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धोखा (कहानी)

यह एक सच्ची कहानी के ताने-बाने पर बुनी कथा है।

सुषमा बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था.

अचानक ही एक दिन बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा – सब इतना अच्छा है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ?

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता. सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते. उसे लगता , यह सब सपना तो नहीँ है ?

हाँ , दो पुत्रियों की माता , उसकी जेठानी ज़रूर थोड़ी उखड़ी -उखड़ी रहती. पर वह रसोई और बेटियों मॆं ही ज्यादा उलझी रहती. कभी उनकी दोनों प्यारी -प्यारी बेटियाँ छोटी माँ – छोटी माँ करती हुई उसके पास पहुँच जाती. ऐसे में एक दिन जेठानी भी उनके पीछे -पीछे उसके कमरे मॆं आ गई. कुछ अजीब सी दृष्टि से उसे देखती हुई बोल पड़ी -” क्यों जी , दिन भर कमरे मॆं जी नहीँ घबराता ? जानती हो … ” वह कुछ कहना चाह रहीं थी.

अभी जेठानी की बात अधूरी ही थी. तभी उसकी सास कमरे में पहुँच गई. बड़ी नाराजगी से बड़ी बहू से कहने लगी -” सुषमा को परेशान ना करो. नई बहू है. हाथों की मेहन्दी भी नहीँ छूटी है. घर के काम मैं इससे सवा महीने तक नहीँ करवाऊगी. यह तुम्हारे जैसे बड़े घर की नहीँ है. पर मुन्ना की पसंद है.” सुषमा का दिल सास का बड़प्पन देख भर आया.

नाग पंचमी का दिन था. सुषमा पति के साथ मंदिर से लौटते समय गोलगप्पे खाने और सावन के रिमझिम फुहार मॆं भीगने पति को भी खींच लाई. जब गाना गुनगुनाते अध भीगे कपडों में सुषमा ने घर में प्रवेश किया. तभी सास गरज उठी -“यह क्या किया ? पानी मॆं भींगने से मुन्ना की तबियत खराब हो जाती है.” वे दवा का डब्बा उठा लाईं. जल्दी-जल्दी कुछ दवाईया देने लगी. सुषमा हैरान थी. ज़रा सा भीगने से सासू माँ इतना नाराज़ क्यों हो गई ?

शाम होते ही उसके पति को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया. सास उससे बड़ी नाराज थीं. पारिवारिक , उम्रदराज डाक्टर आये. वह डाक्टर साहब के लिये चाय ले कर कमरे के द्वार पर पहुँची. अंदर हो रही बातें सुनकर सन्न रह गई. डाक्टर सास से धीमी आवाज़ मॆं कह रहे थे – लास्ट स्टेज में यह बदपरहेजी ठीक नहीँ है. आपको मैंने इसकी शादी करने से भी रोका था.

सुषमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. लगा जैसे चक्कर खा कर गिर जायेगी. तभी न जाने कहाँ से आ कर जेठानी ने उसे सहारा दिया. उसे बगल के कमरे में खींच कर ले गई. उन्होने फुसफुसाते हुए बताया , उसके पति को कैंसर है. इस बात को छुपा कर उससे विवाह करवाया गया. ताकि उसका पति मरने से पहले गृहस्थ सुख भोग ले.

सास ने सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोचा. पर उसका क्या होगा ? पति से उसे वितृष्णा होने लगी. ऐसे सुख की क्या लालसा , जिसमे दूसरे को सिर्फ भोग्या समझा जाये. तभी सास उसे पुकारती हुई आई – ” सुषमा….सुषमा..तुम्हें मुन्ना बुला रहा है. जल्दी चलो. वह भारी मन से कमरे के द्वार पर जा खड़ी हुई.।

बिस्तर पर उसका पति जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था. पीडा से ओठ नीले पड गये थे. सुषमा ने कभी मौत को इतने करीब से नहीँ देखा था. घबराहट से उसके क़दम वही थम गये. तभी अचानक उसके पति का शरीर पीडा से ऐंठ गया और आँखों की पुतलिया पलट गई.

सास जलती नज़रों से उसे देख कर बुदबुदा उठी – भाग्यहीन , मनहूस, मेरे बेटे को खा गई. उससे लाड़ करनेवाला ससुराल , और उसे प्यार से पान के पत्ते जैसा फेरने वाली सास पल भर में बदल गये. सास हर समय कुछ ना कुछ उलाहना देती रहती.सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर रह गई. उसके बाद सुषमा को कुछ सुध ना रहा. सास ने ठीक तेरहवीं के दिन, सफेद साड़ी में, सारे गहने उतरवा कर घर के पुराने ड्राइवर के साथ उसे उसके मैके भेज दिया.

सुषमा की माँ ने दरवाजा खोला. सुषमा द्वार पर वैधव्य बोझ से सिर झुकाये खड़ी थी. वह सचमुच पत्थर बन गई थी. वह पूरा दिन किसी अँधेरे कोने मॆं बैठी रहती. सास के कहे शब्द उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन, मनहूस…. उसका पूरा परिवार सदमें मॆं था. तभी एक और झटका लगा. पता चला सुषमा माँ बनने वाली हैं.

तब सुषमा के पिता ने कमर कस लिया. वैसी हालत में ही सुषमा का दाखिल तुरंत नर्सिंग की पढाई के लिये पारा मेडिकल कॉलेज में करवा दिया. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करते रहती. उसके पापा हर रोज़ अपनी झुकती जा रही कमर सीधी करते हुए, बच्चों की तरह उसका हाथ पकड़ कर कालेज ले जाते और छुट्टी के समय उसे लेने गेट पर खड़े मिलते.

मई की तपती गर्मी में सुषमा के पुत्र ने जन्म लिया. सुषमा अनमने ढंग से बच्चे की देखभाल करती. कहते हैं, समय सबसे बड़ा मरहम होता है. सुषमा के घाव भी भरने लगे थे. पर पुत्र की और से उसका मन उचाट रहता. जिस समय ने उसके घाव भरे थे. उसी बीतते समय ने उसके वृद्ध होते पिता को तोड़ दिया था. ऊपर से शांत दिखने वाले पिता के दिल में उठते ज्वार-भाटे ने उन्हें दिल के दौरे से अस्पताल पहुँचा दिया. अडिग चट्टान जैसा सहारा देने वाले अपने पिता को कमजोर पड़ते देख सुषमा जैसी नींद से जागी. उसने पिता की रात दिन सेवा शुरू कर दी.

पिता की तबियत अब काफी ठीक लग रही थी. उनके चेहरे पर वापस लौटती रंगत देख सुषमा आश्वस्त हो गई. वह रात में पापा के अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सोती थी. वह पुनम की रात थी. खिड़की से दमकते चाँद की चाँदनी कमरे के अंदर तक बिखर गई थी. तभी पापा ने उसे अपने पास बुला कर बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले बोले -” बेटा, तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मज़बूती से….समझी ?

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ” पिता ने उसकी बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन नहीँ हो.बस एक धोखे और दुर्घटना की शिकार हो. जिसमें गलती तुम्हारी नहीँ , मेरी थी. अक्सर मुझे पश्चाताप होता है. तुम्हारी शादी करने से पहले मुझे और छानबीन करनी चहिये थी.”

भीगे नेत्रों से उन्हों ने अपनी बात आगे बढाई -“पर जानती हो बिटिया, असल गुनाहगार धोखा देनेवाले लोग है. एक बात और बेटा, तुम इसका प्रतिशोध अपने पुत्र से नहीँ ले सकती हो. उसका ख्याल तुम्हें ही रखना है.” थोड़ा मौन रह कर उसके नेत्रों में देखते हुए पिता ने कहा – “भाग्यहीन तुम नहीँ तुम्हारी सास है. बेटे को तो गंवाया ही. बहू और पोते को भी गँवा दिया. पर कभी ना कभी ईश्वर उन्हें उनकी गलतियों का आईना ज़रूर दिखायेगा. ईश्वर के न्याय पर मुझे पूर्ण विश्वाश हैं.”

पापा से बातें कर सुषमा को लगा जैसे उसके सीने पर से भारी बोझ उतर गया. पढाई करके उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई. वह बेटे के साथ खेल कर अपना दुःख भूल खिलखिलाने लगी । किसी न किसी से उसे अपने ससुराल की ख़बरें मिलती रहती. देवर की शादी और उसे बेटी होने की खबरें मिली. पर सुषमा को ससुरालवालों ने कभी उसे याद नहीँ किया. सुषमा ने भी पीछे मुड़ कर देखने के बदले अपने आप को और बेटे को सम्भालने पर ध्यान दिया.

