चेहरा नहीं तो भाग्य तो सुन्दर होता (कविता)

मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 1

वह कभी आइने में अपना सुकुमार सलोना चेहरा देखती

कभी अपनी माँ को।

दिल में छाले, सजल नेत्र, कमसिन वयस, अल्पशिक्षित

कुछ माह की विवाहिता,

पति के चरित्रहिनता व बदमिजाजी से तंग,

वापस आई पिता ग़ृह, अपना घर मान कर।

माँ ने वितृषणा से कहा –

पति को तुम पसंद नहीं हो।

तुम्हारा चेहरा नहीं, कम से कम भाग्य तो सुन्दर होता।

वह हैरान थी, माँ तो विवाह के पहले से जानती थी

उसके ससुराल की कलकं-कथा,

अौर कहा था – घबराओ नहीं,

जल्दी हीं सुधर जायेगा।

“मेहंदी रंग लायेगी”

फिर आज़ यह उसके भाग्य अौर चेहरे की बात कहां से आई?

Source: चेहरा नहीं तो भाग्य तो सुन्दर होता (कविता)

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35 thoughts on “चेहरा नहीं तो भाग्य तो सुन्दर होता (कविता)

  1. चेहरा नही तो भाग्य सुन्दर होता ये तो आपने किसी की व्यथा कथा लिख दी । पर इन दोनो मे किसी का कुछ भी बस नही था क्योंकि लाचार लड़की आत्मनिर्भर नही

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    1. कम उम्र और अल्प शिक्षित लड़कियों की अक्सर ऐसी ही कथा होती है. लड़कियों को बोझ समझने का यह परिणाम है.

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    1. यह भारतीय जीवन का विरोधाभास भी है। नारी को देवी कहते हैं पर लङकियों को बोझ मानते हैं।

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    1. मैंने आपके ब्लोग को देखना चाहा पर यह जवाब मिला – Failed to open the page.
      क्या आप अपना link भेज सकते हैं?

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      1. मैने कोशिश की पर आपके ब्लॉग को नहीँ देख सकी. blog का लिंक देगे तब मै फ़िर कोशिश करूँगी.😊

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      2. ऐसे मैंने आपकी कवितायें पढ़ी ,बहुत ही अच्छी लिखती है सब मे कुछ न कुछ ना सीखने को मिलता है ।एक बार फिर धन्यवाद जो आप जैसी कवियत्री की कविता पढने को मिलती है

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  2. puri Qaynaat me wo do hi hai jo hmara bhagya likhte hai ek ham khud dusra Allah main bahut jyada aastha wadi nahi hun lekin mera ab bhi yahi manna hai ki koi shakti jarur aisi hai jo is pure brahmaand ka sanchalan karti hai or jo isse mukt hai har bandhan se or niyamo se

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