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 Meaning of ॐ….OM

Meaning
​ॐ apart from the normal Om sometimes also refers to as omkara (ओंकार oṃkāra) or aumkara (औंकार auṃkāra). Like Ik Onkar ੴ. Sentences/phrases/scriptures can start from Om ‘ॐ नमः शिवाय‘ or even end at it हरिओम

Some of its definitions:

bhūtaü bhavad-bhaviùyad-iti sarvam Omkāra eva

(What had happened before, what is now and what will be later – everything is just Om)

Sometimes referred to as praṇava, literally “that which is sounded out loudly”.
Sometimes it is defined as “the sound of the universe”
Michael Carroll, dean of the Kripalu School of Yoga. said “It’s big. Om is nebulous, and it’s vague. It can mean almost anything.”

ॐ signifies slew of trios:

The heavens, earth, and the underworld
The Hindu gods Brahma, Vishnu, and Shiva (aka creator god, sustainer god, and destroyer god)
The waking, dreaming, and dreamless states are some of it

Phonetically speaking:

The A (aahhh) sound represents the creation aspect of the universe and all of the gross objects within it. Ahh is the beginning of all sounds. With this syllable you experience the existence of the world through the activity of the senses.

The U (oooh) sound signifies the maintaining energy of the universe and the subtle impressions of the mind. It connects us to an inner sense of something greater than that which we can see and feel with our senses.

The M (mmmm) sound characterizes the transformative energy of the universe and the thoughts and beliefs of your beingness. This sound unites you to the awareness of oneness.

The fourth sound is silence or anagata. It is the vibration which is beyond verbal pronunciation. It is pure consciousness of the Self or the Atman

One of the hypothesis/belief further goes that when we sound om together, we’re aligning body/mind/spirit; we’re aligning with one another; we’re aligning with the universe because it’s the sound of the universe and we’re referencing sometcurve.

1 –This curve represents the waking state.
2 – This curve represents deep sleep or the unconscious.
3 – This curve represents the dream state (which lies between waking and deep sleep)
4- The dot represents the absolute state of consciousness which illuminates
all other states of consciousness.
5 –The semicircle represents माया (or the veil of illusion.) it separates
the absolute from the other three curves.

Source:  Meaning of ॐ….

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विश्वकर्मा पूजा Vishwakarma Day

 Vishwakarma Jayanti / Puja is a day of celebration for  Hindu god, Vishwakarma .He is considered divine architect, Creator of fabulous weapons for the Gods and is credited with Sthapatya Veda, the science of mechanics and architecture.

हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विश्वकर्मा निर्माण एवं सृजन के देवता कहे जाते हैं। माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही इन्द्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक, लंका आदि का निर्माण किया था। इस दिन विशेष रुप से औजार, मशीन तथा सभी औद्योगिक कंपनियों, दुकानों आदि पूजा करने का विधान है।

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रक्षाबंधन की कहानी   (Rakhi -celebration of brother and sister love)

 

 

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राखी का त्योहार लक्ष्मी  जी ने  दानव राज  बाली को राखी बाँध कर   शुरू किया था.  दानव राज  राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहें थे. नारायण ने राजा बालि की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के लिये  वामन/ बौना  अवतार लिया. बाली दानी राजा था. नारायण ने वामन बन बाली  से दान में तीन पग या तीन क़दम  धरती माँगी. बाली ने वामन का  छोटा आकार देख हामी भर दी. तब नारायण ने विराट रुप ले कर  तीन पग में उसकी सारी धरती नाप ली और  बाली को पाताल लोक का राज्य रहने के लिये दें दिया l

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चतुर बाली ने नारायण की बात मानते हुए अपनी एक  कामना पूरी  करने का वचन तीन बार – त्रिवाचा लिया. नारायण अपनी सफलता से प्रसन्न हो तीन बार बाली से कह बैठे – “दूँगा दूँगा दूँगा”.  तब  बलि  ने नारायण से कहा – ” मेरे सोने  और जागने पर  जिधर भी मेरी दृष्टी  जाये उधर आप ही नजर आयें. वचनबद्ध नारायण बाली के जाल में फँस चुके थे. वे वहीँ वास करने लगे.

काफी समय तक नारायण के  ना लौटने पर लक्ष्मी जी को चिंता हुई. उन्हों ने घुम्मकड  नारद जी पूछा -“आप तो तीनों लोकों में घूमते हैं क्या नारायण को कहीँ देखा हैं ?”नारद जी बताया , नारायण तो  पाताल लोक में हैं राजा बलि के  पहरेदार बन गये हैं.  चिंतित और व्यथित  लक्ष्मी जी के पूछने पर नारद  ने उन्हें राजा बलि को अपना  भाई बना रक्षा बंधन बाँध, रक्षा  का वचन लेने की सलाह दी.  उससे त्रिवचन  लेने कहा और रक्षा बंधन के उपहार स्वरूप नारायण को माँगने का सुझाव दिया.

