यादें

चाहो या ना

चाहो ये यादें

साये की तरह

लिपटी रहती है .

बग़ैर इजाज़त तुम्हें

याद करने की गुस्तखियों के

लिए तहे दिल माफ़ी की गुज़ारिश है.

 

 

 

 

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ज़िंदगी के रंग – 77

जीना सीखते सीखते

बरसो लग जाते है .

और जीना सीखते समझते

जाने का वक़्त आ जाता है.

फिर भी कहने वाले कहते है –

” तुम्हें जीना नहीं आया ‘