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Short Stories with a difference………

Boundless Blessings by Kamal

soup

  • She, a renowned artist and a strict mother, often scolded her six-year-old son for he could never draw a line straight. As he breathed slowly into the ventilator, she begged him to make one more crooked line on the ECG.
  • Everyone goes with the flow, but the one who goes against it becomes someone remarkable. Before I could explain this to the traffic police, the man issued me a fine.
  • Their love was different. She was happy every time he kicked her in the stomach. Every time he kicked she loved him more. She waited breathlessly for the time she would hold her baby for the first time.
  • At 25, I became a mother of one; at 27 I became a mother of two, and today at 55 I have become a mother of three. My son got married today, and brought home his wife.
  • Once a 5-year-old boy was…

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A visitor -A 7 line story

A tourist visited a Sufi saint.
He was astonished to see that the Sufi’s home was a simple room.
The only furniture was a mat and a kerosene lamp.
Tourist : “Sufi, where’s your furniture?”
Sufi : “Where is yours?”
Tourist : “Mine? But I’m only a visitor here.”
Sufi : “So am I !

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जिंदगी के रंग ( कहानी )

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                            पालतू कुत्तों को शाम में अक्सर लोग पार्क में घुमाने और खेलने के लिए लाते है। शाम में मार्केट कॉम्प्लेक्स से लौटते समय, मैं पार्क के पास से गुजर रही थी। तभी मैंने एक अजीब दृश्य देखा। एक बड़ी सी चमकती काले रंग की कार कुछ दूर चौराहे पर रुकी। एक व्यक्ति रुई जैसे सफ़ेद, काली आँखों वाले कुते को ले कर उतरा। उसने लाल रंग के एक बौल को हवा में बहुत दूर उछाला। कुत्ता बौल की तरफ लपका। उत्साह के साथ मुँह में बौल ले कर वापस अपने मालिक की ओर दौड़ा। पर हैरानी की बात थी, कि वह व्यक्ति इस बीच तेजी से कार ले कर जा चुका था। कुत्ता बौखलाया हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था।  

      

                अब अक्सर वह कुत्ता मार्केट के खाने-पीने की दुकानों के पास मुझे दिख जाता था। पर एक अद्भुत बात  थी। रोज़ शाम के समय ठीक उसी चौराहे पर बैठा दिखता। शायद उसे अपने मालिक का इंतज़ार था। मेरी नज़रें रोज़ आते –जाते उस स्वामिभक्त स्वान पर चली जाती। मैं श्वान प्रेमी नहीं हूँ। पर उसे देख मेरा दिल कचोट उठता  था। कुछ समय बाद परिस्थितिवश मुझे दूसरे शहर जाना पड़ा।  

                 वर्षों बाद मैं अपने घर वापस  आई। बाजार जाते समय अपने आप नज़रें चौराहे की ओर चली गई। कुत्ते का कहीं पता नहीं था। वहाँ पर एक वृद्ध, बीमार सा दिखने वाले  भिखारी ने डेरा जमा लिया था। मेरे मन में ख़्याल आया – वह खूबसूरत प्यारा सा  कुत्ता मर-खप गया होगा। कुत्तों की आयु 12-15 वर्ष होती है। मैं तो बीसियों वर्ष बाद लौटीं हूँ।

                     उस दिन मौसम बड़ा सुहाना था। गुलाबी ठंड में पार्क फूलों से भरा था। बच्चे शोर मचाते खेल रहे थे। मैं उसी चौराहे के बेंच पर बैठी मौसम का मज़ा ले रही थी। तभी वह भिखारी आया और नियत स्थान पर टाट बिछा कर बैठ गया। कुछ देर बाद शुद्ध और सभ्य भाषा में मेरा अभिवादन करते हुए कहा – “ नमस्कार, मैं बड़ा भूखा हूँ। कुछ पैसे मिल जाते तो … ।”

         

         मैंने आश्चर्य से उसे देखा। उसने शायद मेरे अनकहे प्रश्न को पढ़ लिया और कहा – “ मैं भिक्षुक नहीं हूँ। मेरा बेटा मुझे यहाँ बैठा कर थोड़ी देर में लौट की बात कह गया है। पर आया नहीं। एक वर्ष से रोज़ उसका हीं इंतज़ार करता हूँ।“ फिर वह विक्षिप्तों की तरह स्वगत बड़बड़ाने लगा – “शायद वह मेरी बीमारी से तंग आ गया था। मेरे ऊपर खर्च भी तो बहुत होता था।” उसने नज़रे उठा कर  ऊपर आकाश की ओर देखा और दोनों हाथों को प्रणाम मुद्रा में जोड़ कर कहा –“ मैंने भी तो अपने पालतु बीमार कुत्ते को ऐसे, यहीं तो छोड़ा था।” 

(यह कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित है। अक्सर लोग अपने पालतू जानवरों को लावारिस छोड़ देते हैं। हम मनुष्य इतने निष्ठुर क्यों हैं ?) 

