जिंदगी के रंग – 50

ज़िंदगी बहती नदी सी लगती है हमेशा.

कभी भँवर सी गोल गहरी घुमाती जिंदगी .

कभी किनारे पर सर पटकती जल लहरों सी.

कभी शांत पर बेहद गहरी जैसे

पैरो के नीचे जमीं ना होने का एहसास हो .

कभी ऊपर…… कभी नीचे…..

कभी छिछली सी जलधार सी लगाती है .

अपनी मुक्त नीलम नीलाभ जल की ख़ुशियों से भरी छलकती छलछलाती .

और फिर मानो बरसात की झड़ी से सब कुछ मलिन मटमैला होता जीवन .

सरल सहज बहती जिंदगी जल प्रपात का कब रूप ले लेती है पता हीं नहीं चलता .

प्रकृति के साथ बंधी हुई ……

सागर तक …..अनंत तक …..ना जाने कब तक?

ऐसे हीं चलती है यह जीवन यात्रा …..यह जिंदगी .