जिंदगी के पन्ने

जिंदगी के किताब के पन्ने,

हवा के शरारती झोंके से,

फड़फड़ाते शोर मचाते पलटते देखा।

 खूबसूरत नाजुक, लम्हे फिसलते देखा,

बेइंतहा इम्तिहानो से जिंदगी को गुजरते देखा,

जरूरत के वक्त रिश्तो को बदलते देखा,

पुराने फीके, पीले पन्नों जैसे फीके पङते यादों को जी कर देखा।

बस इतना ही समझ आया –

 कभी समय नहीं गुजरता और कभी-कभी समय नहीं ठहरता।

और वक्त गुजरने में वक्त नहीं लगता।

कभी कभी टूटने दो हमें !!

शब्दों से…सहारे से…ना समझाओ हमें,

कि हमने सब संभाल रखा है बड़े अच्छे से।

 जब हम न संभाल सकें

     टूटने दो हमें भी कभी कभी ……..

 चाह नहीं है हमें हमेशा पहाड़ों को जीतने की।

कभी कभी पेड़ों के झुरमुट में चुपचाप चलना,

चँद बुंद आँसू बहाना भी अच्छा लगता है.

ज़िंदगी के रंग -160

इंसान की फ़ितरत होती है ,

मधुर यादों और

सुहानी कल्पनाओं में जीने की.

अपने अतीत की यादों

और भविष्य की संभावनाओं में

अपने को सीमित न करें .

ज़िंदगी के रंग – 149

बिगड़ी बातों को बनाना ,

नाराज़गी को संभालना,

तभी होता हैं जब

बिगाड़ने या नाराज़ होने वाला चाहे .

यह छोटी पर गूढ़ बात

बड़ी देर से समझ आई….

कि एक हाथ से ताली नहीं बजती.

ख़ुद को

हम कई बार खुद को

बिसार देते हैं।

खुद का ख्याल रखना भूल जाते हैं,

अपनों  के लिए अपने-आप को सहेजना है जरुरी।

स्पष्ट सुलझे दिलो-दिमाग अौ मन के लिये

टूट कर बिखरने से खुद को खुद से है संभालना है जरुरी।

सदायें

बरसात में बिन बोए भी

कुकुरमुते निकल आते है,

वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .

पहाड़ों में दी आवाज़ें भी

गूँज बन लौट आती है वापस.

फिर क्यों कभी – कभी ,

किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?

कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

बरसात की हलकी फुहार

के बाद सात रंगों की

खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।

बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं

कुछ खोजे लगी….. बोली….

खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर

कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,

बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से

मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।