 

 

छाया चित्र इंटरनेट के सौजन्य से।

 

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किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

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नयना का सपरिवार बनारस घूमने का पहला अवसर था। दोनों बेटियों और पति के साथ बड़ी कठिनाइयों से यह कार्यक्रम बन पाया था। सुबह, सबसे पहले गंगा स्नान कर वे चारो विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा-अर्चना किया। बनारस के विभिन्न मंदिरों और पर्यटन स्थलों को घूमने में दो दिन कैसे निकल गए, उसे पता हीं नहीं चला।

यहाँ आ कर नयना को, पिंजरे से आज़ाद परिंदे जैसा अहसास हो रहा था। उसे वापस घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। अतः उसने काशी प्रवास और बढ़ा लिया। काशी आ कर गंगा में नौका विहार नहीं किया तो यात्रा अधूरी होगी। जबकी, उसके पति को रुकने का मन बिलकुल नहीं था।

नयना की शादी कम उम्र में हो गई थी। तब उसकी पढ़ाई भी अधूरी थी। ससुराल वाले और पति उसे काम करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। विशेष कर उसकी जेठानी उसे बड़ा परेशान करती थी। नयना का अकर्मण्य, मोटा पति हितेश, अक्ल से भी मोटा था। अतः भाभी के आँचल के पल्लू से बंधा रहता। भाभी सुगमता से अपने देवर को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती। वह अपनी कमाई से मात्र सौ रुपए नयना को देता और बाकी सारी कमाई माया यानि भाभी के कालिमायुक्त, कलुषित चरणों में चढ़ा देता। ना जाने छोटी कुटिल आँखों वाली कदर्य माया भाभी में नयना के पति को क्या सौंदर्य दिखता था।

तब तक नयना से अनजाने में भूल हो गई। एक-एक कर वह दो पुत्रियों की जननी बन गई। सारा ससुराल उससे नाराज़ हो गया। पुत्रवती भाभी का जादू उसके मूढ़ पति के सर चढ़ कर बोलने लगा। घर का सारा धन और पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे माया को चढ़ावा में चढ़ता गया। नयना जब पति को बेटियों के भविष्य के बारे में समझाना चाहती, उसका पति उसके ऊपर तरह-तरह के दोष मढ़, नयना से नाराज़ हो, माया भाभी के साथ कोप भवन में चला जाता था।

नयना ने जेठ की तरफ एक दो बार आशापूर्ण निगाहों से देखा। पर कुछ काम ना करनेवाले जेठ अपनी पत्नी की योग्यता से बड़े प्रभावित थे। जिसने सोने की अंडा देनेवाली मुर्गी अर्थात नयना के सरकारी पदाधिकारी, पति को अपने वश में कर रखा था। नयना ने जहां भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, कोरे आश्वासन के अलावा कोई मदद नहीं मिली। तब नयना ने सारे अत्याचार, बेटियों के भविष्य की वजह से झेलना स्वीकार कर लिया। नयना ने अपनी पढ़ाई बड़ी कठिनाईयों से पूरी की तथा  नौकरी करने लगी। जिस से बेटियों की पढ़ाई ठीक से चल सके। पर पति और माया भाभी का तोता- मैना प्रेम कथा प्रकरण चलता रहा।

ऐसी  कालिख की कोठारी से दो-तीन दिन के लिए बाहर निकल कर नयना को बड़ी शांती मिल रही थी। मान्यतानुसार शिव की त्रिशूल पर बसा बनारस, शांति और आध्यात्म की नगरी है। जहां ज्योतिर्लिंग, शक्ति पीठ और गंगा एक साथ हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक है। नयना, गलियों में बसे बनारस के अनोखे आकर्षण में उलझ कर रह गई। बनारसी और रेशमी कपड़ों के अद्भुत संसार  जैसे उसे एक नई दुनिया में ले गए । गंगा तट पर सैकड़ो घाट है। नौका विहार के समय नाविक सारे घाटों के बारे में बतला रहा था। तभी नयना के पति को माया भाभी का फोन आया।

