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हवाएँ तय करती हैं……

चिंगारी को हवा आग बना देती है,

प्राणदायिनी बन यही जीवन दान देती है।

बाँस से गुजर उसे बाँसुरी बना मधुर सूर गुँजा देती है।

किसी को तौलने से पहले ,

यह समझना जरुरी है कि व्यवहार

हवाएँ तय करती हैं……..

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ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले

ख़्वाहिशों के क़ाफ़िले बड़े अजीब होते हैं…

ये गुज़रते वहीं से हैं जहाँ रास्ते नहीं होते…!!

 

 

 

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जिजीविषा -जीने की चाह, Will to live

सूर्य के उदय से अस्त होने के साथ घटती आयु,

जन्म, जरा, कष्ट, और मृत्यु को देखकर भी मनुष्य को भय  नहीं होता।

आशा , तृष्णा, राग- द्वेष, तर्क-वितर्क,  अधैर्य , अज्ञान-वृत्ति-दर्प-दम्भ रूपी भंवर

से पार पाना  है कठिन ।

कायांत या शरीर का अंत,  अंतअमरत्व स्वाभाविक अवस्था है……

अनश्वरता एक भूल है……..

जिजीविषा  का संहार करने वाले काल है शाश्वत सत्य……..

यह सारा सत्य जान कर भी सभी

 जगत के मोहरूपी मादक मदिरा में ङूब जाते हैं।

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जिंदगी के रंग -67

साँसे चले …समय गुजरता रहे बस …..

क्या यही है ज़िंदगी?

ना मक़सद …. ना ख़्वाब ……

हसीन तोहफ़ा है यह ज़िंदगी.

थोड़ी तमन्ना, अभिलाषा, लालसा

 लक्ष्य…. मकसद मिला कर 

गुनगुनाइये…..

राहें खुलती जायेंगीं।

 

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रंजिश

आज हीं कहीं यह पढ़ा और  सलाह कुछ अधूरी सी लगी इसलिए कुछ पंक्तियाँ जोड़ दी-

लम्हे फुर्सत के आएं तो, रंजिशें भुला देना दोस्तों,

किसी को नहीं खबर कि सांसों की मोहलत कहाँ तक है ॥

नई पंक्तियाँ

अच्छा हो रंजिशे पैदा करनेवाली आदतों को भुला देना ,

किसी को पता नहीं ये आदतें कहाँ तक चुभन पहुँचाएगी .

ना रंजिशे होंगी ना भुलाने की ज़रूरत .

ज़िंदगी और साँसों के मोहलत की गिनती की भी नहीं ज़रूरत.

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नज़रें उठाना और गिराना

ढेरों बातें और यादें बटोरे

गिले-शिकवे की पोटलियाँ समेटे

इंतज़ार में,  राहों में पलके बिछाये बैठे थे …..

उनका आना, नज़रें उठाना और गिराना

सारे ल़फ्ज ….अल्‍फाज़ चुरा ले गया।

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वर्तमान

भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है इसका भय अौर चिन्ता,

भूत काल की यादें, दुख ….अफसोस ….पछतावा

क्या कुछ बदल सकता है ?

फिर क्यों नहीं चैन से साँस लिया जाय

अौर वर्तमान में …..

जिया जाये ? ?