उस दिन सुषमा अस्पताल पहुँची. वह आईसीयू के सामने से गुजर रही थी. तभी सामने देवर और जेठ आ खडे हुए. पता चला सास बीमार है. इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें इस बात का बहुत ग़म है कि सुषमा के पुत्र के अलावा उन्हें पोता नहीँ सिर्फ पोतिया ही है. अब वह सुषमा और उसके बेटे को याद करते रहती हैं. एक बार पोते क मुँह देखना चाहती हैं.

देवर ने कहा – “भाभी, बस एक बार मुन्ना भैया के बेटे को अम्मा के पास ले आओ. सुना है बिल्कुल भैया जैसा है. ” तभी जेठ बोल पड़े – सुषमा , मैं तो कहता हूँ. अब तुम हमारे साथ रहने आ जाओ. मैं कल सुबह ही तुम्हे लेने आ जाता हूँ. सुषमा बिना कुछ जवाब दिये अपनी ड्यूटी कक्ष में चली गई.वह उनकी बेशर्मी देख वह अवाक थी. वह चुपचाप अपना काम कर रहीं थी. पर उसके माथे पर पड़े शिकन से स्पष्ट था, उसके मन में बहुत सी बातो का तूफान चल रहा हैं.

वह सोंच रहीं थी , पहले तो उसे खिलौना समझ मरनासन्न पुत्र की कामना पूरी करने के लिये धोखे से विवाह करवाया. बाद में दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक दिया. आज़ अपनी पौत्रियों को पौत्र से कम आँका जा रहा है. क्योंकि वे लड़कियाँ हैं. अच्छा है वह आज़ ऐसे ओछे परिवार का हिस्सा नहीँ है. क्या उसके पुत्र को ऐसे लोगों के साथ रख कर उन जैसा बनने देना चाहिये ? बिल्कुल नहीँ. वह ऐसा नहीँ होने देगी. मन ही मन उसने कुछ निर्णय लिया. घर जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्जी दी.

उसी रात को वह ट्रेन से बेटे को ले कर निकट के दूसरे शहर चली गई. वहाँ के अच्छे बोर्डिंग स्कूल में बेटे का नाम लिखवा दिया. काफी समय से बेटे का दाखिला इस स्कूल में करवाने का मन बना रहीं थी. वह तीन -चार दिनों के बाद वापस घर लौटी.अगले दिन अस्पताल के सामने ही देवर मिल गया. उसे देख कर लपकता हुआ आया और बोल पड़ा -भाभी , अम्मा की तबियत और बिगड़ गई हैं. आप कहाँ थी ?

सुषमा चुपचाप हेड मेट्रन के कमरे में अपनी ड्यूटी मालूम करने चली गई. उस दिन उसकी ड्यूटी उसके सास के कमरे में थी. वह कमरे में जा कर दवाईया देने लगी. सास उसके बेटे के बारे में पूछने लगी. सुषमा ने शालीनता से कहा – “ईश्वर ने आपके घर इतनी कन्याओं को इसलिये भेजा हैं ताकि आप उनका सम्मान करें. जब तक आप यह नहीँ सीखेंगी , तब तक आप अपने इकलौते पौत्र का मुँह नहीँ देख सकतीं.”

सास क चेहरा तमतमा गया. लाल और गुस्से भरी आँखों से उसे घुरते हुए बोल पड़ी – “भाग्यहीन .. तुम धोखा कर रहीं हो , मेरे पौत्र को छुपा कर नहीँ रख सकतीं हो. lतुम्हारे जैसी मामूली लड़की की औकात नहीँ थी मेरे घर की बहू बनने की…” सुषमा ने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा “भाग्यहीन मैं नहीँ आप हैं. सब पा कर भी खो दिया. आपने मुझे धोखा दिया पर भगवान को धोखा दे पाई क्या ? आपको क्या लगता हैं एक सामान्य और मामूली लड़की का दिल नहीँ होता हैं ? उसे दुख तकलीफ़ की अनुभूति नहीँ होती? एक बात और हैं, देखिये आज़ आपको मेरे जैसी मामूली लड़की के सामने इतना अनुनय – विनय करना पड रहा है.”

अगली सुबह सास के कमरे के आगे भीड़ देख तेज़ कदमों से वहाँ पहुँची. पता चला अभी -अभी दिल का दौरा पड़ने से सास गुजर गई. पास खडे अस्पताल के वार्ड बॉय को कहते सुना -” दिल की मरीज थीं. कितनी बार डाक्टर साहब ने ने इन्हें शांत रहने की सलाह दी थी. अभी भी ये अपनी बहुओं को बेटा ना पैदा करने के लिये जोर – जोर से कोस रहीं थीं. उससे ही तेज़ दिल का दौरा पड़ा.”

सुषमा ने पापा को फोन कर सास के गुजरने की ख़बर दी. वह आफिस में माथे पर हाथ रखे बैठी सोंचा में डूबी थी -पौत्र से भेंट ना करा कर उसने गलती कर दी क्या ? तभी पीछे से पापा की आवाज़ आई – ” सुषमा, जिसके पास सब कुछ हो फ़िर भी खुश ना हो. यह उसकी नियति हैं. यह ईश्वर की मर्जी और न्याय हैं.”

हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं। तब विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?

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rekhasahay

सुषमा  बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था. 

अचानक ही एक दिन  बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा   – सब  इतना अच्छा  है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ? 

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक  देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह  घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता.  सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते.  उसे लगता ,  यह सब सपना तो…

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एक नन्ही परी (कन्या भ्रुण हत्या पर आधारित मार्मिक कहानी )A story on female foeticide

MP village infamous for foeticide to marry off daughter after 40 yearsINDIA Updated: Feb 26, 2017 10:33 IST
Hindustan Times, Bhind

After 40 years, Gumara village in Bhind district of Madhya Pradesh will witness the marriage of a girl born there.The long wait is due to the cruel fact that the villagers did not allow a girl child to survive as they either killed it in the womb or soon after the birth.

विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था। वह आत्मविश्वासविहीन था।

लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे। शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।

लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है। क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।

दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आँखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।

विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं। गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।

पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।

तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।

तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।

विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।

शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।

पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।

बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हें कुछ न कुछ भेजती रहती थी। आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।

शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितने मिलते-जुलते है। जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।

मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।

वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है। आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।

शाम मे विनी, दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।

शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।

तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“

विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।

काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।

विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या? वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी। विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।

तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटी बुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।

सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग। विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।

तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।

अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।

विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।

अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।

फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।

दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया। तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।

वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।

बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?

उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।

अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।

परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।

अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।

काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
***
कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।

उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।

पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।

लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।

तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।

इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।

जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”

मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।

उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।

आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“

आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।

अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।

मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?

अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।

उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।

विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।

अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।

 

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धोखा (कहानी)

सुषमा  बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था. 

अचानक ही एक दिन  बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा   – सब  इतना अच्छा  है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ? 

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक  देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह  घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता.  सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते.  उसे लगता ,  यह सब सपना तो नहीँ है ?

हाँ ,  दो पुत्रियों की माता , उसकी जेठानी ज़रूर थोड़ी उखड़ी -उखड़ी रहती. पर वह रसोई और बेटियों मॆं ही ज्यादा उलझी रहती. कभी उनकी दोनों प्यारी -प्यारी बेटियाँ छोटी माँ – छोटी माँ करती हुई उसके पास पहुँच जाती. ऐसे में एक दिन जेठानी भी उनके पीछे -पीछे उसके कमरे मॆं आ गई. कुछ अजीब सी दृष्टि से उसे देखती हुई बोल पड़ी -” क्यों जी , दिन भर कमरे मॆं जी नहीँ घबराता ? जानती हो … ”   वह कुछ  कहना चाह रहीं थी.

 अभी जेठानी  की बात अधूरी ही थी. तभी उसकी  सास कमरे में पहुँच गई. बड़ी नाराजगी से बड़ी बहू से कहने लगी -” सुषमा को परेशान ना करो. नई बहू है.  हाथों की मेहन्दी भी नहीँ छूटी है. घर के काम मैं इससे सवा  महीने तक नहीँ करवाऊगी.  यह तुम्हारे जैसे बड़े घर की नहीँ है. पर मुन्ना की पसंद है.” सुषमा का दिल  सास का बड़प्पन देख भर आया. 