किनारे माणिकर्णिका घाट नज़र आ रही थी। जहाँ अनेकों चिताएँ जल रहीं थीं। नयना ने किनारे दिख रहे एक आलीशान भवन के बारे में जानना चाहा। नाविक ने बताया कि यह डोम राजा का महल है। डोम राजा पारंपरिक रूप से शमशान घाट के कर्ता-धर्ता और स्वामी होतें हैं। साथ हीं वे श्मशान में चिताओं को दिया जानेवाली अग्नि के  संरक्षक होते है। उसके अनुमति से अग्नि प्राप्त की जाती है और चिता जलाया जाता है। यह परंपरा राजा हरिश्चंद्र के समय से चल  रही है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार एक चाण्डाल ने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद अपना दास बना लिया था। वह चांडाल मणिकर्णिका घाट का स्वामी था। उसने राजा हरिशचंद्र को इस घाट पर अन्त्येष्टि करने वाले लोगों से “कर” वसूलने का काम दिया था।

जलती चिताओं को देखते हुए, नयना के पति ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि नयना ने पुत्रजननी न बनने का अक्षम्य अपराध किया है। अतः मरने पर उन्हें कोई आग देनेवाला नहीं है। माया भाभी एक बड़ा उपकार करने के लिए तैयार है। नयना और हितेश  के  मरने पर उनकी  चिता को आग माया भाभी अपने पुत्र से दिलवा देगी। बदले में अभी अपनी सारी चल-अचल संपाति माया के पुत्र के नाम करना होगा। माया भाभी चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये। इसलिए हमें तत्काल वापस लौटना होगा।

नयना  और उसकी  युवा बेटियाँ हैरान उस कलुषित हृदय के व्यक्ति का चेहरा देख रहीं  थीं। नयना को  ख़्याल आया कि अभी तो मैं जिंदा हूँ। फिर मेरे अग्नि संस्कार की जल्दी  क्यों? और माया अपने पुत्र से  किराये ले कर  अग्नि दिलवाने के लिए क्यों तैयार है? इसके पीछे मात्र धन की लालसा है या कुछ और सत्य छुपा है ? दो लायक, होनहार और सुंदर इंजीनियर पुत्रियों का पिता इतना निर्दयी, नासमझ और नीच हो सकता है क्या? सिर्फ इसलिए कि वे बेटियाँ हैं? क्या वे बेटियाँ पिता को इस व्यवहार के लिए  क्षमा कर पाएँगी?

कहते हैं जाति और उसके साथ जुटे कर्म, जन्म से प्राप्त होते हैं। पर यहाँ तो अपनी ही स्वार्थी और लालची जननी, माया भाभी ने अपने पुत्र के नये  कर्म  को नियत कर दिया था – एक श्मशान चांडाल की रूप में।नयना ने सोंचा,  अगर अगली बार बनारस दर्शन का अवसर मिला, तब माणिकर्णिका घाट पर या डोम राजा के विशाल प्रासाद के नीचे मायावी माया भाभी का होनहार सुपुत्र चिता में आग देने के लिए, हाथों में अग्नि मशाल ले, किराये का पुत्र बनने को तत्पर दिखेगा। पुत्रविहीन माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए किराये का पुत्र सरलता से उपलब्ध होगा। किराये के बोर्ड पर लिखा होगा उसके किराये के रेट।

***

वर्षों बाद नयना को पुनः बनारस जाने का अवसर मिला है। पुरानी सारी बातें चलचित्र की तरह याद आने लगीं। उसे एक बार पुनः माणिकर्णिका घाट देखने की कामना हो रही थी। वह घाट जहाँ पार्वती जी ने अपने कान की मणी छुपाई थी, ताकि यायावर और घुमक्कड़ शिव उसे खोजतें रहें  और उनके साथ पार्वती को ज्यादा वक्त व्यतित करने का अवसर मिल सकें।

नयना ने अपने मणी का भी यहीं परित्याग किया था। वह पति के साथ उसकी आखरी यात्रा थी। उसके बाद वह बेटियों के साथ उनके नौकरी के स्थान पर चली गई थी और फिर कभी हितेश के पास वापस नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद उड़ती -उड़ती खबरें ज़रूर सुनने में आईं थीं कि माया भाभी ने सारे रुपये और जायदाद ले कर, हितेश को उसके ही घर से बाहर कर दिया था.
अभी वह गलियों से गुजर कर घाट की ओर बढ़ रही थी कि उसके कदम थम गए। दोनों बेटियों और दामाद ने देखा, सामने अर्ध विक्षिप्त भिक्षुक के रूप में हितेश भिखारियों की पंक्ति में बैठा है।

 

image taken from internet.

