मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

पद्मावत कहें या पदमावती क्या फर्क पड़ता है ?

हम सब शोर कर रहे है सिर्फ

मृत इठिहास और उसके प्रमाणिकता की .

कोई क्यों नहीं सोचता इसके वर्तमान व भविष्य प्रभावों को ?

नारी अग्निदाह उत्सव का पुनर्जन्म तो नहीं है यह?

कुछ दशको पहले तक रूपकंवर की दर्दनाक सती

कथा त्याग कही जा रही थी .

बड़ी कठिनाईयों से हमारी आँखे खुलीं .

कहीं पद्मावती की सती कथा फिर इस आग

को लौ दिखा भड़का ना दे .

तब के जौहर की बात अौर थी।

कहने वाले कहते हैं –

 अब  – वैधव्य के बाद सती होने के

लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डाले जाते थे .

चिता अग्नि के चारों ओर सजे मेले…..दर्शकोँ के

भीड़ -कोलाहल में सती की हृदयविदारक करूंण क्रंदन

दव जाती थी

या

क्या दबा  दी जाती थी?

उनकें चिता पलायन प्रयास को पास खड़े कुछ लोग

विफल कर देते थे – लम्बे बाँस के सहारे उसे

लपलपाती अग्नि शिखा में वापस   ढकेल कर

एक जीवित जलती नारी मंदिर की देवी बन जाती .

अगर यह स्वर्ग गमन … पूज्यनीय दैवी पथ है

तब मात्र नारी के लिये हीं क्यों ?

 

स्मिता सहाय के विचारों से प्रेरित.

images courtesy Google.

20 thoughts on “मृत्यु उत्सव  – सती प्रथा

  1. sati pratha nishchit hi abhishap thi ……magar Rani Padmavti ki jauhar akranta se apni asmat bachane ka ek dardnak, hridayvidarak satitva bachane ki gauravpurn karya jispar ham sabhi hindustaani ko garv hai……..pahle hamne apna shish kataaya phir meri bahu,bibi aur bahnon ne……log ab Ramayan, Mahabharat aur hamare sabhi garnthon se chhedchhad kar rahe hain magar ham udaar kabhi kuchh vichar nahi karte aur aage chalkar asli itihaas ko bhul log usi ko satya maan baithte hain.

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