 

नाग पंचमी का दिन था. सुषमा पति के साथ मंदिर से लौटते समय  गोलगप्पे खाने और सावन के  रिमझिम फुहार मॆं भीगने  पति को भी  खींच लाई. जब गाना गुनगुनाते अध भीगे  कपडों में सुषमा ने  घर में प्रवेश किया. तभी सास गरज उठी -“यह क्या किया ? पानी मॆं भींगने से मुन्ना की तबियत खराब हो जाती है.”  वे दवा का डब्बा उठा लाईं. जल्दी-जल्दी  कुछ दवाईया देने लगी. सुषमा हैरान थी.  ज़रा सा भीगने से सासू माँ इतना नाराज़ क्यों हो गई ?

शाम होते ही उसके पति को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया. सास  उससे बड़ी नाराज थीं.  पारिवारिक , उम्रदराज डाक्टर आये. वह  डाक्टर साहब के लिये चाय ले कर कमरे के द्वार पर पहुँची.  अंदर हो रही बातें सुनकर  सन्न रह गई. डाक्टर  सास से धीमी आवाज़ मॆं कह रहे थे – लास्ट स्टेज में यह बदपरहेजी  ठीक नहीँ  है. आपको मैंने इसकी शादी करने से भी रोका था. 

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सुषमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. लगा जैसे चक्कर खा कर गिर जायेगी. तभी न जाने कहाँ से आ कर जेठानी ने उसे सहारा दिया. उसे बगल के कमरे में खींच कर ले गई. उन्होने फुसफुसाते हुए बताया , उसके पति को कैंसर है. इस बात को छुपा कर उससे विवाह करवाया गया. ताकि उसका पति मरने से पहले  गृहस्थ  सुख भोग ले. 

सास ने सिर्फ अपने बेटे के बारे में  सोचा. पर उसका क्या होगा ? पति से उसे वितृष्णा होने  लगी. ऐसे सुख की क्या लालसा , जिसमे दूसरे को सिर्फ भोग्या समझा  जाये. तभी सास उसे पुकारती हुई आई – ” सुषमा….सुषमा..तुम्हें मुन्ना बुला रहा है. जल्दी चलो. वह भारी मन से कमरे के द्वार पर जा खड़ी हुई.।

बिस्तर पर उसका पति जल बिन  मछली की तरह तड़प रहा था. पीडा  से ओठ नीले पड गये थे. सुषमा ने कभी मौत को इतने करीब से नहीँ देखा था. घबराहट से  उसके क़दम वही थम गये. तभी अचानक उसके पति  का शरीर पीडा से ऐंठ गया और  आँखों की पुतलिया  पलट गई. 

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सास जलती नज़रों से उसे देख कर बुदबुदा उठी – भाग्यहीन , मनहूस, मेरे बेटे को खा गई. उससे लाड़ करनेवाला ससुराल , और उसे प्यार से पान के पत्ते जैसा फेरने वाली सास पल भर में बदल गये.  सास हर समय कुछ ना कुछ उलाहना देती रहती.सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर  रह गई. उसके बाद सुषमा को कुछ सुध ना रहा. सास ने ठीक तेरहवीं के दिन, सफेद साड़ी में, सारे गहने उतरवा कर घर के पुराने ड्राइवर के साथ उसे उसके मैके भेज दिया. 

सुषमा की माँ ने दरवाजा खोला. सुषमा द्वार  पर वैधव्य बोझ से सिर झुकाये खड़ी थी.  वह सचमुच पत्थर बन गई थी. वह  पूरा दिन किसी अँधेरे  कोने मॆं बैठी  रहती. सास के कहे शब्द  उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन,  मनहूस…. उसका पूरा परिवार सदमें मॆं था.  तभी एक और झटका लगा. पता चला सुषमा माँ बनने वाली हैं.   

तब  सुषमा के पिता ने कमर कस लिया. वैसी हालत  में  ही सुषमा का  दाखिल तुरंत नर्सिंग की पढाई के लिये  पारा मेडिकल कॉलेज  में करवा दिया. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करते रहती. उसके पापा हर रोज़ अपनी झुकती जा रही कमर सीधी करते हुए,  बच्चों की तरह उसका हाथ पकड़ कर कालेज ले जाते  और छुट्टी के समय उसे लेने गेट पर खड़े मिलते. 

मई की तपती गर्मी में  सुषमा के पुत्र ने जन्म लिया. सुषमा अनमने ढंग से बच्चे की देखभाल करती. कहते हैं, समय सबसे बड़ा मरहम होता है. सुषमा के घाव भी भरने लगे थे. पर पुत्र की और से उसका मन उचाट रहता. जिस समय ने उसके घाव भरे थे. उसी बीतते समय ने उसके वृद्ध होते  पिता को तोड़  दिया था. ऊपर से शांत दिखने वाले पिता के दिल में उठते ज्वार-भाटे  ने उन्हें दिल के दौरे से अस्पताल पहुँचा दिया. अडिग चट्टान जैसा सहारा देने वाले अपने पिता को कमजोर पड़ते देख सुषमा जैसी  नींद से जागी. उसने पिता की रात दिन सेवा शुरू कर दी. 

पिता की तबियत अब काफी ठीक लग रही थी. उनके चेहरे पर वापस लौटती रंगत देख सुषमा आश्वस्त हो गई. वह रात में पापा के अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सोती थी. वह पुनम की रात थी. खिड़की से दमकते चाँद की चाँदनी कमरे के अंदर तक बिखर गई थी. तभी पापा ने उसे अपने पास बुला कर बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले  बोले -” बेटा, तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मज़बूती से….समझी ? 

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ”  पिता ने उसकी  बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन  नहीँ हो.बस एक धोखे और दुर्घटना की शिकार हो. जिसमें गलती तुम्हारी नहीँ , मेरी थी. अक्सर मुझे पश्चाताप होता है.  तुम्हारी शादी करने से पहले मुझे और छानबीन करनी  चहिये थी.”

भीगे नेत्रों से उन्हों ने अपनी बात आगे बढाई  -“पर जानती हो बिटिया, असल गुनाहगार धोखा देनेवाले लोग है. एक बात और बेटा, तुम इसका प्रतिशोध  अपने पुत्र से नहीँ ले सकती हो. उसका ख्याल तुम्हें  ही रखना है.”  थोड़ा मौन रह कर उसके नेत्रों में देखते हुए पिता ने कहा – “भाग्यहीन  तुम नहीँ तुम्हारी सास है. बेटे को तो गंवाया ही. बहू और पोते को भी गँवा दिया. पर कभी ना कभी ईश्वर उन्हें उनकी गलतियों का आईना ज़रूर दिखायेगा. ईश्वर के न्याय पर मुझे पूर्ण विश्वाश हैं.”

पापा से बातें कर सुषमा को लगा जैसे उसके सीने पर से भारी बोझ उतर गया. पढाई करके उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई. वह बेटे के साथ खेल कर अपना दुःख भूल  खिलखिलाने लगी । किसी न किसी से  उसे अपने  ससुराल की ख़बरें  मिलती रहती. देवर की शादी और उसे बेटी होने  की  खबरें मिली. पर सुषमा को ससुरालवालों ने कभी उसे याद नहीँ किया. सुषमा ने भी पीछे मुड़ कर देखने के बदले  अपने आप को और बेटे को सम्भालने पर ध्यान दिया.

उस दिन सुषमा अस्पताल पहुँची. वह  आईसीयू के सामने से गुजर रही थी. तभी सामने देवर और जेठ आ खडे  हुए. पता चला सास  बीमार है. इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें इस बात का बहुत ग़म है कि  सुषमा के पुत्र के अलावा  उन्हें पोता नहीँ सिर्फ पोतिया ही है. अब वह सुषमा और उसके बेटे को याद करते रहती हैं. एक बार पोते क मुँह देखना चाहती हैं.

देवर ने कहा – “भाभी, बस एक बार मुन्ना भैया के बेटे को अम्मा के पास ले आओ.  सुना है बिल्कुल भैया जैसा है. ”  तभी जेठ बोल पड़े – सुषमा , मैं तो कहता हूँ. अब तुम हमारे साथ रहने आ जाओ.  मैं कल सुबह ही तुम्हे लेने आ जाता हूँ. सुषमा बिना कुछ जवाब दिये अपनी ड्यूटी कक्ष में चली गई.वह  उनकी बेशर्मी देख वह अवाक थी. वह चुपचाप अपना काम कर रहीं थी. पर उसके माथे पर पड़े शिकन से स्पष्ट था, उसके मन में बहुत सी बातो का तूफान चल रहा हैं.

