है. एक बात और बेटा, तुम इसका प्रतिशोध अपने पुत्र से नहीँ ले सकती हो. उसका ख्याल तुम्हें ही रखना है.” थोड़ा मौन रह कर उसके नेत्रों में देखते हुए पिता ने कहा – “भाग्यहीन तुम नहीँ तुम्हारी सास है. बेटे को तो गंवाया ही. बहू और पोते को भी गँवा दिया. पर कभी ना कभी ईश्वर उन्हें उनकी गलतियों का आईना ज़रूर दिखायेगा. ईश्वर के न्याय पर मुझे पूर्ण विश्वाश हैं.”

पापा से बातें कर सुषमा को लगा जैसे उसके सीने पर से भारी बोझ उतर गया. पढाई करके उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई. वह बेटे के साथ खेल कर अपना दुःख भूल खिलखिलाने लगी । किसी न किसी से उसे अपने ससुराल की ख़बरें मिलती रहती. देवर की शादी और उसे बेटी होने की खबरें मिली. पर सुषमा को ससुरालवालों ने कभी उसे याद नहीँ किया. सुषमा ने भी पीछे मुड़ कर देखने के बदले अपने आप को और बेटे को सम्भालने पर ध्यान दिया.

उस दिन सुषमा अस्पताल पहुँची. वह आईसीयू के सामने से गुजर रही थी. तभी सामने देवर और जेठ आ खडे हुए. पता चला सास बीमार है. इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें इस बात का बहुत ग़म है कि सुषमा के पुत्र के अलावा उन्हें पोता नहीँ सिर्फ पोतिया ही है. अब वह सुषमा और उसके बेटे को याद करते रहती हैं. एक बार पोते क मुँह देखना चाहती हैं.

देवर ने कहा – “भाभी, बस एक बार मुन्ना भैया के बेटे को अम्मा के पास ले आओ. सुना है बिल्कुल भैया जैसा है. ” तभी जेठ बोल पड़े – सुषमा , मैं तो कहता हूँ. अब तुम हमारे साथ रहने आ जाओ. मैं कल सुबह ही तुम्हे लेने आ जाता हूँ. सुषमा बिना कुछ जवाब दिये अपनी ड्यूटी कक्ष में चली गई.वह उनकी बेशर्मी देख वह अवाक थी. वह चुपचाप अपना काम कर रहीं थी. पर उसके माथे पर पड़े शिकन से स्पष्ट था, उसके मन में बहुत सी बातो का तूफान चल रहा हैं.

वह सोंच रहीं थी , पहले तो उसे खिलौना समझ मरनासन्न पुत्र की कामना पूरी करने के लिये धोखे से विवाह करवाया. बाद में दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक दिया. आज़ अपनी पौत्रियों को पौत्र से कम आँका जा रहा है. क्योंकि वे लड़कियाँ हैं. अच्छा है वह आज़ ऐसे ओछे परिवार का हिस्सा नहीँ है. क्या उसके पुत्र को ऐसे लोगों के साथ रख कर उन जैसा बनने देना चाहिये ? बिल्कुल नहीँ. वह ऐसा नहीँ होने देगी. मन ही मन उसने कुछ निर्णय लिया. घर जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्जी दी.

उसी रात को वह ट्रेन से बेटे को ले कर निकट के दूसरे शहर चली गई. वहाँ के अच्छे बोर्डिंग स्कूल में बेटे का नाम लिखवा दिया. काफी समय से बेटे का दाखिला इस स्कूल में करवाने का मन बना रहीं थी. वह तीन -चार दिनों के बाद वापस घर लौटी.अगले दिन अस्पताल के सामने ही देवर मिल गया. उसे देख कर लपकता हुआ आया और बोल पड़ा -भाभी , अम्मा की तबियत और बिगड़ गई हैं. आप कहाँ थी ?

सुषमा चुपचाप हेड मेट्रन के कमरे में अपनी ड्यूटी मालूम करने चली गई. उस दिन उसकी ड्यूटी उसके सास के कमरे में थी. वह कमरे में जा कर दवाईया देने लगी. सास उसके बेटे के बारे में पूछने लगी. सुषमा ने शालीनता से कहा – “ईश्वर ने आपके घर इतनी कन्याओं को इसलिये भेजा हैं ताकि आप उनका सम्मान करें. जब तक आप यह नहीँ सीखेंगी , तब तक आप अपने इकलौते पौत्र का मुँह नहीँ देख सकतीं.”

सास क चेहरा तमतमा गया. लाल और गुस्से भरी आँखों से उसे घुरते हुए बोल पड़ी – “भाग्यहीन .. तुम धोखा कर रहीं हो , मेरे पौत्र को छुपा कर नहीँ रख सकतीं हो. lतुम्हारे जैसी मामूली लड़की की औकात नहीँ थी मेरे घर की बहू बनने की…” सुषमा ने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा “भाग्यहीन मैं नहीँ आप हैं. सब पा कर भी खो दिया. आपने मुझे धोखा दिया पर भगवान को धोखा दे पाई क्या ? आपको क्या लगता हैं एक सामान्य और मामूली लड़की का दिल नहीँ होता हैं ? उसे दुख तकलीफ़ की अनुभूति नहीँ होती? एक बात और हैं, देखिये आज़ आपको मेरे जैसी मामूली लड़की के सामने इतना अनुनय – विनय करना पड रहा है.”

