ज़िन्दगी के रंग – 154

हम इंसान हर बात में भेदभाव,

अंतर खोज लेते हैं,

पर कैसा भी फूल क्यों ना हो,

बिना अंतर किए मधुमक्खी उससे

मीठा शहद बना ही लेती है.

8 thoughts on “ज़िन्दगी के रंग – 154

  1. हम सृष्टि में अपने आप को सबसे श्रेष्ठ मानते है।मगर ये भी सच है कि इस धरती पर बुरे भी हम ही है।जो भी जीव जंतु इस धरती पर है।वो सारे ही प्यारे और निर्मल होते है।बस हम गौर करें।

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    1. सरिता , हम श्रेष्ठ तो है पर बेहद स्वार्थी हैं. जबकि पशु प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं और हम प्रकृति से खिलवाड़ करते हैं.

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      1. बेहतरीन बात कही आपने।हम जीवनी को लिख सकते हैं और भी कई कारण हमारी श्रेष्ठता का है मगर हमारी स्वार्थी सोच हमें सृष्टि के सभी जीवों से नीचे ला खड़ा करता है मगर हम सोचने को तैयार नहीं।

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      2. बहुत सही कहा आपने।हम स्वार्थी है इसलिए ही तो हम उनके जीवन से खिलवाड़ करने से भी नही चूकते।

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      3. काश कि श्रेष्ठतम होने के साथ विनम्र भी हों तब विश्व विनाश की ओर बढ़ने से रुक जाएगा .

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