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The spotlight effect #Psychology

The Spotlight Effect: It is a phenomenon, which explains that  generally people believe that they are being noticed by others more than they really are. this is because everyone is busy with all their attention focussed on themselves. 

The spotlight effect is a tendency for individuals to think that others are observing them more closely than they actually are. This is more prominent during failures, when one  is in an embarrassing situation or when one has some guilt. Higher level of the spotlight effect may cause – nervousness,  social anxiety, negative self evaluation etc.

Solution –  whenever you feel others are  noticing you, keep your calm and tell yourself that everyone else is actually  more concerned with their own behavior and are in-fact  worrying you’re paying close attention to them. So you should be confident of yourself and not get spotlighted in any situation.  

स्पॉटलाइट प्रभाव: आम तौर पर, ज्यादातर लोगो में  यह एहसास   पाया जाता है, जो उनके व्यवहार पर असर ङालती है ।  लोग यह महसूस करते है कि अन्य लोग मुझे / हमें देख रहे हैं  अौर बहुत अधिक बारीकी से देख रहे हैं। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता हैं, क्योंकि स्पॉटलाइट इफेक्ट की वजह से  वे स्वयं पर अधिक ध्यान दे रहे होते हैं। आम तौर पर लोग  दूसरों द्वारा जितना देखे जाते  हैं उससे अधिक महसूस करते हैं।  विशेष कर  शर्मनाक स्थितियों में,  गलतियों, विफलताओं के दौरान स्पॉटलाइट प्रभाव  का स्तर  ज्यादा  हो सकता है। इससे व्यवहार में घबराहट, सामाजिक चिंता, नकारात्मक मूल्यांकन आदि बढ़ जाता है।

समाधान – जब आपको  ऐसा लगे कि, हर कोई आप पर  ध्यान दे रहा है , तब  आप इस बात को समझें: कि अन्य सभी लोग वास्तव में अपने लिये  चिंतित हैं और उन्हें  लग रहा है कि आप उन पर ध्यान दे रहे हैं। इस लिये  बेहतर  है कि  आत्मविश्वास  बनाये रखें और स्पॉटलाइट प्रभाव को हावी ना होने  दें।

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बर्न-आउट (एक मनोवैज्ञानिक समस्या)Burn out

Burnout is a state of emotional, mental, and physical exhaustion caused by excessive and prolonged stress. It occurs when you feel overwhelmed, emotionally drained, and unable to meet constant demands.

बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाव असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों और समस्याओं को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं को बताना, नयी जिम्मेदारियों को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की भी मदद ली जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटिस्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में बिना सलाह इसे ना लें।

Source: बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

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Zeigarnik effect – Utilise its Positive side ज़ैगर्निक इफेक्ट के फायदे

 

मेरे एम ए की पढ़ाई के दौरान  एक दिन हमारे एक शिक्षक ने एक प्रयोग दिया, पर उसके बारे में कुछ नहीं बताया । अगली क्लास में , कुछ दिनों बाद उन्होंने सभी से उस एक्सपेरिमेंट का नतीजा जानना चाहा।

मेरे क्लास के सभी स्टूडेंट्स के रिजल्ट लगभग एक समान थे और मेरा रिजल्ट बिल्कुल उल्टा था।  शिक्षक ने कुछ देर में पूछा कि सारी रिजल्ट एक जैसे हैं  या  किसी का रिजल्ट इससे अलग आया है? मैं अपने अलग रिजल्ट से थोड़ा परेशान थी फिर भी मैं अपनी कॉपी के साथ अपनी टीचर के पास पहुंची।

तब उन्होंने बताया कि वह ऐसे  रिजल्ट का इंतजार कर रहे थे । उन्हों ने  बताया कि इसे  कहते हैं. जिसका अर्थ है कि अक्सर कुछ लोग अधूरे या बीच में रोक दिए गए काम को ज्यादा याद रख  हैं। यह  मनोविज्ञान का एक  फिनोमिना  हैं। इसका बहुत अधिक इस्तेमाल मनोरंजन की दुनिया में अधूरे सीरियल या अधूरी कहानियों के रूप में किया जाता है जिससे उनके प्रोग्राम की पॉपुलैरिटी बनी रहे । इसका लाभ हम भी उठा सकते हैं।

पढ़ाई – जिन विद्यार्थियों में यह स्वभाव है वह अपनी पढ़ाई को बीच बीच में रोक कर कुछ अन्य काम कर सकते हैं(जैसे- खेलना, मनोरंजन या अपनी हॉबी वाले काम ) और फिर पढ़ाई आगे बढ़ा सकते हैं । उन्हें पढ़ाई बेहतर याद रहेगी। यह उन्हें अच्छी याददाश्त प्रदान करेगा।

मल्टीटास्किंग – वे एक साथ में दो तरह के काम करने का फायदा उठा सकते हैं जिसमें एक काम के बाद कोई दूसरा अन्य काम करें और फिर वापस पहले काम पर आएं तो इस तरह से दो या तीन काम होते रहते हैं और चूँकि ऐसे लोगों में काम खत्म करने  की प्रवृति  मजबूत होती है, इसलिए काम तेजी से होता है अौर जल्दी खत्म होता है। साथ हीं  अगले काम को करने की प्रेरणा बनी रहती है