 वह सोंच रहीं थी , पहले तो उसे खिलौना समझ मरनासन्न पुत्र की कामना पूरी करने के लिये धोखे से विवाह करवाया. बाद में दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक दिया. आज़ अपनी पौत्रियों को पौत्र से कम आँका जा रहा है. क्योंकि वे लड़कियाँ हैं.  अच्छा है वह आज़ ऐसे ओछे परिवार  का हिस्सा नहीँ है. क्या उसके पुत्र को ऐसे लोगों के साथ रख कर उन जैसा बनने देना  चाहिये ? बिल्कुल नहीँ. वह ऐसा नहीँ होने देगी.  मन ही मन उसने कुछ निर्णय लिया. घर जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्जी दी.

उसी रात को वह  ट्रेन से बेटे को ले कर निकट के दूसरे शहर चली गई. वहाँ के अच्छे बोर्डिंग स्कूल में बेटे का नाम लिखवा दिया. काफी समय से बेटे का दाखिला इस स्कूल में करवाने का मन बना रहीं थी.  वह तीन -चार दिनों  के बाद वापस घर लौटी.अगले दिन अस्पताल के सामने ही देवर मिल गया. उसे देख कर लपकता हुआ आया और बोल पड़ा -भाभी , अम्मा की तबियत और बिगड़ गई हैं. आप कहाँ थी ?

सुषमा चुपचाप हेड मेट्रन के कमरे में अपनी ड्यूटी  मालूम करने चली  गई. उस दिन उसकी ड्यूटी उसके सास के कमरे में थी. वह कमरे में जा कर दवाईया देने लगी. सास उसके बेटे के बारे में पूछने लगी. सुषमा ने शालीनता से कहा – “ईश्वर ने आपके घर इतनी कन्याओं को इसलिये भेजा हैं ताकि आप उनका सम्मान  करें. जब तक आप यह नहीँ सीखेंगी , तब तक आप अपने इकलौते पौत्र  का मुँह नहीँ देख सकतीं.”

सास क चेहरा तमतमा गया.  लाल और  गुस्से भरी आँखों से उसे घुरते हुए बोल पड़ी – “भाग्यहीन .. तुम धोखा कर रहीं हो , मेरे पौत्र को छुपा कर नहीँ रख सकतीं हो. lतुम्हारे जैसी मामूली लड़की की औकात नहीँ थी मेरे घर की बहू बनने की…”  सुषमा ने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा “भाग्यहीन  मैं नहीँ आप हैं. सब पा कर भी खो दिया. आपने मुझे धोखा दिया पर भगवान को धोखा दे  पाई क्या ? आपको क्या लगता हैं एक सामान्य और मामूली लड़की का दिल नहीँ होता हैं ? उसे दुख तकलीफ़ की अनुभूति नहीँ होती? एक बात और हैं, देखिये आज़ आपको मेरे जैसी मामूली लड़की के सामने  इतना अनुनय – विनय करना पड  रहा है.”

अगली सुबह सास के कमरे के आगे भीड़ देख तेज़ कदमों से वहाँ पहुँची. पता चला अभी -अभी दिल का दौरा पड़ने से सास गुजर गई. पास  खडे  अस्पताल के वार्ड बॉय को कहते सुना -” दिल की मरीज थीं. कितनी बार डाक्टर साहब ने ने इन्हें शांत रहने की सलाह दी थी. अभी भी ये अपनी बहुओं को बेटा ना पैदा करने के लिये  जोर – जोर से कोस  रहीं थीं. उससे ही तेज़ दिल का  दौरा पड़ा.”

सुषमा  ने  पापा को  फोन कर सास के गुजरने की ख़बर दी. वह आफिस में माथे पर हाथ रखे बैठी  सोंचा में डूबी थी  -पौत्र से भेंट ना करा कर उसने गलती कर दी क्या ? तभी पीछे से पापा की आवाज़ आई –  ” सुषमा, जिसके पास सब कुछ  हो फ़िर भी खुश ना हो. यह उसकी नियति हैं. यह ईश्वर की मर्जी  और न्याय हैं.”

 

हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं।  तब  विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?

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आँखें  ( कहानी )

                               eye

मौसम सुहाना था. वर्षा की बूँदें टपटप बरस रहीं थीं. दोनों मित्रों  की आँखे भी बरस रहीं थी.  दोनों मित्र एक दूसरे के समधी भी थे. इन्द्र ने अपने इकलौते बेटे की शादी अपने मित्र चंद्र की एक मात्र पुत्री से कर दिया था. 

दोनों दोस्त बिजनेस  में आधे – आधे पार्टनर थे. वर्षों पुरानी दोस्ती सम्बन्ध में बदल जाने से अब पार्टनरशिप के हिसाब  सरल हो गये थे. दोनों मित्र जाम टकराते हुये हिसाब की बात पर अक्सर कह बैठते -“छोडो यार ! अगर हिसाब कुछ ऊपर नीचे हो भी गया तब क्या फर्क पड़ता हैं ? अगर  घी  गिरेगा भी तो दाल में ही ना ? 

दो दिनों से इन्द्र का बेटा घर वापस नहीँ आया था. खाने -पीने का शौकीन बेटा  पहले भी ऐसा करता था. पर इस बार उसका फोन भी बंद  था. परेशान हो कर , दोनों ने उसकी खोज ख़बर लेनी  शुरू की. पुलिस स्टेशन , अस्पताल सब जगह दोनों दौड़ लगा रहे थे.
 पुलिस से मिली ख़बर सुन  वे गिरते पड़ते  लखनऊ के पास के बर्ड सेंचुरी के करीब पहुँचे.  कार सड़क के दूसरी ओर रुकवा  कर   दोनों उतरे. मन ही मन अपने अराध्य  देव से मना रहे थे, यह ख़बर झूठी निकले. सड़क पार कर पहुँचे.

इन्द्र के  जवान पुत्र का शव  सड़क के किनारे पडा  था. तभी पीछे से आई चीख सुन दोनों  पलटे. चीख  चंद्र की   पूर्ण गर्भवती पुत्री की थी. वे भूल ही गये थे. वह  कार में बैठी थी. बहुत रोकने  करने पर भी वह साथ आ गई थी. पति के शव को तो नहीँ , पर उसके चिकेन के कुर्ते के रंग को  वह दूर से ही पहचान गई. अपने हाथों से  इस्त्री कर सोने के बटन लगा कर पति को पहनने के लिये  दिया था.वह बदहवास    सड़क पर दौड़ पड़ी और सामने से आती ट्रक से टकरा गई.

दोनों मित्रों की नज़रें एक दूसरे से मिली. दोनों मनो  जड़ हो गये. उनकी कार का ड्राइवर रामधनी दौड़ता हुआ आ कर चीख पड़ा तब जैसे दोनों की तंद्रा टूटी. उनकी आँखों के सामने वर्षों पुरानी यादें नाचने लगी.

****

 दोनों मित्र   रांची  मेन रोड स्थित हनुमान मंदिर से  पूजा करके निकले. मॆन रोड की भीड़ देख दोनो चिंतित हो गये.  उन्हें जल्दी स्टेशन पहुँचना था. दोनों में दाँत काटी दोस्ती थी. जो भी करते साथ साथ करते. हनुमान जी की भक्ति हो या कुछ  और. उनकी परेशानी  बस एक थी. उन दोनों के इष्ट ब्रह्मचारी थे और वे दोनों नारी सौंदर्य के अनन्य उपासक. वरना वे लंगोट भी लाल ही बाँधते थे, ठीक हनुमान जी की तरह  और सही अर्थों में लंगोटिया यार थे.

जब वे स्टेशन पहुँचे, सामने राजधानी ट्रेन खड़ी थी. दौड़ते भागते दोनों ट्रेन मॆं पहुँचे. चेहरे पर किसी रेस में ट्राफी मिलने जैसी विजय मुस्कान छा गई. चलो , हनुमान जी की कृपा से ट्रेन तो मिल गई.

सफ़र मजे में कट रही थी. दोनों  ताश की गड्डी और शीतल पेय की बोतलें निकाल अपनी सीटों पर जम गये. बोतल के अंदर पेय परिवर्तन का ट्रिक दोनों ने ईजाद कर लिया था.

तभी दोनों की नज़रें पास के बर्थ पर अकेली यात्रा कर रही रूपवती  और स्वस्थ युवती पर पड़ी. दोनों मित्रों एक दूसरे को आँखों ही आँखों मे देख मुस्कुराये और आपस में उस पर कुछ भद्दे जुमले कसे. 