    लक्ष्मी   सुन्दर नारी बन   रोते हुये  बलि  के पास गई. बाली के पूछने पर उन्हों ने  उत्तर दिया -” मेरा कोई भाई नहीँ हैं, जो मेरी रक्षा करे. इसलिए मैं दुखी हूँ .द्रवित हो  बलि उन्हें  अपनी धर्म बहन बना लिया. उपहार में लक्ष्मी ने जब उसके  पहरेदार को माँगा,  तब बाली को सारी बातें समझ आई. पर बाली ने वचन का मान रख लक्ष्मी को बहन बनाया और उपहार में नारायण को लौटाया. तब से रक्षाबन्धन का त्योहार  शुरू हुआ. आज़ भी जानकार  कलावा बाँधते समय यह  मंत्र बोलते हैं –

“येन बद्धो राजा बलि दानबेन्द्रो महाबला तेन त्वाम प्रपद्यये रक्षे माचल माचल:” 

जैसे  महाबली दांनवेंद्र  बाली ने  वचन का सम्मान  कर  रक्षा  किया, वैसे तुम मेरी  रक्षा करो, रक्षा  करो. बाली ने दानव होते हुए रिश्ते का मान रखा.

 

 

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छाया  चित्र  इन्टरनेट  से.

 

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कोणार्क मंदिर -चमकते सूर्य और बोलते पत्थरों का काला पैगोड़ा ( यात्रा वृतांत और पौराणिक कथा )

          IMG-20150423-WA0001जब सूर्य या अर्क एक  विशेष समय पर, एक ख़ास कोण से उदित होते हैं।  तब  कोणार्क मंदिर मेँ एक दिव्य दृश्य दिखता है। लगता है जैसे सूर्य देव मंदिर के अंदर जगमगा रहें है। शायद  इसलिए यह  मंदिर कोणार्क कहलाया । यहाँ सूर्य को बिरंचि-नारायण भी  कहा जाता है।  इसका काफी काम काले ग्रेनाईट पत्थरों से हुआ है।  इसलिए इसे काला पैगोड़ा भी कहा जाता है। 

पौराणिक मान्यता रही  है कि सूर्य की किरणों में अनेक रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं विशेष कर त्वचा रोग  के उपचार के लिए प्राचीन काल से सूर्य उपासना प्रचलित था। आज भी छठ पूजा और अन्य सूर्य उपासनाएँ प्रचलित है।

 आज, आधुनिक  विज्ञान ने भी सूर्य के किरणों के महत्व को  स्वीकार किया  है।  किवदंती है कि कृष्ण- पुत्र   साम्ब  कोढ़ग्रस्त    हो गए। तब सांब ने  मित्रवन में चंद्रभागा   नदी और  सागर के  संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की। सूर्य देव ने  प्रसन्न हो कर  सांब के  रोगों का  नाश  किया। 

तब साम्ब  चंद्रभागा  नदी में स्नान करने गए । वहाँ  उन्हें  सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली।  मान्यता है कि इस  मूर्ति  के रचनाकर देव शिल्पी   विश्वकर्मा स्वयं  थे। उन्होने  सूर्यदेव के शरीर के तेज़ से   इस मूर्ति का  निर्माण किया  था। साम्ब ने “कोणार्क सूर्य   मंदिर’ बनवा कर इस मूर्ति की वहाँ  स्थापना किया।

यह मंदिर एक  रथ रूप में बना है। जिसे सात घोड़े  खींच  रहें हैं।यह  अद्वितीय सुंदरता और शोभामय शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण उत्कृष्ट मंदिर  है। यह  मनमोहक  स्थापत्यकला का उदाहरण है। पत्थर पर जीवंत  भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र उकेरे हुए हैं।यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है, जिन्हे कामसूत्र  से लिया गया  है।।ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहतें हैं। इस मंदिर में इसी कल्पना को मूर्त रूप में उतारा  गया है।

इस मंदिर के निर्माण कला को कलिंग शैली कहा गया है। यह  पूरा मंदिर अर्क या सूर्य के रथ के रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं। इस मंदिर में  बड़े दिलचस्प तरीके से पहर और महीनों का चित्रण किया गया है। रथ के बारह पहिये/ चक्के या चक्र  लाजवाब नक्कासी से पूर्ण हैं। ये बारह चक्र वर्ष के  बारह महीनों के प्रतीक हैं। इन चक्कों में   आठ अर हैं , जो दिन के  आठ प्रहर के सूचक हैं। आधुनिक घड़ी के उपयोग में आने से पहले तक दिन के समय की पहचान पहर/प्रहर के आधार पर होती थी। आज भी हम दिन के दूसरे प्रहर को आम बोलचाल में दोपहर कहते हैं। इस रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं ।

