लोग

देखे है पर्वतों और खाइयों से लोग.

दोनों अपने आप में अलग हैं.

मदद करते औरों को ऊपर उठाते ..

एक अच्छाइयों की ऊँचाइयों पर ,

और कुछ लोग होते है खाइयों से .

बस किसी ना किसी को बिन बात

बिना कारण गिराने की कोशिश में.

सही भी तो है – जिसके पास जो है

वही तो दूसरों को दे सकते है.

ऐसे भी तो होते है कुछ लोग

सागर जैसे गहरे औ शीतल शांत.

ना जाने क्यों कुछ लगते हैं रेगिस्तान के

तपते जलाते शुष्क रूखे गर्म रेत से .

लोग वही लौटाते हैं जो उनके पास है .