Chattushringi / Chattushrungi Temple Pune

The presiding deity of the temple is Goddess Chattushringi, also known as Goddess Ambareshwari. She is also considered as the presiding deity of the city of Pune.

 

 

 

One of the fascinating things about the temple is that, the Chaturshringi temple has a miniature scale model of its entire premises displayed at the entrance.

Chattushringi (Chattu means four) is a mountain with four peaks. The Chattushringi temple is 90 feet high and 125 feet wide and is a symbol of power and faith.

 

The temple is  on the slope of a hill on Senapati Bapat Road. It is said to have been built during the reign of the Maratha king Shivaji.

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My Magarpatta Cyber City , Pune, Maharashtra, India

Posted by Chandni Sahay

Magarpatta is a beautiful, eco-friendly, green cyber city . It has schools,  Temple,  commercial zone, residential neighbourhoods, a multi specialty hospital, Season shopping mall, multiple restaurants, a gymkhana and a large park called Aditi Garden.

Misty Mist Fountain Welcomes the visitors.

 

Clean and wide roads , trimmed grasses n hedges !!!!!

Another beautiful water fountain……..

Calm and quiet Mahalaxmi Temple.

 

Gymkhana – Gym, Beauty parlour, club  swimming pool and steam bath , all in one place.

 

Season shopping mall

 

     Greenery of Aditi Garden.

 

 famous and   beautiful Amanora Shopping mall just opposite  side of  Season’s mall

All images courtesy – Rekha Sahay.

कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

 

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

 

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

 

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

जिन्दगी के रंग — 39

जीवन की परिभाषा 

और जीवन  मेंअपनी  परिभाषा

 ढूँढते ढूँढते   कई परिभाषाएँ बनी,  

बनती गई……  और  कई मिटी भी ……

पर यात्रा जारी हैँ 

किसी  शाश्वत और सम्पूर्ण 

परिभाषा  की खोज में …….

तारापीठ ( यात्रा वृतांत और रोचक किंवदंतियां )Tarapith

 

तारापीठ, साहपुर ग्राम पंचायत, मारग्राम पुलिस स्टेशन का एक छोटा सा गाँव है|तारापीठ बीरभूम जिले में है।यहाँ तारापीठ रेलवे स्टेशन है। रामपुर हाट निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन है जो यहाँ से लगभग 5-6 किमी दूर है। आसनसोल रेलवे स्टेशन भी यहाँ से करीब है। यहाँ रुकने के लिए अनेक होटल हैं। मंदिर मेँ दर्शन के दो मार्ग है। पहला सामान्य दर्शनार्थियों के लिए जो निःशुल्क है। दूसरा मार्ग उन विशिष्ट लोगों के लिए है जो 200/ रु का प्रवेश टिकिट लेते हैं। उन्हें आविलम्ब दर्शन की सुविधा प्राप्त होती ही। मंदिर दोपहर मेँ एक से दो बजे बंद कर दिया जाता है। इस समय माँ को भोग लगाया जाता है। यह हमलोगों के लिए एक यादगार यात्रा थी। तारापीठ के पहले हमलोगों ने वक्रेश्वर महादेव का दर्शन भी किया। शिव (वक्रेश्वर महादेव) और शक्ति (माँ तारा) का दर्शन सौभाग्य की बात है। वक्रेश्वर महादेव के मंदिर का स्थान गर्मपानी के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर और देवी का रूप – तारापीठ भारत भर में स्थित 51 पवित्र शक्ति पीठ में से एक है। पश्चिम बंगाल में द्वारका नदी के तट पर तारापीठ हरे-भरे धान के खेतों के बीच मैदानों में स्थित है। यह झोपड़ियों और तालाबों वाला एक ठेठ बंगाली गांव है। मंदिर लाल ईंटों की मोटी दीवारों से निर्मित है। इसमें कई मेहराब और एक शिखर है।