तभी वह युवती इनके पास से गुजरी. उसके जिस मोटापे पर दोनों ने  व्यंग लिय था. वह स्वभाविक नहीँ था. दरअसल वह गर्भवती थी. किसी से फोन पर कह रही थी – “हाँ , खुश खबरी हैं. बडी  पूजा और मन्नतों के बाद यह शुभ समय आया हैं. सोचती हूँ , इस बड़े मंगल के दिन सेतु हनुमान मंदिर में चोला  चढा दूँ. उन्हें ही चिठ्ठी और अर्जी भेजी थी. उन्होंने मेरी प्रार्थना सुन ली. ” 

दोनों ने नशे में झूमते हुये कहा -” यह तो टू इन वन हैं .” और  ठहाका लगाया. जल्दी ही दोनों की नशे भरी आँखें बंद होने लगी. वे  अपने अपने बर्थ पर लुढ़क गये.

सुबह अँधेरे  में ही ट्रेन कानपुर स्टेशन पहुँच गई. स्टेशन से बाहर उनकी लम्बी काली कार खड़ी थी. ड्राईवर रामधनी ने आगे बढ़ कर उनके बैग ले लिये. कार लखनऊ की ओर दौड़ पड़ी. रिमझिम वर्ष होने लगी थी. पूर्व में आकाश में लाली छाने लगी थी. वैसी ही लाली  मित्र द्वय की आँखों में भी थी. नशा अभी उतरा नहीँ  था. आँखों में नशे की खुमारी थी.

  इन्द्र ने   रामधनी से कार किसी चाये के दुकान पर रोकने कही। दोनों  कार की पिछली सीट पर सोने की कोशिश करने लगे. रामधनी ने हँस कर पूछा – “लगता हैं रात में आप लोगों की खूब चली हैं ”  रामधनी ड्राइवर कम और उनके काले कारनामों का साथी और राजदार ज्यादा था. 
दोनों सिर हिला कर ठठा कर हँस पड़े और निशाचर इन्द्र ने जवाब दिया – “अरे यार ! इतने सवेरे का सूरज तो मैंने आज़ तक नहीँ देखा हैं. 10-11 बजे से पहले तो मेरी नींद ही नहीँ खुलती हैं. “

चंद्र ने आँखें  खोले बगैर ट्रेन को इतनी सबेरे पहुँचने के लिये  एक भद्दी  गाली देते हुये कहाँ – यार बड़ी रूखी यात्रा थी  और अब यह सुबह -सुबह  चाय की खोज क्यों कर रहे हो? उसने अपने बैग से एक बोतल निकाल कर मुँह से लगा लिया. नशा कम होने के बदले और बढ़ गया.

एक ढाबे के सामने कार रुकी. अभी भी अँधेरा पूरी  तरह छटा नहीँ था. बारिश तेज हो गई थी. ठीक आगे की टैक्सी से ट्रेन वाली युवती  उतर रही थी. दोनों मित्रों की आँखें धूर्तता से चमकने लगी. रामधनी  और उनमें कुछ  बातें हुई. रामधनी ने चारो ओर नज़रें घुमाई. चारो ओर सन्नाटा छाया था.

रामधनी ने कार महिला के बिलकुल पास रोका. जब तक गर्भभार से धीमी चलती  वह महिला कुछ समझ पाती. पीछे की गेट खोल दोनों ने उसे अंदर खींच लिया. कार के काले शीशे बंद हो गये. कार  तेज़ी से सड़क पर दौड़ने लगी.

 हाथ -पैर मारती महिला  चीख रहीं थी. वह गिडगिडाते हुये बोल उठी – “मैं माँ बनने वाली हूँ. मुझे छोड़ दो. भगवन से डरो.”
रामधनी ने हड़बड़ा कर कहा -“साहब बड़ी भूल हो गई. यह तो पेट से हैं…यह माँ बननेवाली हैं. यह बड़ा भरी अन्याय होगा.” और उसने कार खचाक से रोक दी. कार एक झटके से रुक गई. जब तक किसी की समझ में बात आती. वह युवती कार का द्वार खोल बाहर निकल गई और सड़क के दूसरी ओर से आते वाहन से टकरा कर गिर पड़ी.वाहन बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गया. सुनसान सड़क पर युवती की दर्दनाक चीत्कार गूँज उठी.. ।पास के पेङो से  पक्षी भी शोर मचाते  उङ गये।

तीनो भागते हुये उसके करीब पहुँचे. उसकी आँखें बंद हो रहीं थी. आँखों के कोरों से आँसू  बह रहे थे. शरीर दर्द से ऐंठ रहा था. उसने  अधखुली आँखों से उन्हे देखा. लड़खडाती और दर्द भरी आवाज़ में उसने कहा – ” तुम्हा…  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.  –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.” रक्तिम होती सड़क पर उसने आखरी साँसें ली. और उसकी अध खुली आँखें ऐसे पथरा गई. जैसे वे आँखे उन्हें  ही देख रहीं हों.

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रामधनी पागलों की तरह बडबडाने लगा -” भाई जी,  उस  ने  बद्दुआ दी हैं. यह तो पूरी हो कर रहेगी. माँ बनने वाली थी. उसकी बात खाली नहीँ जायेगी. आपने देखा, उसकी आँखों में ? प्रायश्चित करना ही होगा. प्रायश्चित…” 

दोनों मित्र घबड़ा गये. उनका नशा उतर गया था. अपने को सम्भल कर वे झट कार के पास लौटे. चारो ओर फैला सन्नाटा देख चैन की साँस ली, चलो  किसी ने  देखा तो नहीँ.  शायद अपने सर्वज्ञ इष्टदेव का उन्हे स्मरण नहीँ आया.

ललाट पर आये पसीने और बरसात की बूँदें घुल मिल गये थे. इन्द्र ने तुरंत निर्णय लिया और बौखलाये रामधनी को पीछे की  सीट  पर ठेल कर बैठा स्वयं चालक की सीट पर बैठ गया. चंद्र उसके बगल की सीट पर बैठ गया.

लखनऊ पहुँचने तक कार में मौन छाया रहा. हजरतगंज चौराहे की  लाल बत्ती पर कार रुकी. तभी अचानक रामधनी कार से उतर कर हनुमान मंदिर की ओर दौड़ गया. दोनों मित्र भी कार किनारे रोक उसके पीछे पीछे मंदिर पहुँचे.

उन्होंने देखा रामधनी मंदिर के फर्श पर साष्टांग लोट रहा हैं. और हनुमान जी के चरणों में ललाट टिकाये कुछ  बुदबुदा रहा हैं. पुजारी हैरानी से उसे देख रहे हैं.

चंद्र ने लपक कर उसे उठाया और तेज़ी से कार की ओर बढ़ गया. इन्द्र  पुजारी से माफी माँगने के अंदाज़ में बोल पड़ा -“पत्नी की बीमारी से बड़ा परेशान हैं , बेचारा.” रामधनी को रास्ते भर मुँह ना खोलने का निर्देश दोनों देते रहे , और वह लगातार प्रायश्चित्त की बात करता रहा.

कभी कभी दोनों उस घटना को याद करते. तब लगता जैसे उसकी पथराई अधखुली आँखें उन्हें घूर रहीं हैं. पर जल्दी ही दोनों ने इन बातों को बिसार दिया. हँसते खेलते परिवार और बच्चों के साथ जिंदगी अच्छी कटने लगी.

****

आज़ , इतने वर्षों बाद उसी जगह पर अपनी संतान के रक्त से रक्तीम हो रहीं लाल  सड़क पर लगा जैसे एक कमजोर पड़ती  दर्द भरी आवाज़ उनके कानों मे गूँजने लगी 

 –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ  बढेगा……

 

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बंद द्वार ( कहानी )

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                           धोखे और फरेब के बीच उसने जिंदगी काट दी.  इस आस के साथ, कभी तो वह सुधरेगा , कभी तो भगवन से डरेगा. फिर एक दिन ढलती उम्र में उस ने  हिम्मत कर पति से कहा -” मैं छोड़ दूँगी तुम्हे , अगर तुम नहीँ सुधरोगे.” उसे पूरा विश्वाश था , रिटायर होता पति घबरा जायेगा.उम्र की दुहाई देगा और सुधर जायेगा. पति को किसी सोंचा में डूबा और चुप  देख , वह खुश हुई. चलो  तीर निशाने पर लगा हैं. थोड़ी देर पति का कोई  जवाब ना पा कर उसने  नज़रें उठायी । 

वह फोन पर  किसी को अपने घर आने का आमंत्रण दे रहा था और उसके जाने की खुशखबरी सुना  रहा था.

