ज़िंदगी के रंग -113

जब तक फूलों सी

ख़ुशबू औ नज़ाकत थी .

बेदर्दी से पेश आते रहे लोग .

अपने को काँटे सा कठोर दिखाने के बाद

हम तो नहीं बदले पर

लोग बदल गए….

कुछ सुधर से गए हैं…..

शुभ नव वर्ष Happy New Year

टेढी -मेढी  बल खाती पगङंङी, ऊँची- नीची राहें ,

कभी फूलों  कभी कांटों के बीच,

 तीखे मोड़ भरे  जीवन का  यह  सफ़र

मीठे -खट्टे अनुभव, यादों,  

के  साथ

 एक अौर साल गुज़र  गया

कब …..कैसे ….पता हीं नहीं चला। 

कभी खुशबू, कभी आँसू  साथ निभाते रहे।

पहेली सी है  यह  जिंदगी।

अभिनंदन नये साल का !!! 

मगंलमय,  

नव वर्ष की शुभकानायें !!!!

 

 

 

मौसम

हमारे अंदर भी  क्या बदलते मौसम हैं ?

क्या कभी  बसंत अौर कभी पतझङ  होते हैं ?

कभी कभी सुनाई देती है  गिरते पत्तों की उदास सरसराहट

या शरद की हिम शीतल खामोशियाँ

अौर कभी बसंत के खिलते फूलों की खुशबू….

ऋतुअों अौर मन का यह  रहस्य

बङा अबूझ है………

 

 

सदाबहार शरद सप्तपर्णी – कविता

सप्तपर्णी / एल्स्टोनिया स्कोलरिस – Apocynaceae / Alstonia scholaris

‘यक्षिणी  वृक्ष’  कहलाने वाला सप्तपर्णी   वृक्ष के नीचे कविन्द्र  रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश  लिखे थे।   शांति निकेतन में  दीक्षांत समारोह में छात्रों को सप्तपर्णी के गुच्छे देने का प्रचलन हैं।  थरवडा बौद्ध धर्म  में भी इस  वृक्ष  की पत्तियों के  इस्तेमाल की बात   है। ये फूल  मंदिरों और पूजा में भी काम आता है , हालाकि इसके पराग से कुछ लोगों को  एलर्जी भी होती है।आयुर्वेद व आदिवासी लोग प्राकृतिक उपचार में इस पेड़ की छाल, पत्तियों आदि को अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर अपनाते हैं।

बिन बुलाये घुस  आई रातों में अपनी खुशबू लिये ,

यक्षिणी  वृक्ष के फूलों की मादक सम्मोहक सुगंध। 

      अौर

कस्तूरी मृग की तरह, खुशबू की खोज खींच लाई,

चक्राकार  सात पत्तियो के बीच  खिले 

सप्तपर्णी  के सदाबहार फूलों के पास।

जिसकी सुरभी शामिल है,

रवींद्रनाथ ठाकुर ने  ‘गीतांजलि’ में भी ।

leaf

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