मौसम अौर लोग

किसी को अपनी आदत बनाना ठीक नहीं,

लोगों को मौसम की तरह बदलते देखा है।

जिंदगी के रंग -47

चाहो जरुर अपने आप को ।

पर इतना भी ना चाहो कि

किसी अौर को चाहने की

जगह हीं ना रहे दिल में।

अौर

चाहो जरुर दूसरों को ।

पर इतना भी ना चाहो कि

खुद को चाहने की जगह ही ना रहे दिल में।

 

कविता की अंतिम तीन   पंक्तियाँ   सआभार ब्लॉगर मित्र  अभय  के सौजन्य से ।

जीवन के रंग – 42

हम सभी के पास

अपनी -अपनी कहानियाँ हैं…..

हम सब किसी ना किसी दौर से गुजरें हैं।

प्यार, नफरत, पसंद, नापसंद,

पछतावा दर्द , दुःख,  खुशी……

जो शायद दूसरे ना समझें।

यह सब तो जीवन के रंग हैं।

जो हमें तोङने के लिये नहीं

जोङने के लिये होते हैं।

शब्दों के घाव destroy somebody by words

तलवार अौर आघातों के

गहरे घावों को भरते देखा है।

पर ना दिखने वाले शब्दों के घावों

को ताउम्र कसकते देखा है।

शब्दों से किसी को नष्ट करना आसान है

पर कटु शब्दों के तासीर को

नष्ट करना नामुमकिन है।

 

शांती-चैन की खोज

समय के साथ भागते हुए लगा – घङी की टिक- टिक हूँ…

तभी

किसी ने कहा  – जरुरी बातों पर फोकस करो,  

तब लगा कैमरा हूँ क्या?

मोबाइल…लैपटॉप…टीवी……..क्या हूँ?

सबने कहा – इन छोटी चीजों से अपनी तुलना ना करो।

हम बहुत आगे बढ़ गये हैं

देखो विज्ञान कहा पहुँच गया है………

सब की बातों  को सुन, समझ नहीं आया 

आगे बढ़ गये हैं , या उलझ गये हैं ?

अहले सुबह, उगते सूरज के साथ देखा

लोग योग-ध्यान में लगे 

पीछे छूटे शांती-चैन की खोज में।