वह सपने देख रही थी कि वह  उसे रोकेगा. माफी माँग भूल सुधार लेगा. 
पर पति ने तर्जनी के इशारे से उसे दरवाजा दिखाया. वह चुपचाप  घर से निकल गई. पीछे से द्वार बंद होने की आवाज़ आई.

 

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रंगीली ( कहानी )

 

   mandir

रंगीली और रंजन की जोड़ी नयनाभिराम थे। रंगीली के सौंदर्य में कशिश थी। बड़े-बड़े खूबसूरत नयन, दमकता चेहरा, लंबी – छरहरी देहयिष्टि। लगता था विधाता ने बड़े मनोयोग से गढ़ा था। पर रंजन का व्यक्तित्व उससे भी प्रभावशाली था। लम्बी-चौड़ी, बलशाली काया, काली आँखों में एक अनोखा दर्प , उनके गोद में होती उनकी परी सी सुंदर पुत्री एंजले। अभिजात्यता की अनोखी छाप पूरे परिवार पर थी। उनकी आंग्ल भाषा पर जबर्दस्त पकड़ थी। दोनों के दोनों ऐसी अँग्रेजी बोलते थे। जैसे यह उनकी मातृ भाषा हो। पर जब उतनी ही शुद्ध संस्कृत बोलना- पढ़ना शुरू करते। तब देखने और सुनने वाले हक्के बक्के रह जाते।

उनके कम उम्र और सात्विक रहन-सहन देख लोग अक्सर सोंच में पड़ जाते। इतनी कम उम्र का यह राजा-रानी सा जोड़ा इस आश्रम में क्या कर रहा है? जहाँ वृद्धों और परिवार के अवांछनीय परित्याक्तों की भीड़ है। अनेकों धनी, गण्यमान्य और विदेशी शिष्यों की भीड़ इस जोड़े के निष्ठा से प्रभावित हो आश्रम से जुटने लगी थी । आश्रम के विदेशी ब्रांचो में गुरु महाराज इन दोनों को अक्सर भेजते रहते थे। गुरु महाराज को मालूम था कि ये विदेशों में अपनी प्रभावशाली अँग्रेजी से लोगों तक बखूबी भारतीय दर्शन को पहुँचा और बता सकते हैं। सचमुच शांती की खोज में भटकते विदेशी भक्तों की झड़ी आश्रम में लग गई थी।

दोनों को देख कर लगता जैसे कोई खूबसूरत ग्रीक सौंदर्य के देवी-देवता की जोड़ी हो। बड़ी मेहनत और लगन से दोनों मंदिर का काम करते रहते। उनका मंदिर और गुरु महाराज के प्रति अद्भुत और अनुकरणीय श्रद्धा देख अक्सर गुरु महाराज भी बोल पड़ते –‘ दोनों ने देव योनि में जन्म लिया है। इन पर कान्हा की विशेष कृपा है। इनका जन्मों-जन्म का साथ है।“
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रंजन के पिता थे नगर के सम्मानीय वणिक और अथाह धन के मालिक। अनेक बड़े शहरों में उनके बड़े-बड़े होटल और मकान थे। ढेरो बसें और ट्रक यहाँ से वहाँ सामान और सवारी ढोते थे। जिसकी आड़ में उनका मादक पदार्थों और ड्रग्स का काम भी सुचारु और निर्बाध्य चलता रहता। अपने काले व्यवसाय को अबाध्य रूप से चलाने के लिए  शहर के आला अधिकारियों और पुलिस वर्ग से उन्होने  दोस्ताना संबंध बना रखे थे। धीरे-धीरे अपने एकलौते पुत्र को भी अपने जैसा व्यवसायपटु बनाने का प्रयास उन्होंने शुरू कर दिया था।

उस दिन शहर में नए पदास्थापित उच्च पुलिस पदाधिकारी के यहाँ उपहार की टोकरियाँ ले जाने का काम उन्होने रंजन को सौपा था। तभी, लगभग आठ- दस वर्ष पहले रंगीली और रंजन पहली बार मिले थे। रंजन ने जैसे हीं उनके ऊँचे द्वार के अंदर अपनी चमकती नई लाल कार बढाई। तभी नौसिखिया, नवयौवना  कार चालक, पुलिसपुत्री कहीं जाने के लिए बाहर निकल रही थी। नकचढ़ी रंगीली ने रंजन की नई स्पोर्ट्स कार को पिता के पुलीसिया गाड़ी से रगड़ लगाते हुए आगे बढ़ा लिया था। रंजन का क्रोध भी दुर्वासा से कम नहीं था। पर धक्का मारने वाली के सौंदर्य ने उसके कार के साथ उसके दिल पर भी छाप छोड़ दिया था।

अब बिना पिता के कहे वह गाहे-बगाहे उपहारों के साथ रंगीली के घर पहुँच जाता था। अगर रंगीली से सामना हो जाता। तब रंजन मुस्कुरा कर उससे पुछता – “ आज मेरी कार में धक्का नहीं मारेंगी? रंगीली तिरछी नज़र से उसे  देखती, खिलखिलाती हुई निकल जाती। रंजन को लगता जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया।

रंजन के पिता ने शायद माजरा भाँप लिया था। पर उन्हें इससे कोई ऐतराज नहीं था। न हिंग लगे ना फिटकिरी और रंग चोखा। इसी बहाने पुत्र व्यवसाय पर ध्यान तो देने लगा। उन्हें सिर्फ पत्नी की ओर से चिंता थी। जो वैरागी बनी हर वक्त पूजा-पाठ, आश्रम और गुरु में व्यस्त रहती। अक्सर घर में झुंड के झुंड साधु – संत कीर्तन करते रहते। कभी नवरात्री का नौ दिन अखंड कीर्तन चलता । कभी राम और कृष्ण का जन्मदिन मनता रहता। सभी किरतनिया दूध, फल, मेवा, फलहारी घृत पकवान और नए वस्त्र पाते रहते। घर शुद्ध घी, कपूर, धूप, हवन और सुगंधित अगरबतियों के खुशबू से तरबतर रहता। अखंड भंडारा का द्वार सभी के लिए खुला रहता।

रंजन के पिता को पत्नी का यह तामझाम पसंद नहीं था। पर वे एक होनहार व्यवसाई की तरह इस में से भी अपना फायदा निकाल लेते थे और सम्मानीय अतिथियों को आमंत्रित करने के इस सुअवसर का भरपूर फ़ायदा उठाते थे। ऐसे ही अवसरों पर रंगीली का परिवार भी आमंत्रित होने लगा। गुरु महाराज के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित रंगीली के परिवार ने भी उनसे दीक्षा ले ली। अब रंजन और रंगीली की अक्सर भेंट होने लगी। जिससे दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अब रंजन के छेड़ने पर रंगीली हँस कर कहती – “ सब तो ठीक है, पर तुम्हारी यह पुजारिन, निरामिष माँ मुझे अपने घर की बहू कभी नहीं बनने देगी।“

पर हुआ इसका उल्टा। हर दिन अपराधियों की चोरी पकड़ने वाले पिता ने रंगीली और रंजन के इस रास-लीला को तत्काल पकड लिया। अपनी 14-15 वर्ष की नासमझ पुत्री की हरकत उन्हें नागवार गुजरी। उन्होंने भी अपना पुलिसवाला दाव-पेंच आजमाया। नतीजन, अचानक उनके तबादले का ऑर्डर आया। सामान बंधा और रातों – रात वे परिवार के साथ दूसरे शहर चले गए। जैसा अक्सर इस उम्र की प्रेम कथा के साथ होता है, वैसे ही इस कमसिन तोता-मैना की अधूरी प्रेम कहानी के साथ भी हुआ। बुद्धिमान पिता ने इस कहानी पर पूर्णविराम लगा दिया।
****

20-21 वर्ष की रंगीली के पिता ने बड़े जतन से होनहार और योग्य दामाद की खोज शुरू की। सबसे पहले वे पहुँचे गुरु महाराज के पास। गुरु महाराज ने रंगीली के जन्म की जानकारी मांगी और जल्दी ही उसकी कुंडली बनाने का आश्वासन दिया। कुंडली बन कर आई। उच्चपद और उच्चकुल वरों के यहाँ हल्दी-अक्षत लगी कुंडली और सुंदर पुत्री की तस्वीरें, अथाह दहेज के आश्वासन के साथ जाने लगीं। पर ना-जाने क्यों कहीं बात हीं नही बन रही थी।

