इंद्रधनुष

बरसात की झड़ी

बादलों का गरजना ,

बरसती बूँदों की झड़ी

से प्यार हो जाता हैं ,

जब नीले आसमान में

छिटके इंद्रधनुष की सतरंगी

छँटा खिड़की तक उतर आती हैं.

धनक दिल और धड़कनों को अपने रंग में रंग जाती है.

 

धृष्ट चाँद

पूनम का धृष्ट चाँद बिना पूछे,

बादलों के खुले वातायन से

अपनी चाँदनी को बड़े अधिकार से

सागर पर बिखेर गगन में मुस्कुरा पड़ा .

सागर की लहरों पर बिखर चाँदनी

सागर को  अपने पास बुलाने लगी.

लहरें ऊँचाइयों को छूने की कोशिश में

ज्वार बन तट पर सर पटकने लगे .

पर हमेशा की तरह यह मिलन भी

अधूरा रह गया.

थका चाँद पीला पड़ गया .

चाँदनी लुप्त हो गई .

सागर शांत हो गया .

पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी .

पूरब से सूरज झाँकने लगा था .

कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

बरसात की हलकी फुहार

के बाद सात रंगों की

खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।

बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं

कुछ खोजे लगी….. बोली….

खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर

कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,

बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से

मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।

आसमान के बादल

आसमान के बादलों से पूछा –

कैसे तुम मृदू- मीठे हो..

जन्म ले नमकीन सागर से?

रूई के फाहे सा उङता बादल,

मेरे गालों को सहलाता उङ चला गगन की अोर

अौर हँस कर बोला – बङा सरल है यह तो।

बस समुद्र के खारे नमक को मैंने लिया हीं नहीं अपने साथ।