ये सदायें

बरसात में बिन बोए भी

कुकुरमुते निकल आते है,

वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .

पहाड़ों में दी आवाज़ें भी गूँज बन

लौट आती है वापस.

फिर क्यों कभी – कभी ,

किसी किसी को बुलाने पर भी

जवाब नहीं आता ?

कहाँ खो जाती है?

ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

ख़ुद को

हम कई बार खुद को

बिसार देते हैं।

खुद का ख्याल रखना भूल जाते हैं,

अपनों  के लिए अपने-आप को सहेजना है जरुरी।

स्पष्ट सुलझे दिलो-दिमाग अौ मन के लिये

टूट कर बिखरने से खुद को खुद से है संभालना है जरुरी।