क्यों चुप है चाँद ?

क्यों आज चुप है चाँद ?

ना जाने कितनी बातों का गवाह

कितने रातों का राज़दार

फ़लक से पल पल का हिसाब रखता,

कभी मुँडेर पर ,

कभी किसी  शाख़-ए-गुल को चूमता,

गुलमोहर पर बिखरा कर अपनी चाँदनी अक्सर

थका हुआ मेरी बाहों में सो जाता था.

किस दर्द से बेसबब

चुप है चाँद ?

ख़ुद को ख़ुद से

कुछ उलझा उलझा ,

कुछ रूठा रूठा सा है वजूद अपना

ख़ुद को ख़ुद से याद करूँ कैसे ?

करना है ख़ुद को ख़ुद से आज़ाद .

करुँ कैसे ?

बड़ा उलझा प्रश्न है.

कभी कभी उठने वाली कसक,

मन की दर्द , पीड़ा , विरह

किसी को समझाऊँ कैसे ?

अपने से, अपने रूह से बात करूँ कैसे ?

ज़िंदगी के रंग -114

दर्द ने बताया

समंदर बाहर हो या

दिल अौ आँखों के अंदर .

दोंनो खारे होते हैं.

ज़िंदगी के रंग -111

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star

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ज़िंदगी से हिसाब करना है

आहिस्ता- आहिस्ता…..

पहले दर्द में जीने का सबक़ तो सीख लें.

काली रात के बाद

सुबह के तारे का इंतज़ार है.

इंतज़ार है सुबह के तारे का ……

और उगते सूरज के साथ उसके खो जाने का ……

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star.

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बिखरती खुशबू

बिखरती खुशबू को समेटने

की चाहत देख सुगंध ने कहा –

हमारी तो फितरत हीं है बिखरना

हवा के झोंकों के साथ।

तुमने बिखर कर देखा है कभी क्या ?

इस दर्द में  भी आनंद है।

 

दर्द भरे दिल पर बोझ

दर्द भरे दिल पर पङे बोझ को जब उठाया

उसके तले दबे
बहुत से जाने पहचाने नाम नज़र आये।

जो शायद देखना चाहते थे….
तकलीफ देने से कितना दर्द होता है?

पर वे यह तो भूल गये कि
  चेहरे पर पङा नकाब भी तो सरक उनके असली चेहरे दिखा गया।

काल चक्र

जिंदगी के हसीन  पलों को

कितनी  भी बार कहो – थम जा !!

पर यह कब रुकता है?

पर दर्द भरे पलों का

बुलाअो या ना बुलाअो,

लगता है यह खिंचता हीं चला जा रहा है………

पता नहीं समय का खेल है या मन का?

पर इतना तो तय है –

वक्त बदलता रहता है………….

यह काल चक्र चलता रहता है।

जैसा भी समय हो,    बीत हीं जाता है ……….