ज़िंदगी के रंग -160

इंसान की फ़ितरत होती है ,

मधुर यादों और

सुहानी कल्पनाओं में जीने की.

अपने अतीत की यादों

और भविष्य की संभावनाओं में

अपने को सीमित न करें .

ज़िंदगी के रंग – 149

बिगड़ी बातों को बनाना ,

नाराज़गी को संभालना,

तभी होता हैं जब

बिगाड़ने या नाराज़ होने वाला चाहे .

यह छोटी पर गूढ़ बात

बड़ी देर से समझ आई….

कि एक हाथ से ताली नहीं बजती.

ख़ुद को

हम कई बार खुद को

बिसार देते हैं।

खुद का ख्याल रखना भूल जाते हैं,

अपनों  के लिए अपने-आप को सहेजना है जरुरी।

स्पष्ट सुलझे दिलो-दिमाग अौ मन के लिये

टूट कर बिखरने से खुद को खुद से है संभालना है जरुरी।

सदायें

बरसात में बिन बोए भी

कुकुरमुते निकल आते है,

वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .

पहाड़ों में दी आवाज़ें भी

गूँज बन लौट आती है वापस.

फिर क्यों कभी – कभी ,

किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?

कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

बरसात की हलकी फुहार

के बाद सात रंगों की

खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।

बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं

कुछ खोजे लगी….. बोली….

खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?

इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर

कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,

बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से

मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।

मौसम

हमारे अंदर भी  क्या बदलते मौसम हैं ?

क्या कभी  बसंत अौर कभी पतझङ  होते हैं ?

कभी कभी सुनाई देती है  गिरते पत्तों की उदास सरसराहट

या शरद की हिम शीतल खामोशियाँ

अौर कभी बसंत के खिलते फूलों की खुशबू….

ऋतुअों अौर मन का यह  रहस्य

बङा अबूझ है………

 

 

कठपुतली

हम समझते हैं कि

हम सब समझते हैं।

पर ऊपर बैठ,

जो अपनी ऊँगलीं के धागे से

हम सबों को नचा रहा है कठपुतली सा।

उसे हम कैसे भूल जाते हैं?