गाँठें

ख़ुद को समेटते समेटते

ना जाने कब दर्दे जिगर

खुल कर बिखर गए.

जितनी बार बांधा

उतनी बार ज़ख़्मों की

गाँठे खुल खुल गई.

शायद चोट को

खुला छोड़ देना हीं मुनासिब है.

खुली बयार और वक़्त

हीं इन्हें समेट ले ….भर दे .

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Assam: Father tries to sacrifice child on self-styled godman’s advice, cops intercept in the nick of time

यह विडंबना हीं है कि

आज के वैज्ञानिक युग में

विज्ञान के शिक्षक के ऐसे विचार .

https://www.timesnownews.com/mirror-now/crime/article/assam-govt-teacher-sets-to-sacrifice-child-on-self-styled-godmans-advice-police-reaches-in-nick-of-time/450223?utm_campaign=fullarticle&utm_medium=referral&utm_source=inshorts