4 thoughts on “Never give up

  1. बिलकुल सच्ची और अनुकरणीय बात है यह । अपने महाकाव्य ‘कुरुक्षेत्र’ के सप्तम सर्ग में रामधारी सिंह दिनकर जी ने भीष्म पितामह के मुख से युधिष्ठिर को इससे मिलती-जुलती बात ही कहलवाई है : ‘यह अरण्य झुरमुट जो काटे, अपनी राह बना ले; क्रीतदास यह नहीं किसी का, जो चाहे, अपना ले; जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर, जो उससे डरते हैं; वह उनका जो चरण रोप, निर्भय हो कर लड़ते हैं ।’

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    1. बहुत धन्यवाद जितेंद्र जी . आपके कॉमेंट हमेशा बहुत कुछ सिखाते है . कुरुक्षेत्र कॉलेज पाठ्यक्रम के दौरान पढ़ा है. उसकी पुनरवृत्ति अच्छी लगी .

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