धृष्ट चाँद

पूनम का धृष्ट चाँद बिना पूछे,

बादलों के खुले वातायन से

अपनी चाँदनी को बड़े अधिकार से

सागर पर बिखेर गगन में मुस्कुरा पड़ा .

सागर की लहरों पर बिखर चाँदनी

सागर को  अपने पास बुलाने लगी.

लहरें ऊँचाइयों को छूने की कोशिश में

ज्वार बन तट पर सर पटकने लगे .

पर हमेशा की तरह यह मिलन भी

अधूरा रह गया.

थका चाँद पीला पड़ गया .

चाँदनी लुप्त हो गई .

सागर शांत हो गया .

पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी .

पूरब से सूरज झाँकने लगा था .

6 thoughts on “धृष्ट चाँद

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