दुखी हो कर वे फिर गुरु आश्रम पहुँचे। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु महाराज ने व्यथित और चिंतित पुत्रिजनक के माथे पर अनगिनत चिंता की लकीरें देखीं। तब सांत्वना देते हुए बताया कि उनकी पुत्री की कुंडली के अष्टम घर के भयंकर मांगलिक दोष है। शनि भी लग्न में हैं। सारे ग्रह कुंडली में ऐसे स्थापित हैं कि राहू और केतु के अंदर हैं। अर्थात कालसर्प दोष भी है।

पुलिसिया दावपेंच में पारंगत रंगीली के पिता कुंडली ज्ञान में शून्य थे। अतः उन्होंने गुरु महाराज के चरण पकड़ कर कुछ उपाय जानना चाहा। जीवन भर रुपए की महिमा से हर काम निकालने वाले दुखित पिता ने यहाँ भी ईश्वर को चढ़ावा पहुँचा कर काम निकालना चाहा। गुरु महाराज ने कुपित नज़र से देख कर कहा- “ईश्वर को सिर्फ चढ़ावा से नहीं खुश किया जा सकता है।“ चिंतित पिता ने गुरु महाराज के सामने रुपयों की गड्डियों का ढेर रख दिया। नए निर्माणाधीन मंदिर का पूर्ण व्यय वहन करने का वचन दे डाला और अनुरोध किया कि पुत्री के त्रुटीपुर्ण कुंडली का भी वैसे ही आमूलचूल परिवर्तन कर दें, जैसे वे अक्सर अपराधियों के फाइलों में हेरफेर करते अौर उन्हें बेदाग, कानून की पकड़ से बाहर  निकाल देते हैं।

गुरु महाराज ने करुण दृष्टि से उन्हें ऐसे देखा, जैसे माँ, आग की ओर हाथ बढ़ाते अपने अबोध और नासमझ संतान को देखती है। फिर विद्रुप भरी मुस्कान के साथ उन पर नज़र डाली और कहा – “देखिये वत्स, मैं ऐसे काम नहीं करता हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ण करनेवाले अनेकों ज्ञानी पंडित मिल जाएँगे। पर कुछ ही समय बाद जब आपकी राजदुलारी सफ़ेद साड़ी में आपके पास वापस लौट आएगी। तब क्या उसका वैधव्यपूर्ण जिंदगी आपकी अंतरात्मा को नहीं कचोटेगी?

 

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रंगीली के पिता जैसे नींद से जाग उठे। अपनी नासमझी की माफी मांगते हुए वह कुटिल, कठोर और उच्च ओहदा के अभिमान में डूबा पिता, गुरु महाराज के चरणों में लोट गया। वे आँखों में आँसू भर कर उपाय की याचना करने लगे। गुरु जी ने मृदुल-मधुर स्वर में बताया कि सबसे अच्छा होगा, कुंडली मिला कर विवाह किया जाये। पुत्री के सौभाग्यशाली और सुखी जीवन के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है। पद, ओहदा, मान सम्मान जैसी बातों से ज्यादा अहमियत रखती है पुत्री का अखंड सौभाग्य।

गुरु महाराज ने उन्हें एक उपयुक्त वर के बारे में भी बताया। जिससे उनकी पुत्री की कुंडली का अच्छा मिलान हो रहा था। वह वर था रंजन। परिवार जाना पहचाना था। ऊपर से गुरु महाराज की आज्ञा भी थी। किसी तरह की शंका की गुंजाईश नहीं थी। पर अभी भी उच्चपद आसीन दामाद अभिलाषी पिता, बेटी के बारे में सशंकित थे। पता नही उनकी ऊँचे पसंदवाली, नखड़ाही पुत्री, जो प्रत्येक भावी योग्य वारों में मीनमेख निकालते रहती थी। उसे व्यवसायी रंजन और उसका अतिधार्मिक परिवार पसंद आयेगा या नहीं? पहले के नासमझ उम्र की प्रेम लीला की बात अलग थी।स्वयं उन्हें भी किसी उच्च पदासीन, उच्च शिक्षित दामाद की बड़ी आकांक्षा थी।

तभी गुरु महाराज ने उनकी रही-सही चिंता भी दूर कर दी। गुरु महाराज ने उनसे कहा –“ मुझे लगता है, रंगीली और रंजन का विवाह, उनका प्रारब्ध है। अतः मैं उन दोनों से स्वयं बात करना चाहता हूँ। आगे ईश्वर इच्छा। अगले दिन सुबह शुभ पुष्य नक्षत्र के समय भावी वर वधू गुरु महाराज के समक्ष आए। एकांत कक्ष में मंत्रणा आरंभ हुई। गुरु महाराज ने बताया कि उनकी दिव्य दृष्टि से उन्हें संकेत मिल रहें हैं कि रंगीली और रंजन एक दूसरे के लिए बने हैं। दोनों का जन्मों – जन्म का बंधन है। फिर उन्हों ने अर्ध खुले नयनों से दोनों को ऐसे देखा जैसे ध्यान में डूबे हों। फिर अचानक उन पर प्रश्नों की झड़ी सी लगा दी – ‘ बच्चों क्या तुम्हारा कभी एक दूसरे की ओर ध्यान नहीं गया? तुम दोनों को आपसी प्रेम का आभास नहीं हुआ? तुम्हे तो ईश्वर ने मिलाया है। हाँ, कुंडली के कुछ दोषों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में कार सेवा करने की जरूरत है।

रंगीली और रंजन को अपनी पुराना प्रणय याद आ गया। सचमुच ईश्वर किसी प्रयोजन से बारंबार दोनों को आमने –सामने ला रहें हैं क्या? दोनों गुरु महिमा से अभिभूत हो गए। तुरंत उनके चारणों में झुक मौन सहमती दे दी। दोनों के परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। तत्काल वहीं के वहीं गुरु महाराज के छत्रछाया में दोनों की सगाई करा दी गई।

कुंडली के क्रूर ग्रह, राहू और केतू की शांती के लिए गुरु जी ने सुझाव दिया – “शिवरात्री के दिन किसी शिव मंदिर में रंगीली और रंजन से काल सर्प पूजान  करवाना होगा। आंध्र प्रदेश के श्री कालहस्ती मंदिर, या भगवान शिव के बारह ज्योतृलिंगों में कहीं ही इस पुजन को कराया जा सकता है।“

आँखें बंद कर थोड़े देर के मौन के बाद गुरु जी ने नेत्र खोले। सभी को अपनी ओर देखता पा कर उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान छा गई। हँस कर उन्हों ने पुनः कहा – आप लोग चिंतित ना हों। ईश्वर तो हर जगह विद्यमान है। आप किसी भी मंदिर में यह पूजा करवा सकते है। चाहें तो यहाँ भी पूजा हो सकती है। यह मंदिर भी आपका हीं है। यहाँ तो मैं स्वयं सर्वोत्तम विधि से पूजा करवा दूंगा।“ मंदिर में भोग का समय हो रहा था। गुरु महाराज उठ कर अपने पूजा कार्य में व्यस्त हो गए। रंगीली और रंजन का परिवार एक साथ माथा से माथा  मिला कर काल सर्प पूजा कहाँ हो इसकी मंत्रणा करने लगे।

दोनों नव सगाई जोड़ा बड़े आम्र वृक्ष के ओट में अपने पुराने बचकाने प्रेम की याद में डूब गया। हमेशा मौन की चादर में लिपटी रहनेवाली रंजन की माँ ने पहली बार मुँह खोला- “ देखिये, गुरु महाराज हमलोगों के शुभचिंतक है। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वर्ना वे हमें अन्य मंदिरों के बारे में क्यों बताते? मेरा विचार है, पूजा इस मंदिर में गुरु जी से करवाना उचित होगा। बड़े-बड़े मंदिरों में पुजारी कम समय में आधे-अधूरे विधान से पूजा करवा देंगे और हम समझ भी नहीं सकेंगे।“

नई समधिन के सौंदर्य पर रीझे रंगीली के रसिक पिता बड़े देर से उनसे बातें करने का अवसर खोज रहे थे। इस स्वर्ण अवसर का उन्होंने तत्काल लाभ उठाया और  तुरंत अपनी सहमती दे दी। गुरु जी की शालीनता और निस्वार्थता से सभी अभिभूत हो गए। फिर तो बड़ी तेज़ी से घटनाक्रम ठोस रूप लेता गया। विवाह आश्रम के मंदिर में हुआ। उस के बाद नव युगल जोड़े ने अपना मधुयामिनी अर्थात हनीमून भी आश्रम में ही मनाया।