 कोणार्क  मंदिर युनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व धरोहर है। यह भारत के उड़ीसा राज्य में, पूरी में स्थित  है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 1236 से 1264 के दौरान निर्मित हुआ है। गंग वंश के राजा नृसिंह देव ने इसका निर्माण  करवाया था। इसके निर्माण में काले  ग्रेनाईट पत्थरों का बहुलता से  उपयोग हुआ है। साथ ही लाल बलुआ पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ है। मान्यता हैं कि इसमे दधिनौती या गुम्बज पर एक विशाल चुम्बक लगा था. जिसकी सहायता से इस के अंदर सूर्य की हीराजटित मूर्ति हवा में लटकी रहती थी. विदेशी लुटेरों ने चुम्बक निकाल लिया, जिस से मंदिर ध्वस्त होने लगा. एक मान्यता यह भी हैं कि इस चुम्बक से समुद्र से गुजरने बाले जहाजों के दिशा यंत्र काम करना बंद कर देते थे.

  आज मंदिर का बहुत भाग ध्वस्त हो चुका है। पर इस खंडित और ध्वस्त  मंदिर के सौंदर्य से अभिभूत हो नोबल पुरस्कार प्राप्त कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कभी कहा था-

        “कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।”

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गुप्त कामाख्या – दीर्घेस्वरी मंदिर गौहाटी –( यात्रा संस्मरण और वहाँ की पौराणिक कहानियाँ )

 

दिनांक – 10.2.2015, बुधवार। समय दोपहर – 12:30
यह मंदिर भारत सरकार द्वारा सुरक्षित प्राचीन स्मारक है। यहाँ पत्थरों पर अनेक रचनाएँ / आकृतियाँ प्राचीन समय की हैं। यहाँ के पुजारी के अनुसार यह गुप्त कामाख्या के रूप में भी जाना जाता है। यह गौहाटी शहर के उत्तर में, ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित है। सड़क के किनारे कुछ पूजा सामग्री की दुकाने हैं। वहीं से मंदिर की सीढ़ियाँ शुरू होती है। थोड़ा ऊपर जाने पर बाईं ओर चट्टान पर गणेश जी विशाल प्रतिमा बनी है। जो सिंदूर आरक्त है। बगल में चट्टान पर विशाल पीपल वृक्ष है। मंदिर में आने-जाने के लिए अन्य सीढ़ियां भी बनी है। मंदिर तक की सीढ़ियों को चढ़ने के दौरान अनेकों प्रतिमाएँ चट्टानों पर बनी दिखती हैं। मंदिर परिसर में माँ के पद चिन्ह बने है।जहां पुष्प और सिंदूर चढ़ाये जाते है।
इस मंदिर का निर्माण राजा स्वर्गदेव शिव सिंह ने 1714 से 1744 में करवाया था। इस वंश के बाद के राजाओं ने भी इसकी देखभाल की। तत्कालीन राजाओं ने यह जानकारी एक पत्थर पर अंकित करवाया था। जो आज भी मंदिर के पीछे के द्वार पर उपलब्ध है। यह मंदिर पथरीली पहाड़ी के ऊपर है। यहाँ दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े धूम-धाम से होता है तथा भैंसे की बलि दी जाती है।
मंदिर के अंदर जाने के लिया सीढ़ियों से अंदर उतरना पड़ता है। ये सीढ़ियाँ एक छोटी अंधकरमय गुफा में ले जातीं हैं। यह प्रकृतिक रूप से बनी गुफा है। यह मंदिर का गर्भगृह है। जहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते है। उसकी रोशनी में मंदिर के एक कोने में बैठे पुजारी पूजा-अर्चना करवाते हैं। पुजारी जी से पूछने पर उन्होने वहाँ से जुड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई।
किवदंतियाँ –
1) ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर मार्कन्डेय मुनि का आश्रम हुआ करता था। मंदिर के गर्भगृह में उन्होने माँ दुर्गा की आराधना की। माँ ने इस गर्भगृह में उन्हे दर्शन दिया था। यहीं पर उन्होने मार्कन्डेय पुराण की रचना की थी।
2) इस मंदिर को भी शक्तिपीठ कहा गया है। इस स्थान को गुप्त कामाख्या भी कहते है। ऐसा कहा जाता है कि कामाख्या माँ के दर्शन के बाद यहाँ दर्शन लाभदायक होता है।गौहाटी में कामाख्या मंदिर के बाद दीर्घेस्वरी मंदिर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। एक मान्यता यह भी है कि यहाँ भी सती के कुछ अंग गिरे थे ।