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बगुला भगत ( कहानी )

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यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है।

 इस कहानी पर पाठकों के विचार सादर आमंत्रित है।

खूब गोरा रंग, ऊँची कद काठी, तीन भाईयों की प्यारी बहन और माँ-पापा की लाड़ली बेटी थी वैदेही । अगल-बगल की गलियों में ना जाने उसकी कितनी सखी-सहेलियाँ रहतीं थी। उसका सारा दिन सहेलियों के साथ हुड़दंग करने में बीतता। कभी गोलगप्पे, कभी दही भल्ले या आलू टिकिया खाना या फिर छत पर बैठ गप्पें करना उस के पसंदीदा शगल थे। हाँ गप्प के साथ बुनाई और क्रोशिये का काम भी चलता रहता।

रात को जब बड़े भईया और पापा के घर आने का समय होता, वैदेही अपने टेबल पर किताबें खोल कर ऐसा शमा बाँध देती, जैसे सारा दिन पढ़ाई कर रही हो। पर उसके कान और आँखें लगे होते गली की ओर। पहले मंजिल की उसकी कमरे की खिड़की से जैसे ही भैया दूर गली के कोने पर नज़र आते, वह सीढ़ियाँ कूदती-फाँदती दरवाजा खोलने पहुँच जाती। बड़े भईया रोज़ कुछ ना कुछ लिए हुए घर पहुँचते- जलेबी, गर्म समोसे, मिठाईयाँ, फल या चॉकलेट। जो वे हमेशा प्यार से वैदेही को हीं पकड़ाते थे।

उस दिन भईया के हाथों में कुछ ज्यादा हीं सामान था और साथ में था एक नवयुवक – रणजीत। वह भईया के आफिस में काम करता था। भईया और पापा उसके शांत स्वभाव और कर्मठ व्यवहार से बड़े खुश थे। जल्दी हीं वैदेही सारा माज़रा समझ गई। यह सब उसके विवाह की तैयारी थी। वह भी खुश थी, जैसे इस उम्र की हर लड़की शादी के नाम से होती है। दोनों परिवार एक दूसरे से मिले और जल्दी हीं शादी हो गई। विवाह के बाद भईया ने मदद कर रणजीत का अलग व्यवसाय करवा दिया। व्यवसाय बड़ा अच्छा चल निकला।

शादी के बाद, कुछ दिनों में हीं वैदेही को पता चल गया कि रणजीत का शांत स्वभाव, वास्तव में तूफान के पहले की शांती थी। दरअसल वह बड़ा हीं गुस्सैल स्वभाव का था। पीना-पिलाना और देर रात तक ताश खेलना उसके रोज़ के नियम थे। नशे में वह अपना आपा और भी खो देता। रोज़ का झगड़ा और हो हल्ला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। इस बीच वैदेही तीन पुत्रों और एक पुत्री की जननी बन चुकी थी। पापा के गुजर जाने की वजह से उसे भईया-भाभी या माँ को यह सब बताने में हिचक होती थी। उसे यह भी लगता था, शायद समय के साथ रणजीत में सुधार आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

रणजीत को समझाने की वैदेही की कोशिश आग में घी का काम करती। वैदेही को नए कपड़ों और साड़ियों का बड़ा शौक था। हाथ में पैसे आते हीं वह भोला के दुकान से नई-नई साड़ीयाँ खरीद लाती। एक रात नशे में रणजीत ने हद कर दी। गुस्से में रणजीत नें वैदेही के सारी दामी कपड़े और साड़ियाँ इकट्ठे कर आग के हवाले कर दिये। वैदेही बड़े होते बच्चों के सामने तमाशा नहीं करना चाहती थे। पर ये बातें रणजीत की समझ में नहीं आती थीं।