दोनों परिवारों की विपुल धन राशी के समुचित उपयोग का ध्यान रखते हुए नव विवाहित जोड़े की लंबी विदेश मधुयामिनी यात्रा हुई। लगभग एक महीने बाद दोनों  उपहारों से लदे घर वापस लौटे। विदेश में उनका ज्यादा समय गुरु निर्देशानुसार विभिन्न आश्रमों में  बीता। अतिधर्मभीरु रंजन अपनी माँ की तरह  अति धार्मिक था। शौकीन और पिता की दुलारी पुत्री रंगीली, प्रणय  क्षणों के लिए तरस कर रह गई।

रंगीली ने अपने और अपने  अल्पशिक्षित पति की सोच-समझ में जमीन आसमान का अंतर देख  हैरान थी। हनीमून की खूबसूरत यात्रा को उसके पति ने धार्मिक तीर्थयात्रा में बदल दिया था। पर संध्या होते रंजन अक्सर गायब हो जाता था। एक दिन वह भी रंजन के पीछे-पीछे चल दी। पास के बार में उसने रंजन को मदिरा और बार बाला के साथ  प्रेममय रूप में देख, वह सन्न रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रंजन का कौन सा रूप सच्चा है। 

विदेश से लौटने तक दोनों में अनेकों बार नोक-झोंक हो चुका था। दोनों अपने ठंढे मधुयामिनी से  वापस लौटे। रंगीली उदास और परेशान थी। उनके  साथ में आया आश्रम के विदेशी शाखाओं में नए बने शिष्यों की लंबी सूची। जिसने  सभी में खुशियाँ भर दी। किसी का ध्यान रंगीली की उदासी पर नहीं गया।

विदेशी शिष्यों की संख्या बढ़ने से रंजन और रंगीली की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। अतः दोनों अपना काफी समय आश्रम में देने लगे। साल बितते ना बितते दोनों माता-पिता बन गए। प्यारी-प्यारी पुत्री एंजेल पूरे आश्रम और रंजन – रंगीली के पूरे परिवार का खिलौना थी। गुरु महाराज के असीम कृपा से दोनों परिवार कृतज्ञ था।

एक दिन, जब दुखित और व्यथित रंगीली ने गुरु महाराज से रंजन के विवेकहीन चरित्र और व्यवहार के बारे में बताया,  तब उन्होंने उसे समझाया कि यह सब उसके कुंडलीजनित दोषों के कारण हो रहा है। उन्हों ने पहले ही बताया मंदिर में कार सेवा से दोष दूर होगा।अब रंजन और रंगीली,  दोनों अब लगभग आश्रमवासी हो गए थे।रंगीली के पिता भी अब धीरे-धीरे उच्चपदासीन दामाद के ना मिलने के क्षोभ और दुख  से बाहर आने लगे थे।
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शाम का समय था। मौसम बड़ा खुशनुमा था। रिमझिम वर्षा हो रही थी। चारो ओर हरीतिमा थी। हरियाली की चादर पर, पास लगी रातरानी की बेल ने भीनी- भीनी खुशबू बिखेर दी थी। सामने बड़े से बगीचे में रंग बिरंगे फूल आषाढ़ महीने के मंद समीर में झूम रहे थे। आश्रम का पालतू मयूर आसमान में छाए बादल और रिमझिम फुहार देख कर अपने पंख फैलाये नाच रहा था। रंजन और रंगीली अपनी बेटी और पूरे परिवार के साथ आश्रम में अपनी छोटी कुटियारूपी कौटेज के बरामदे में गरम चाय की चुसकियों और गर्मागर्म पकौड़ियों के साथ मौसम का मज़ा ले रहे थे। पाँच वर्ष की एंजेल खेल-खेल में अपने पिता के अति मूल्यवान मोबाईल से नृत्यरत मयूर की तस्वीरें खींच रही थी।

“ क्या जीवन इससे ज्यादा सुंदर और सुखमय हो सकता है? – रंजन ने मुस्कुरा कर पूछा। थोड़ा रुक कर उसने माता-पिता, सास-स्वसुर और अपनी पत्नी पर नज़र डाली और कहा – “कल गुरु पूर्णिमा है। मैंने गुरु जी के लिए स्वर्ण मुकुट और नए वस्त्र बनवाए हैं। मुझे लगता है, कल ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी को उन्हें  उपहार दे कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। खुशहाल और संतुष्ट परिवार ने स्वीकृती दे दी। सुबह-सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक मन से सारा परिवार गुरु महाराज के कक्ष के बाहर पहुंचा। द्वार सदा की तरह खुला था। भारी सुनहरा पर्दा द्वार पर झूल रहा था। पूर्व से उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें आषाढ़ पूर्णिमा की भोर को और पावन बना रहीं थीं। कमरे से धूप की खुशबू और अगरबत्ती की ध्रूमरेखा बाहर आ रही थीं। थोड़ी दूर पर बने मंदिर से घण्टियों की मधुर ध्वनी और शंख की आवाज़ आ रही थी।

गुरु जी के कुटिया के आस-पास पूर्ण शांती थी। दरअसल बहुत कम लोगों को यहाँ तक आने की अनुमति थी। पर रंजन और रंगीली के लिए गुरु जी के द्वार हमेशा खुले रहते थे। अतः दोनों बेझिझक आगे बढ़े। तभी, अंदर से आती किसी की खिलखिलाने और गुरु जी के ठहाके की आवाज़ सुनकर आधा हटा पर्दा रंजन हाथों में अटका रह गया। पर्दे की ओट से पूरे परिवार ने देखा, बिस्तर पर गुरु जी की बाँहों में उनकी निकटतम शिष्या मेनका हँस कर पूछ रही थी – यह सब इतनी सरलता से आपने कैसे किया?

गुरु जी  अपनी अधपकी दाढ़ी सहलाते हुए कह रहे थे – “रंजन और रंगीली के बालपन के प्रणयकेली पर तभी मेरे नज़र पड़ गई थी। इतने वर्षों बाद सही मौका मिलते ही, सात जन्मों का बंधन बता कर उसे मैंने भंजा लिया। आज ये दोनों मेरे लिए सोने की अंडा देनेवाले मुर्गी है। देखती हो, इनकी वजह से मेरे आश्रम में स्वर्ण और धन वृष्टि हो रही है। मेनका तकिये पर टिक, अधलेटी हो कर पूछ रही थी – उन दोनों की कुंडलियाँ कैसे इतनी अच्छी मिल गई। गुरु जी ने एक आँख मारते हुए कहा – “वह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है मेनका !!!सब नकली है। 

रंजन और रंगीली को लगा जैसे वे गश खा कर गिर जाएँगे। रंजन की माँ के आँखों से गुरु महिमा धुल कर बह रही थी। दोनों के पिता द्वय की जोड़ी हक्की-बक्की सोंच रहे – क्या उनसे भी धूर्त कोई हो सकता है? जीवन भर इतने दाव-पेंच करते बीता और आज ईश्वर जैसे उन्हें दिखा रहें हों – सौ चोट सुनार की और एक चोट लोहार की। ईश्वर के एक ही चोट ने उन्हें उनके सारे कुकर्मों का जवाब सूद समेत दे दिया था। रंगीली के पिता के नेत्रों के सामने उन योग्य, उच्चपद, उच्च शिक्षित वरों का चेहरा नाचने लगा, जो उनकी प्राणप्यारी सुंदरी पुत्री से विवाह के लिए तत्पर थे।

  तभी खटके की आवाज़ से सारे लोग और गुरु जी चौंक गए। नन्ही एंजेल ने खेल-खेल में अपने पिता के मोबाइल से एक के बाद एक ना जाने कितनी तस्वीरें प्रणयरत शिष्या-गुरु के खींच लिए थे।

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एक नन्ही परी ( कन्या भ्रुण हत्या पर आधारित मार्मिक कहानी )

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विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था।वह आत्मविश्वासविहीन था।

लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे।शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।

लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है।क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।

दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।
विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं।

गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।

पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।

तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।

तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।

विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।

शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।

पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।

बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हेंकुछ न कुछ भेजती रहती थी।आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।
शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितना मिलता-जुलता है।जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।

मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।

वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है।
आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।

शाम मे विनी दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।

शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।

तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“
विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।

काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।

विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या?वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी।विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।

तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटीबुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।

सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग।विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।

तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।

अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।

विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।

अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।

फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।

दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया।तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।

वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।

बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?

उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।

अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।
परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।

अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।

काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
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कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।

उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।

पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।

लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।

तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।

इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।

जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”

मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।

उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।

आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“

आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।

अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।

मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?

अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।

उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।

विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।

अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।
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