गुल्लक अरमानों का

एक था गुल्लक .

अरमानों का.

आधे अधूरे और कुछ पूरे

अरमानों को डालते डालते ,

कब वक़्त गुज़र गया ,

पता नहीं .

जब गुल्लक फूटा….

नज़रों के सामने

बिखरे गये अरमान अनेक .

गुड़िया सजाने ,

पड़ोस के बाग़ से अमरूद चुराने ,

अौर ना जाने कितने सारे अरमान ……

सब पुराने….. बेकार ……

एक्सपायर हो चुके थे .

चाहत -कविता

गर चाहत हो, ईमानदारी हो,

कमजोर की हिफाजत में भी चीजें  महफूज रह सकती हैं

जैसे मिट्टी के गुल्लक में

 लोहे के सिक्के