दिन भर खुशमिजाज़ दिखने वाली वैदेही अंदर हीं अंदर घुलती रहती। अपनी सहेलियों को कुछ भी बताने से हिचकती थी। पर दीवारों के भी कान होते हैं। सारा आस पड़ोस बिना टिकट रोज़ का यह नाटक देखता था। एक रात रणजीत ने आने में बहुत देर कर दी। वैदेही का दिल धड़कने लगा। नशे में कहीं कुछ हो तो नहीं गया? लगभग आधी रात रणजीत घर पहुँचा। चिंतित वैदेही उस से देर से आने का कारण पूछने की भूल कर बैठी।
नशे में चूर रणजीत ने गाली-गलौज, हंगामा और झगड़ा शुरू कर दिया । बच्चे आँखें मलते जाग गए। रौद्र रूप धारण किए पति ने वैदेही को धक्के मार कर घर से बाहर कर दिया। बच्चों ने रोकना चाहा। उन सब को भी आधी रात में रणजीत ने घर से बाहर कर दिया। पीने-पिलाने के चक्कर में व्यवसाय का भी बुरा हाल था।

बड़ी होती बेटी और तीन बेटों की माँ आज असहाय अपने घर के बाहर आधी रात के समय लाचार खड़ी थी। दो-चार दिन अपने मायके में रह कर वह वापस लौटी। तब पता चला कि रणजीत को किसी केस की वजह से पुलिस खोज रही है। अतः वह फरार है। रणजीत के ना रहने से घर में शांती तो बहुत थी। पर पैसों के बिना घर चलना मुश्किल हो गया। पर कहते हैं ना कि ईश्वर सब सहने की हिम्मत देता है। एक ही रात में वैदेही के चारो बच्चे जैसे सयाने और समझदार हो गए। चारों ने अपनी योग्यतानुसार जो भी काम मिला करने लगे। वैदेही ने भी बुनाई-कढ़ाई जैसे काम शुरू कर दिये।

उनके पास जो था, जैसा था। उसमें हीं खुश थे। अब उन सब की जिंदगी सुकून भारी थी। तभी अचानक वैदेही की बेटी रौशनी के लिए अपने आप एक अच्छा रिश्ता आया। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शादी की तिथी पास आने लगी। अपने गहने बेच कर वैदेही ने पैसों का इंतज़ाम किया। बेटों ने अपनी-अपनी नौकरी से भी कुछ अग्रिम पैसे ले लिए थे। लड़के वालों की कोई फर्माइश नहीं थी। पर शादी का खर्च तो था हीं।

तभी एक विचित्र बात हुई। अचानक रणजीत घर वापस आ गया। परंतु उसका रूप-रंग बदला हुआ था। वह गेरुए धोती-कुर्ते में था। हाथों में था एक लंबा त्रिशूल, गले में लंबा रुद्राक्ष माला, लालट पर भभूत और पैरों में खड़ाऊँ। चेहरे पर कभी शिकन ना लानेवाली वैदेही को समझ नही आ रहा था कि सन्यासी पति के प्रत्यागमन पर वह रोए या हँसे।

चार बच्चों के साथ, बीच मझधार में वैदेही को अकेले छोड़ देने वाले पति ने उसे बताया कि वह बदल चुका है। अब वह परिवार में बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहता है। जब रात में वह जमीन पर कंबल बिछा कर सोने लगा, तब वैदेही को उस पर दया आ गई। वैदेही ने जानना चाहा कि इतने सालों तक वह कहाँ था। पूरी रात रणजीत अपनी दुख और कष्ट भरी कहानी सुनाता रहा। उसकी कितनी कठिन जिंदगी थी। उस रात नशे में तेज़ चलाते बाईक से दुर्घटना हो गई और उस व्यक्ती की वहीं मृत्यु हो गई। पुलिस से छुपने के कोशिश में वह घर से फरार हो गया।वह पहचाना ना जा सके, इसलिए उसने दाढ़ी-मूंछे बढ़ा ली थीं। भटकते-भटकते वह ईश्वर के द्वार, हरिद्वार पहुँचा। वहाँ वह गंगा तट पर गुरु जी से मिला। वैदेही के साथ किए गए अन्याय और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए बीमारों, कोढ़ियों और गरीबों की सेवा करता रहा इतने वर्षों तक। अब उसने सभी बुरी आदतें छोड़ दीं है।