तनाव  दूर करना – अधूरे काम से  तनाव  होता है।  तनाव को खत्म करने के लिए एक आसान तरीका है, छोटे हलके काम करना। जिससे  काम खत्म होने के बाद लोग तनावरहित  महसूस करते हैं उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

 

अधूरा काम हमारी उत्सुकता को बनाए रखता है और हम उत्साहित रहते हैं। दुनिया के बहुत से खोज इसी स्वभाव के कारण हुए है इसलिए हमें अपनी उत्सुकता को बनाए रखना चाहिए और ज़ैगर्निक इफेक्ट के  सकारात्मक रूप का फायदा उठाना चाहिए।

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क्या आपको अधुरी बातें ज्यादा याद रहती हैं? Zeigarnik effect #Psychology

 

In psychology, the Zeigarnik effect states that people remember uncompleted or interrupted tasks better than completed tasks. but it may vary person to person.

 

मनोविज्ञान में, ज़ैगर्निक प्रभाव में कह गया है कि कुछ लोगों को अधुरी बातें ज्यादा रहतीं है। इस प्रभाव के अनुसार   जो छात्र अपने  पढ़ाई के बीच-बीच में थोङा समय दूसरे काम मे लगाते  हैं (जैसे- खेलना, मनोरंजन या अपनी हॉबी वाले काम  ) उन्हें पढ़ाई बेहतर याद रहती है।

पत्रिकाअों व  टी. वी. के  अधुरे धाराविहिक अौर कहानियाँ इसलिये अक्सर हमें आगे की कहानी जानने के लिये प्रेरित करते है। पर यह जरुरी नहीं है कि यह सब  के ऊपर ऐसा असर ङालें । क्योंकि इस प्रभाव को बहुत से अन्य बात भी प्रभावित  करते हैं।

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My column on parenting

Bringing up children can be one of the most gratifying and at the same time one of the most terrifying of life’s activities. Today, Dr. Rekha of AccioHealth tackles behavioural issues in children with her usual sensitivity and expertise. Do send us your questions too, if you want Dr. Rekha to address them(admin@mumbaimom.com). Dr Rekha @Mumbai Mom

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सेल्फ कंसेप्ट self concept #Psychology

Accept yourself as you are,

Never kill the parts, 

that you can’t live without !!!

 

What is self concept

Baumeister’s (1999) self concept definition:

“The individual’s belief about himself or herself, including the person’s attributes and who and what the self is”.

* The view you have of yourself (self image)
*How much value you place on yourself (self esteem or self-worth)
*What you wish you were really like (ideal self)

 

सेल्फ कंसेप्ट क्या है?

“व्यक्ति का अपने  स्वयं गुणों के बारे में ,और अपने व्यक्तित्व पर खुद का विश्वास ”

*आपका खुद के बारे में विश्वास (आत्म चित्र)
*आप अपने आप को कितना मूल्यवान समझते हैं (आत्मसम्मान या स्व-मूल्य )
*आप अपने अाप को कितना पसंद करते हैं (आदर्श स्वयं )

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गुस्से की कड़ी Chain of anger #understandyourbehavior / #अपने व्यवहार को समझें

अक्सर ऐसा होता है,  हम बहुत सी छोटी -बड़ी बातों पर नाराज होते रहते हैं।
गुस्सा या आक्रोश भी एक तरह का एनर्जी है, जैसे विज्ञान में एनर्जी रूप बदल
लेती है पर खत्म नहीं होती है। ठीक इसी तरह गुस्सा भी जल्दी खत्म नहीं होता है।
इसकी कडी आगे बढ़ते रहती है। अगर हम  किसी एक व्यक्ति पर गुस्सा करते हैं,
तब वह आगे किसी और पर अपना गुस्सा निकालता है। और यह कड़ी कब तक
चलती रहती है जब तक कि कोई अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं करता है, और

शांति से इस  बात को  नहीं संभालता  है।
गुस्से को शांति से संभालना तभी संभव है  जब हमारे- आपके अंदर खुशी हो
और आपका मन शांत हो।  किसी तरह की नाराजगी, परेशानी, आक्रोश या
चिंता से आप व्यथित न हो।

पर इसका यह मतलब नहीं है कि जिंदगी में कोई परेशानी ना हो।  जिंदगी की
परेशानियों के साथ शांत और खुश रहना सीखना जरूरी है।

खुशी अौर शांति दोनो बनाये रखने का  मेरी नजर में बस एक ही उपाय है वह
अौर  आपका अपना मन !! उसे समझे अौर अपना व्यवहार /मनोविज्ञान  को समझें ।
हाँ  एक अौर भी रास्ता है, वह है अध्यात्म या योग से  अपने पर नियंत्रित रखना 
अौर खुश  रहना सीख सकते हैं.

 

 

Image courtesy internet.