ज़िंदगी के रंग -73

एक दिन रास्ते में मिली वह,

पीछे से काँधे पर हाथ रख कर बोली –

इतनी जल्दी में क्यों हो ?

दो घड़ी बैठ कर सुस्ता लो .

हमने पूछा – कौन हो तुम ?

जवाब मिला – पहचाना नहीं ?

तुम्हें सपने से जगाने ……

तुम्हें तुम से मिलाने आई हूँ.

तुम्हारी हीं ज़िंदगी हूँ ……