ज़िंदगी के रंग -150

वजूद है मेरी कुछ उलझी , कुछ सुलझी

अटकी इक तारीख़ के साथ.

जिसके आने का इंतज़ारों रहता

है और जाने का भी, यादों को झिंझोड़कर .

तुमसे बस यही पूछना था …..

जाने से पहले याद किया था क्या ?