अगली सुबह सास के कमरे के आगे भीड़ देख तेज़ कदमों से वहाँ पहुँची. पता चला अभी -अभी दिल का दौरा पड़ने से सास गुजर गई. पास खडे अस्पताल के वार्ड बॉय को कहते सुना -” दिल की मरीज थीं. कितनी बार डाक्टर साहब ने ने इन्हें शांत रहने की सलाह दी थी. अभी भी ये अपनी बहुओं को बेटा ना पैदा करने के लिये जोर – जोर से कोस रहीं थीं. उससे ही तेज़ दिल का दौरा पड़ा.”

सुषमा ने पापा को फोन कर सास के गुजरने की ख़बर दी. वह आफिस में माथे पर हाथ रखे बैठी सोंचा में डूबी थी -पौत्र से भेंट ना करा कर उसने गलती कर दी क्या ? तभी पीछे से पापा की आवाज़ आई – ” सुषमा, जिसके पास सब कुछ हो फ़िर भी खुश ना हो. यह उसकी नियति हैं. यह ईश्वर की मर्जी और न्याय हैं.”

हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं। तब विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?

Image from internet.

rekhasahay

सुषमा  बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था. 

अचानक ही एक दिन  बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा   – सब  इतना अच्छा  है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ? 

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक  देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह  घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता.  सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते.  उसे लगता ,  यह सब सपना तो…

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Author:

I am PhD. in Psychology, a PGDM in HR, hold a certificate in Child Guidance and Counsel ling and a writer, not necessarily in that order. My work experience includes teaching MBA students in Usha Martin and Amity Colleges in Patna and teaching Psychology in various college of Patna to B.A. and M.A. students and to law students in Swami Vivekanand law College in Lucknow. I've also taught primary school students in DPS, Dhanbad. I got married at the age of 19, in my first year of BA Psychology Hons. I finished my studies and developed my interest in women and children studies in India. My thesis is about the urban, educated Indian women. I have written Hindi articles for Hindustan, Dhanbad and the MA Psychology study course for Nalanda Open University in Patna. My interest in writing is something that happened subconsciously. But lately, after having written deep, psychological and spiritual articles and having produced books for Post Graduate Psychology students, I realized how much I love writing for children. I find it refreshing and heartening to write about their innocence, faith, fears and fearlessness. My two daughters have grown on a staple diet of magic and fairy tales and I must confess that I have enjoyed their childhood perhaps more than they did themselves. I wish to keep writing for these little people who are the bright future of our country, our civilization and our world.

46 thoughts on “धोखा (कहानी)

  1. ये उन लोगों के मुंह पर जोरदार तमाचा है जिन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ दिखाई पड़ता है वो अपने स्वार्थ के लिए किसी के भी जीवन से खेलने के लिए संकोच नहीं करते
    बहुत सुंदर कहानी है

    Liked by 1 person

      1. ये कहानी बहुत सारे लोगों के लिए प्रेणास्रोत हो सकती है
        आपने अच्छा किया यहां शेयर कर दी
        धन्यवाद}

        Liked by 1 person

  2. (हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं। तब विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?)

    this is darkest part of the Our era.

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  3. क्या लिखू ,तारीफ के लिए शब्द नही है मेरे पास। क्या शानदार लेखन है आपका। पूरी कहानी जैसे फिल्म की तरह आँखों के सामने चल रही है।

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    1. धन्यवाद गायत्री आपका प्यार भरा तारीफ बहुत अच्छा लगा. आपने मेरा हौसला बढा दिया.

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      1. बहुत धन्यवाद ! ऐसी प्रशंसाए टॉनिक का काम करती है गायत्री. 😊😊 ये मेरे लिये अनमोल है.

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  4. बहुत ही अच्छी कहानी लिखी है आपने…तारीफ़ करने के लिए शब्द ही नहीं मिल रहे हैं,
    एक एक शब्द पढ़ कर लगता है जैसे पूरी की पूरी कहानी एक फ़िल्म की तरह आँखों के सामने चल रही है

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    1. आपने बड़े खूबसुरत शब्दों में तारीफ कर मेरा हौसला बढा दिया है. बहुत धन्यवाद.

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  5. अगर आपकी अनुमति हो तो क्या मैं आपकी यह कहानी मैं अपने blog पर आपके नाम के साथ प्रकाशित कर सकता हूँ ??

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  6. कितना स्वार्थ और कितनी कड़वाहटें भारी पड़ी हैं दुनिया मे.. बेहद भावपूर्ण ढंग से लिखी गयी है ये कहानी.. अभी कुछ दिन पहले ही एक किस्सा हुआ था ऐसा ही.. कोशिश करूँगी उसको आपकी ही कहानी की तरह रूपरेखा देने की..😊💐💐

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    1. कहते है कलयुग है , इसलिये इतने धोखे है.
      पर मालूम नहीँ किस युग में यह सब नहीँ था.
      तुम अपना किस्सा ज़रूर लिखना. 😊😊

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    1. यह दुख की बात है. ऊपर वाला आप लोगों को शक्ति दे. बुरा समय जल्दी बीत जाय. मेरी यह शुभ कामनाएं है.
      इस दुनिया में इतने धोखे क्यों है , समझ नहीँ आता.

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    2. मैंने आपका ब्लॉग पढ़ना चाहा ,पर यह जवाब आया aina7146.wordpress.com is no longer available. क्या आप अपना लिंक भेजेंगे ?

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