अपने आप को

अपने आप को आईने में ढूँढा,

परछाइयों में अक्सों….

चित्रों में खोजा,

लोगों की भीड़ में ,

किसी की आँखों में खोजा,

यादों में, बातों में खोजा,

भूल गई अपने दिल में झाँकना.

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बराबरी की बात

आईने में  अपने प्रतिद्वंद्वी व मित्र को देखा।

जीवन की स्पर्धा, प्रतिस्पर्धा , मुक़ाबला

किसी और से नहीं अपने आप से हो,

तब बात बराबरी की है।

वर्ना क्या पता प्रतियोगी या हम,

कौन ज्यादा सक्षम है?