देवी गर्भगृह में स्थित है। गर्भगृह में माँ तारा की जिस मूर्ति को भक्त सामान्य रूप से देखतें है, वह वास्तव मेँ एक तीन फीट की धातु निर्मित मूर्ति है। जिसे वास्तविक पाषाण प्रतिमा पर सुशोभित किया जाता है। इसे देवी का राजवेश कहा जाता है।मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थीं। अतः उन्होंने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है। देवी के माथे पर लाल कुमकुम की बिंदी है। पुजारी इस कुमकुम / सिंदूर का एक तिलक माँ तारा के आशीर्वाद स्वरूप भक्तों के माथे पर लगाते हैं। माँ तारा की मौलिक मूर्ति देवी के रौद्र और क्रोधित रूप को दिखाता है। इसमें माँ तारा को बाल शिव को दूध पिलाते दर्शाया गया है। यह मूर्ति पत्थर की है। देवी के गले मेँ मुंडमाल है। मुख और जिव्हा रक्तरंजित है। चार हाथों मेँ विभिन्न हथियार सुशोभित है। जब 4:30 बजे सुबह मंदिर खुलता है तब केवल भाग्यशाली भक्तों को देवी के इस रूप के दर्शन का मौका मिलता है। मंदिर के परिसर में पवित्र “जीवित तालाब” निर्मित है।किवदंती है कि इस ताल में मृत को भी जीवित करने की शक्ति थी।

चढ़ावा या भोग – यहाँ भक्तगण समान्यतः नारियल, पेड़ा, सिंदूर, अगरू, चन्दन, गुलाबजल, आलता, फल, चुनरी, कमल, कनेर, नीला अपराजिता, जवा पुष्प या गेंदे की माला, बेलपत्र, नीली या लाल साड़ियां चढ़ते हैं। देवी को रुद्राक्षा माला भी प्रिय है क्योंकि मान्यता है कि रुद्राक्ष भगवान रुद्र (शिव का क्रोधी मुद्रा) के नेत्र के अश्रु बिन्दु से निर्मित हुए है।

कच्ची हल्दी का माला और नींबू की माला भी देवी को प्रिय है। गर्भगृह के ठीक बाहर माँ तारा के युगल चरण द्व्य हैं। जिस पर आलता डाला जाता है। तांत्रिक पद्धति के अनुसार कुछ भक्त आसव या मदिरा की बोतलें और अस्थि निर्मित माला का प्रयोग पूजा के लिए करते हैं। यहाँ छाग या खस्सी की बलि भी दी जाती है। मछली, खीर, दही, शहद मिश्रित चावल, शोल मछली, खस्सी का मांस आदि भी देवी को प्रिय है। वृहदनील तंत्र के दूसरे अध्याय में इसका निम्नलिखित वर्णन मिलता है-

मधुपर्कं विशेषेण देविप्रीतिकरं परम्।
सन्देश-मुष्णं दद्दाच्च लड्डू-कादि-समन्वितम् ॥२-८३॥
पायसं कृसरं दद्दाच्छर्करा-गुडसंयुक्तम्।
आज्यं दधि मधुन्मिश्रं तथान्नानि निवेदयेत् ॥२ -८४॥
शाल-मत्स्यं च पाठीनं गोधिका-मंस-मुत्तमम्।
अन्नं च मधुना मिश्रं यंत्राद् दद्दाच्च मंत्रवित् ॥२-८६॥
छाग-देवी माँसं तथा देवी रोहितं मतस्य-भर्जितम्।
योनिमुद्रां प्रदर्श्याथ आज्ञां प्राप्य यथाविधि ॥२-८७॥

महाश्मशान भूमि

बंगाल वामाचार, तंत्र साधना और शक्ति उपासना का प्राचीन केंद्र है। तारापीठ मेँ भी तंत्र साधना प्राचीन कल से प्रचलित है। श्मशान भूमि शक्ति उपासना का अभिन्न अंग माना जाता है। श्मशान भूमि जंगल परिवेश के बीच, सामाजिक जीवन और व्यवस्था से दूर होता है। तारापीठ मेँ श्मशान भूमि शहर की सीमा के अंत में नदी किनारे पर स्थित है। इस श्मशान भूमि और मंदिर में बामखेपा अवधूत ने एक भिक्षुक के रूप में साधना किया था। उन्होंने माँ तारा की पूजा करने के लिए अपने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका आश्रम भी मंदिर के करीब स्थित है। मंदिर परिसर मेँ उनकी मूर्ति स्थापित है। अपने गुरु संत कैलाशपति के संरक्षण मेँ बामखेपा अवधूत ने योग का ज्ञान और तांत्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।

तांत्रिक साधकों का मानना है कि माँ उग्र तारा का पसंदीदा स्थान श्मशान भूमि है। इसलिए बहुधा देवी तारा का मूर्तिरूप में चित्रण श्मशान भूमि के आस-पास किया जाता है। तारा,श्मशान भूमि, हड्डियों और कंकाल की ओर आकर्षित होती है, इस विश्वास के साथ तांत्रिक साधक यहाँ साधना करने के लिए आते है।

कई साधु स्थायी रूप से यहां रहते हैं। राख लिप्त साधु बरगद के पेड़ के नीचे या मिट्टी के झोपड़ियों मे रहते हैं। उनकी झोपड़ियों के दीवार तारायंत्र, लाल सिंदूर आरक्त खोपड़ी से अलंकृत होती हैं। प्रवेश द्वार पर गेंदा की माला और खोपड़ी से सजी माँ तारा की आकृति, त्रिशूल और जलती हुई धुनी आम दृश्य है। वे मानव के साथ-साथ गीदड़ों, गिद्धों की खोपड़ी और साँप की खाल / केंचुली से भी झोपड़ियों को सजाते है। पूजा और तांत्रिक उद्देश्यों के लिए इन वस्तुओं का इस्तेमाल होता हैं।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की तीसरी आंख का तारा गिरा था जो शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी। इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया।

सती के मृत शरीर ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर पड़े। शरीर के अंग जहाँ भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। तारापीठ उनमें से एक है। माना जाता है कि यहाँ सती के शक्तिशाली तृतीय नेत्र का तारा गिरा था। इसलिया यह तारापीठ कहलाया और शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक माना गया। अतः इसे साधना के लिए शक्तिशाली स्थल माना गया है।

२) दूसरी कहानी यहाँ स्थापित देवी के मौलिक मूर्ति से संबन्धित है। ब्रह्मांड को बचाने के लिए महासागरों के मंथन से निकला हलाहल यानि गरल पान शिव ने किया। जहर के प्रभाव से बचने के लिए शिव ने गरल को गले मेँ धारण कर लिया। जिससे उनका गला नीला पड़ गया और शिव नीलकंठ नाम से पुकारे जाने लगे।

इस कालकूट जहर को पीने से उन्हे गले में तीव्र जलन उत्पन्न हुई। तब तारा के रूप में सती ने जहर के प्रभाव से शिव को राहत देने के लिए अपना स्तनपान कराया। उन्होंने शिव को बालरूप में परिवर्तित कर, अपनी गोद में ले कर स्तनपान करवाया। जिससे शिव के गले की जलन शांत हुई। तारापीठ की मौलिक पाषाण प्रतिमा में यहीं रूप चित्रित किया गया है।

3) ऐसी मान्यता है कि महर्षि वशिष्ठ, देवी तारा की पूजा करने और हिंदुओं के बीच उसकी पूजा के महत्व का प्रसार करने वाले पहले व्यक्ति थे। सतयुग में महर्षि वशिष्ठ के पिता भगवान ब्रह्मा ने उन्हें सिद्धि प्राप्त करने के लिए देवी तारा की पूजा करने कहा। ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र वशिष्ठ​ को तारा मन्त्र की दिक्षा दी और मन्त्र सिद्ध करने कहा।

पिता के आज्ञानुसार वशिष्ठ​ निलान्चल पर्वत पर गये और देवी माँ की साधना करने लगे। परन्तु सिद्धि नहीं प्राप्त हुई। तब वे अपने पिता ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें निलान्चल छोड नील-पर्वत पर तपस्या करने कहा। परन्तु उन्हें इस बार भी सफलता नहीं मिली। अतः उन्हें लगा कि इस मंत्र को सिद्ध नही किया जा सकता है। तभी आकाशवाणी हुई,वशिष्ठ​ तुम चीन देश जाओ और वहाँ भगवान बुद्ध से साधन का सही विधि और क्रम​ जान कर मेरी अराधना करो।
वशिष्ठ मुनि चीन पहुंचे। वहाँ मुनि ने देखा कि भगवान बुद्ध मदिरा, माँस, मतस्य, नृत्य करती हुई नृत्यागंनायों के साथ व्यस्त है। यह देख वे मायूस हो कर वहाँ से लौटने लगे। तब बुद्ध ने उन्हें रुकने कहा। जब वशिष्ठ मुनि ने पुनः बुद्ध की ओर देखा तो वो चकित रह गये।

भगवान बुद्ध शान्त बैठे थे और ध्यान योग में थे। उसी तरह नृत्यागनाऐं भी आसन लगा कर बैठी थीं, मदिरा, माँस, मतस्य आदी सभी वस्तुये, पुजन सामाग्रियों में परिवर्तित हो गईं थीं। अन्तर्यामी बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि को माँ तारा के वामाचार पूजन की विधि बताई । उन्होंने बताया कि बैधनाथ धाम के १० योजन पूर्व, वक्रेश्वर के ४ योजन ईशान, जहन्वी के ४ योजन पश्चिम, उत्तर वाहिनी द्वारीका नदी के पूर्व, देवी सति का उर्ध नयन तारा अर्थात ज्ञान रुपि तृतीय नेत्र गिरा है। वहाँ पन्च मुण्डी आसन बना कर साधना करो। पन्च मुण्डी का अर्थ है दुर्घटना या आकाल मृत्यु को प्राप्त मनुष्य, कृष्ण सर्प, लंगुर, हाथी और उल्लू की खोपडी से बना हुअ आसन। वहाँ देवी तारा माँ के चरण चिन्ह अंकित है। उस स्थान पर देवी माँ के मन्त्र का ३ लाख जप करो और पन्चमकार विधि अर्थात मदिरा, माँस, मतस्य, मुद्रा तथा मैथुन से पूजा करो। तब तुम्हें देवी माँ की कृपा प्राप्त होगी।
वशिष्ठ मुनि ने बुद्ध के बताए विधि से पन्च मुण्डी आसन का निर्माण किया। फिर देवी अराधना की। फ़लस्वरुप उन्हें देवी माँ ने एक अत्यंत उज्जवल ज्योति के रुप में दर्शन दिया और पूछा कि तुम किस रुप में मेरा साक्षात दर्शन करना चाहते हो। वशिष्ठ मुनि ने उन्हें जगत जननी के रुप में देखने की कामना की।

तब देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि को भगवान शिव को बालक रुप में अपना स्तन पान करते हुये दर्शन दिया। देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि से वर मांगने के लिये कहा। वशिष्ठ मुनि ने उत्तर दिया –” आपका दर्शन मेरे लिये सब कुछ है। आप अगर कुछ देना चाहती है तो यह वर दिजिये कि आज के बाद इस आसन पर कोई भी साधक, आप के मन्त्रों का ३ लाख जप कर सिद्धी प्राप्त कर सके।” देवी माँ ने वशिष्ठ को कामनानुसार वर प्रदन किया। माँ तारा ने अपने भगवान शिव को बालक रुप में स्तन पान कराते स्वरूप को शिला में परिवर्तित कर दिय तथा वहीं पर निवास करने लगीं।

4) यह किवदंती तारापीठ के आलौकिक मंदिर के स्थापना से संबन्धित है। लगभग १२०० साल पहले देवी माँ के स्थान की पहचान जय दत्त नाम के एक व्यापारी ने किया। जय दत्त अपने पुत्र और साथियों के साथ द्वारका नदी के जल पथ से व्यापार कर लौट रहा था। खाने-पीने का सामान लेने के लिए उन्होंने द्वारिका नदी किनारे, देवी माँ के निवास स्थान पर नाव रोका।

दुर्भाग्यवश वहाँ जय दत्त के पुत्र की सांप काटने से मृत्यु हो गई। दुखी जय दत्त पुत्र के शव नाव पर रख शोक में डूब गया। उसके विलाप को सुनकर देवी ने नाव की खिड़की से जय दत्त से पूछा -” क्यों रो रहे हो? इस नाव में क्या हैं?” पुत्र मृत्यु से शोकाकुल जय दत्त ने बेसुधी में कह दिया- नाव में भस्म भरा पड़ा हैं। तत्काल नाव का सारा सामान राख़ में बदल गया। इस दौरान एक अन्य चमत्कार भी हुआ। उसके साथी नाविकों ने भोजन के लिए पास के तालाब से शोल मछली पकड़ी। उन्होंने उसे काट कर धोने के लिए तालाब के जल में डुबाया। कटी हुई मच्छली अपने आप जुड कर जिवित हो कर तालाब में छलांग लगाकर भाग गई। नाविकों ने जय दत्त को यह अद्भुत घटना सुनाई। तब जय दत्त ने पुत्र के शव को उस तालाब में डाला। चमत्कारिक रूप से वह जीवित हो गया।

सब समझ गये कि इस स्थान पर अवश्य ही कोई आलौकिक शक्ति है। जय दत्त ने उस स्थान पर रह कर उस आलौकिक शक्ति को जानने का प्रण कर लिया। उसने अपने पुत्र सहित कर्मिको को घर लौटा दिया। जय दत्त भक्तिभाव से उस आलौकिक शक्ति को ढूँढने लगा। उसकी भक्ति और पागलपन देख भैरव शिव ने उन्हे दर्शन दिये और उस स्थान से सम्बन्धित समस्त गाथायें सुनाई और उन्हे देवी के मन्त्रों की दिक्षा दी। जय दत्त ने तालाब अर्थात जिवित कुण्ड के किनारे देवी माँ का भव्य मन्दिर बनवाया और शिला मुर्ति को उस मन्दिर में स्थपित कर दैनिक पूजा का प्रबंध किया।

मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थी। अतः उन्होने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है। माँ ने कहा कि शिला मुर्ति को प्रतिदिन से आवरण से ढक दिया जाये। जय दत्त ने देवी माँ के बताये अनुसार मन्दिर का निर्माण करवाया। जिस दिन मन्दिर महा पूजा के साथ सभी भक्तों के लिये खोला गया। जय दत्त ने देखा उस शिला मुर्ति के साथ एक अन्य, देवी माँ का भव्य स्वरुप या राजवेश वहाँ पर है। आज भी देवी माँ के बतये हुये क्रम और विधि के अनुसार पूजा अराधना और पशु बली होती है तथा देवी के निर्देशानुसार राजवेश को मूर्ति पर धारण कराया जाता है। माँ तारा के दर्शन के बाद मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है और मन में मंत्र गुंजने लगता है-

“सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”

 

 

Source: तारापीठ ( यात्रा वृतांत और रोचक किंवदंतियां )

IMAGES courtesy –

http://www.templeadvisor.com/temples-in-india/hindu-temples/tarapith-shakti-peetha

Lovely Lake city – Lavasa, Maharashtra

 

Beautiful  Lavasa’s  plan is   based on the stylish Italian town Portofino, with a street and several buildings bearing the name of that town.

There are many  good hotels ,  exquisite  2 and 1 bedroom apartments and studio apartments / cottages.

 

Shortcut  to  hills and cottages.

 

View of Lavasa  from Bombay point –  lake and watersports point 

Lavasa is a privately planned hill city located near Pune in Maharashtra. Its a 2:30- 3 hrs drive from Pune. It   is located in the Western Ghats of Maharashtra and is situated in Mulshi Valley

 

 

Nature trail 

 

 

Nature trail  – Ant nest area.

 

Club and swimming pool

 

 

 

Peaceful evening  at the lakeside.

 

A Walk along the serene Nature trail 

 

 

Mercure Hotels’ green walls .

 

A walk  along the city.

Backwater of  Mose river. It is also called Veer Baaji Pusalkar Dam.

 

Images courtesy Chandni Sahay