ज़िंदगी के रंग-91

हम किसी का हिस्सा बन गए ,

पर सामने वाले ने

जाना हीं नहीं ….

माना हीं नहीं ….

सवालों भरी इस

राह पर

गर ये कहे कि,

मेरे सवालों का

जवाब तुम हो .

तो भी क्या फ़ायदा ?

9 thoughts on “ज़िंदगी के रंग-91

  1. जहन में उमड़े सागर को…शब्दो पर पिरोना

    वाह वाह…. पढ़ने पर लगने लगे..जेसे खुद में हिस्सा तो नहीं हूं इस सागर का😊
    👌👌

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    1. ज़िंदगी में जो रंग देखें हैं , शब्दों में उन्हें लिख कर अच्छा लगता है
      हो सकता है तुम हिस्सा हो 😊।
      ज़िंदगी की पाठशाला और सिलेबस में बहुत लोगों का हिस्सा होता है . हम इन्हें जीते हैं. कुछ सीखते हैं कुछ सिखाते हैं.

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  2. में हिस्सा बनकर सीख रहा हूं आप से

    जिस दिन मात्रा बन जाऊंगा… संजोउंगा आपको😊

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    1. जो भी लिखना हो ,पहले उसे ख़ूब पढ़ो . जैसे कविता लिखने के लिए सभी की कवितायें पढ़ो . अपने आप ही लिखने लगोगे .
      वैसे अभी भी अच्छा लिखते हो .

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