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मुरूगन मंदिर के अद्भुत पुजारी जिसे मैं भूल नहीं पाई ( यात्रा वृतांत और प्रेरक कहानी )

यह घटना लगभग 3-4 वर्ष पुरानी है। मैं सपरिवार दक्षिण की यात्रा पर गई थी। वापसी में मैं मदुरै पहुँची। वहाँ के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर के सौंदर्य से हम सभी अभिभूत थे। इसलिए मै वहाँ के दूसरे महत्वपूर्ण मुरूगन (कार्तिकेय ) मंदिर को देखने का लोभ रोक नहीं सकी। मीनाक्षी मंदिर देखने में काफी समय लग गया था। फिर भी संध्या में मै सपरिवार मुरूगन मंदिर पहुँची। पता चला, मंदिर के बंद होने का समय हो रहा है। मंदिर दर्शन के लिए लंबी लाईन लगी थी। लग रहा था, इस भीड़ में मंदिर में प्रवेश असंभव है। हमारे पास समय कम था।

कुछ राह नहीं सूझ रहा था। अगले दिन सुबह-सुबह वापस लौटने का टिकट कटा था। अतः दूसरे दिन भी दर्शन संभव नहीं था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। थोड़े सोच-विचार के बाद हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट लेने का निर्णय लिया। दक्षिण के मंदिरों में विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट द्वारा तत्काल दर्शन की बड़ी अच्छी व्यवस्था है। हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट खिड़की खोजने का प्रयास किया। पर असफल रहे। लोगों से पूछना चाहा। पर भाषा की समस्या सामने आ गई। हिंदी और अँग्रेजी में लोगों से मदद लेने का असफल प्रयास किया। कोई लाभ नहीं हुआ।
मंदिर के वास्तुकला से मैं बहुत प्रभावित थी। भव्य, नक़्क़ाशीदार दीवारें, विशाल मंदिर, चट्टानों की ऊँची -ऊँची सीढ़ियाँ और खंभे सब अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। यह मंदिर मदुरै से आठ किलोमीटर दूर है। इसे थिरुप्परमकुनरम मुरुगन मंदिर भी कहते हैं। भगवान मुरूगन के साथ-साथ भगवान शिव , भगवान विष्णु , भगवान विनायक और देवी दुर्गा भी यहाँ स्थापित हैं। पौराणिक कथा या किवदंती है कि इस स्थान पर भगवान मुरुगा ने देवराज इंद्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था।

हमलोग निराश होने लगे। लगा, बिना दर्शन के वापस लौटना होगा। तभी थोड़े उम्रदराज, पुजारी जैसे लगाने वाले एक व्यक्ति हमारे पास आए। वे अपनी भाषा में कुछ कह रहे थे। पर हमें कुछ समझ नहीं आया। हमने हिंदी और अँग्रेजी में उनसे विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट पाने का स्थान पूछा। पर वे हमारी बात नहीं समझ सके। किसी तरह हम इशारे से यह समझाने में सफल हुए कि हम मंदिर में दर्शन करना चाहते है। उन्होने हम सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया और तत्काल अपने साथ मंदिर के अंदर ले गए। सभी ने उन्हे और हम सभी को तुरंत अंदर जाने का मार्ग दिया। मंदिर के गर्भगृह के सभी पुजारियों ने उन्हे बड़े सम्मान से प्रणाम किया और हमें दर्शन कराया। वे शायद वहाँ के सम्मानीय और महत्वपूर्ण पुजारी थे।
गर्भगृह से बाहर आ कर उन्होने एक जगह बैठने का इशारा किया। थोड़े देर में वे फूल, माला और प्रसाद के साथ लौटे। हमें बड़े प्यार से टीका लगाया और प्रसाद दिया। हम हैरान थे। एक प्रतिष्ठित और उच्च पदासीन पुजारी हम अनजान लोगों की इतनी सहायता क्यों कर रहे हैं? हमे लगा अब पुजारी जी अच्छी दक्षिणा की मांग करेंगे।
अतः मेरे पति अधर ने उन्हे कुछ रुपये देना चाहा। पर उन्होने लेने से इंकार कर दिया। हमारे बार-बार अनुरोध पर सामान्य सी धन राशि दक्षिणा स्वरूप ली।
इस घटना ने हमे पुजारी और ईश्वर की लीला के सामने नत मस्तक कर दिया। हम सभी एक अजनबी शहर के अजनबी पुजारी के सौजन्य की यादों के साथ वापस लौटे।

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कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

                                                                  क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

दिनांक – 9.2.2015, मंगलवार। समय संध्या 4:15
आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

                      ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

                      कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
                    कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

                                       कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
                                     त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती