रिश्ते

झुक कर रिश्ते निभाते-निभाते एक बात समझ आई,
कभी रुक कर सामनेवाले की नज़रें में देखना चाहिये।
उसकी सच्चाई भी परखनी चाहिये।
वरना दिल कभी माफ नहीं करेगा
आँखें बंद कर झुकने अौर भरोसा करने के लिये।

गैरों पर भरोसा

अपनी तो आदत थी

गैरों पर भी यकीन करने की।

अपनों ने हीं सिखा दिया शक करना।

गैरों पर भरोसा किया होता,

तब शायद धोखे कम मिले होते..

जिंदगी के रंग – 30

समझौता, भोलापन, भरोसा हँस पङे।

बोले हमारे साथ रहने वाले का यही हश्र होता है

पर एक बात है!

हम जिंदगी का आईना अौर दुनिया की असलियत जरुर दिखा देतें हैं।

भरोसा अौर फरेब – कविता

धोखा- फरेब की परिभाषा खोजने पर,

जवाब मिला, दूर जाने की क्या जरुरत है?

यह तो अक्सर पास वालों से मिलता है।

खरीदने की भी जरुरत नहीं, मुफ्त बँटता रहता है,

बस थोङा भरोसा कर के तो देखो….

काँच की किर्चियाँ

 

भरोसा दिल मे उतरने वाले पर करो, दिल से उतरने वालों पर नहीं।

टूटे काँच की किर्चियाँ  अौर  टूटा  भरोसा बङी चुभन देता है। ।

 

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