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India could soon have more writers than readers: Ruskin Bond

समाज में लेखकों की गिनती बढ़ना,

बुद्धिजीवियों के बढ़ने की पहचान है.

लेखक तो स्वभाविक रूप से पाठक होते है.

अच्छा लिखने की पहली शर्त है पढ़ना .

इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि पाठक कितने है?

 

आप सब इस कथन पर अपने विचार देने के लिये आमंत्रित है।

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कौन चाहता है ग़मों में डूबे रहना ?

सुझाव दिया किसी ने –

इतने दिन कौन दुःख मनाता है ?

अब ठीक हो जाओ.

मेरे जैसे नासमझ को मालूम नहीं

कहाँ हैं वह नियम पुस्तिका,

अॉन- अॉफ स्विच, मूड मिज़ाज का,

अपने को ठीक करने का .

वरना कौन  चाहता है

ग़मों में डूबे रहना?

यादों को क़ैद या यादों में क़ैद ?

बड़े सिद्दत से, संजीदगी से ,

यादों को क़ैद कर रही थी .

मन में, ख़यालों में,

कुछ नई यादों में भी.

जब लगा कुछ मीठी सी

जमा हो चुकी

है यादे .

तब समझ आया

नहीं क़ैद मेरे पास कुछ भी .

मैं हीं क़ैद हूँ यादों में.