रणजीत ने अगले दिन से बाज़ार के काम और सब्जियाँ लाने जैसे काम अपने जिम्मे ले लिया। जिंदगी पटरी पर आ गई थी। सभी बड़े खुश थे। बच्चे पिता के बदले रूप और स्वभाव से प्रसन्न थे। वैदेही शादी के कामों में उलझी थी। विवाह की पूर्वसंध्या पर संगीत कार्यक्रम में सभी व्यस्त थे। नाच -गाने का उल्लासपूर्ण माहौल था। तभी वैदेही को उनकी प्रिय सहेली ने इशारे से बुलाया।

वह वैदेही को चुप रहने का इशारा कर आपने साथ पीछे के गैरेज की ओर ले गई। जो प्रायः खाली और बंद पड़ा रहता था। द्वार के दरार से वैदेही ने देखा, रणजीत शराब पीने में व्यस्त है और अपने किसी मित्र से कह रहा है –“ यह मेरा सुरक्षित कमरा है। यहाँ पीने पर किसी को शक नहीं होता है। हाँ, मुझे पैसों की तंगी तो होती है। पर हाट-बाज़ार से पैसे बचा कर बोतल खरीद लाता हूँ। सोचता हूँ, कल रोशनी की बारात आने के ठीक पहले पीने का नाटक कर वैदेही से दस-बीस हज़ार रुपए झटक लूँगा। मैंने उसके पास काफ़ी रुपये देखे हैं।“ गेरुए वस्त्रधारी बगुले भगत का असली रूप देख वैदेही सन्न रह गई। उसे लगा, धरती फट जाये और वह भी सीता की तरह उसमें समा जाये।

उसके चेहरे पर घबराहट छा गई। यह कैसा पिता है, जो अपनी बेटी का शत्रु है। वह गैरेज की ओर आगे बढ़ी। तभी उसकी सहेली ने उसे हाथ पकड़ कर खींच लिया। दोनों ने कुछ बातें की और वैदेही के चेहरे पर कुछ निर्णायक भाव आ गए। अगले दिन शाम में शादी की भीड़-भाड़ अपने सबाब पर थी। दुल्हन बनी रोशनी बड़ी सुंदर लग रही थी। तभी नशे में झूमता रणजीत वैदेही से उज्जड तरीके से शराब खरीदने के लिए पैसे माँगने लगा।

तत्काल वैदेही ने बेटों से कह कर रणजीत के लिए शराब की बोतलें मँगवा दिया । तुरंत पैसे लाने का आश्वासान देते हुई रणजीत को शान्त रहने का निवेदन करने लगी । अपना काम इतनी सरलता से बनता देख रणजीत खुश हो गया और गटागट पीना शुरू कर दिया। वैदेही का तीर ठीक निशाने पर लगा था। थोड़ी देर में रणजीत नशे में चूर हो गया।तीनों बेटों ने उसे चुपचाप पीछे के उसी गैरेज में ड़ाल,बाहर से ताला बंद कर दिया।

रोशनी की शादी उसके अकर्मण्य पिता के अनुपस्थिती में बड़े अच्छे से सम्पन्न हो गया। अगले दिन उसकी बिदाई होने के बाद सभी मेहमानों को बिदा कर वैदेही  गैरेज के पास पहुँची। बेटों ने ताला खोला। रणजीत का नशा उतार चुका था। पर उस की आँखें अभी भी लाल थीं। बिखरे बाल, मुँह से शराब की दुर्गंध उसके चेहरे को कदर्य और भद्दा बना रही थीं।

अपना वार खाली जाते देख बौखलाया रणजीत, पहले की तरह झगड़े और मार-पीट पर उतारू हो गया। पर तभी वहाँ पुलिस आ गई। वैदेही को पुलिस अफसर ने धन्यवाद देते हुए कहा –“ आपने इसकी सूचना हमें दे कर अच्छा किया । बहुत दिनों से पुलिस इसे नशे में एक्सिडेंट करने की वजह से खोज रही थी। हरिद्वार की एक महिला ने भी इस पर केस दर्ज किया है। उस महिला ने बताया कि रणजीत ने हरिद्वार में उस से झूठ बोल कर विवाह किया था। कुछ साल उसके साथ बीताया। कुछ महीनों पहले उसके रुपये और गहने चोरी कर फरार हो गया था।

वैदेही आज बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था, काश वह पहले इतनी हिम्मत जुटा कर रणजीत को अपनी जिंदगी से बाहर कर पाती। 

 

images taken from internet.