पहेली

भविष्य टुकड़े टुकड़े बँटीं हुईं,

एक पहेली है.

जोड़ कर अनुमान

लगाने की कोशिश

में ज़िंदगी और बड़ीं

पहेली बना जाती है.

भविष्य बनाने की कोशिश के साथ ,

क्यों नहीं वर्तमान में जिया जाए ?

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दिल और ज़ज्बातों के रिश्ते

सिमटते जा रहे हैं,

दिल और ज़ज्बातों के रिश्ते।

सौदा करने में जो माहिर है,

बस वही कामयाब है।

Unknown

एक राह

एक राह दिख गया गुलाबों की पंखुड़ियों भरा !!

चल दिए उसपर ,

भूल कर कि गुलाबों में काटें भी होते हैं……..

काटों की कसक आज भी है.

ख़त

पता बदल चुका है,

पर दिल है कि

मानता नहीं.

वही लवों पर छलकती

ख़तों की भाषा

पुरानी यादों की ख़ुशबू,

उसी पते पर आतीं और

द्वार खटखटातीं है.

ज़िंदगी के रंग -95

सोंच- संभाल कर

बोली के जादू को काम में लाओ .

बातों के रंग

निराले होते हैं.

ना जाने कब , कैसे

किसी की बातें

दिल में उतर कर मन मोह लेतीं हैं.

किसी की , तीर बन दिल को चीर जातीं हैं,

नश्तर बन मन को छलनी कर देतीं हैं.

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ , के जन्मदिन (२३ सितंबर ) पर

राष्ट्र कवि, पद्म विभूषण रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (२३ सितंबर १९०८-२४ अप्रैल१९७४) का जन्म सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था । उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की । उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था । उनकी अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है ।

कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग की चंद पंक्तियाँ

वह कौन रोता है वहाँ-

इतिहास के अध्याय पर,

जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है

प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;

जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;

जो आप तो लड़ता नहीं,

कटवा किशोरों को मगर,

आश्वस्त होकर सोचता,

शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?

और तब सम्मान से जाते गिने

नाम उनके, देश-मुख की लालिमा

है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;

देश की इज्जत बचाने के लिए

या चढा जिनने दिये निज लाल हैं ।

ईश जानें, देश का लज्जा विषय

तत्त्व है कोई कि केवल आवरण

उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का

जो कि जलती आ रही चिरकाल से

स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी

नायकों के पेट में जठराग्नि-सी ।