क्यों चुप है चाँद ?

क्यों आज चुप है चाँद ?

ना जाने कितनी बातों का गवाह

कितने रातों का राज़दार

फ़लक से पल पल का हिसाब रखता,

कभी मुँडेर पर ,

कभी किसी  शाख़-ए-गुल को चूमता,

गुलमोहर पर बिखरा कर अपनी चाँदनी अक्सर

थका हुआ मेरी बाहों में सो जाता था.

किस दर्द से बेसबब

चुप है चाँद ?

नाम -कविता 

खिला खिला गुलमोहर तपिश में मोहरें लूटाता रहा…..

पूरा चाँद,  रात भर  जल कर चाँदनी बाँटता  रहा.

ना पेड़ों ने कहीँ अपना नाम लिखा ना शुभ्र गगन में चाँद ने.

और हम है घरों – कब्रों पर अपना नाम लिखते रहते है.

 

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