यादे कल की , बीते पल की

गर्मी की छुट्टी में कही कोई *समर कैंप* नहीं होते थे,

पुरानी चादर से छत के कोने पर ही टेंट बना लेते थे ,

क्या ज़माना था जब ऊंगली से लकीर खींच बंटवारा हो जाता था,

लोटा पानी खेल कर ही घर परिवार की परिभाषा सीख लेते थे।

*मामा , मासी , बुआ, चाचा के बच्चे सब सगे भाई लगते थे, कज़िन क्या बला होती है कुछ पता नही था।*

घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

*कंचे, गोटियों, इमली के चियो से खजाने भरे जाते थे,*

कान की गर्मी से वज़ीर , चोर पकड़ लाते थे,

*सांप सीढ़ी गिरना और संभलना सिखलाता था*,

*कैरम घर की रानी की अहमियत बतलाता था,*

घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

*पुरानी पोलिश की डिब्बी तराजू बन जाती थी ,*

नीम की निंबोली आम बनकर बिकती थी ,

बिना किसी ज़द्दोज़हद के नाप तोल सीख लेते थे ,

साथ साथ छोटों को भी हिसाब -किताब सिखा देते थे ,

*माचिस की डिब्बी से सोफा सेट बनाया जाता था ,*

पुराने बल्ब में मनीप्लान्ट भी सजाया जाता था ,

घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

*कापी के खाली पन्नों से रफ बुक बनाई जाती थी,*

*बची हुई कतरन से गुडिया सजाई जाती थी ,*

*रात में दादी-नानी से भूत की कहानी सुनते थे ,* फिर

*डर भगाने के लिये हनुमान चालीसा पढते थे,*

स्लो मोशन सीन करने की कोशिश करते थे ,

सरकस के जोकर की भी नकल उतारते थे ,

*सीक्रेट कोड ताली और सीटी से बनाया जाता था ,*

घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था.

कोयल की आवाज निकाल कर उसे चिढ़ाते थे,

घोंसले में अंडे देखने पेड पर चढ जाते थे ,

गरमी की छुट्टी में हम बड़ा मजा करते थे ,

बिना होलिडे होमवर्क के भी काफी कुछ सीख लेते थे ,

शाम को साथ बैठ कर *हमलोग* देखा जाता था ,

घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था……

Unknown

12 thoughts on “यादे कल की , बीते पल की

  1. पूरी तरह सही बात है रेखा जी । लेकिन वक़्त बदलता ही गया, अब भी बदल ही रहा है और चाहे यह बदलाव अनचाहा ही है, हम इसे रोक नहीं सकते । पनघटों की रूत कहाँ, अब वो हसीं चेहरे कहाँ; मंज़रों को वक़्त यादों में बदलकर चल दिया ।

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    1. आपके ख़ूबसूरत जवाब के लिए आभार.
      परिवर्तन शाश्वत सत्य है . उसे स्वीकार करना ही समय की माँग है. पर यादें तो यादें है और समय समय पर अपनी याद दिलाती रही है . 😊

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