ज़िंदगी के रंग-91

हम किसी का हिस्सा बन गए ,

पर सामने वाले ने

जाना हीं नहीं ….

माना हीं नहीं ….

सवालों भरी इस

राह पर

गर ये कहे कि,

मेरे सवालों का

जवाब तुम हो .

तो भी क्या फ़ायदा ?

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ज़िंदगी के रंग -90

बातों और अनदेखी करनेवाली निगाहों

से भी चोटे लगती है .

दर्द तो ठीक भी हो जाते है ,

पर रह जाती है टीसे और निशान

याद दिलाने के लिए .

पूरी ज़िंदगी लग जाती है

कभी ना मिटने वाले, ऐसे निशान,

मिटाने के लिए .

उठो द्रौपदी

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।

कब तक आस लगाओगी तुम

बिके.. हुए अखबारों से।

कैसी रक्षा मांग रही हो

दु:शासन…. दरबारों से।

स्वंय… जो लज्जाहीन पड़े हैं

वे क्या लाज बचायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।Il१॥

कल तक केवल अंधा राजा

अब गूंगा बहरा भी है।

होंठ सिल दिये हैं जनता के

कानों पर पहरा भी है।

तुम्ही कहो ये अश्रु तुम्हारे

किसको क्या समझायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविन्द न आयेंगे।ll२॥

छोड़ो मेंहदी भुजा संम्भालो

खुद ही अपना चीर बचा लो।

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि

मस्तक सब बिक जायेंगे।

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो

अब गोविद न आयेंगे। Il३॥

अटलबिहारी वाजपेयी

एक कवि और महान नेता को श्रद्धा सुमन !!

छोटे मन से कोई

बड़ा नहीं होता,

टूटे मन से कोई

खड़ा नहीं होता .

युगपुरूष अटल बिहारी बाजपेयी

ज़िंदगी के रंग- 89

एक टुकड़ा ज़िंदगी का

बानगी है पूरे जीवन के

जद्दोजहद का .

उठते – गिरते, हँसते-रोते

कभी पूरी , कभी स्लाइसों

में कटी ज़िंदगी

जीते हुए कट हीं जाती है .

इसलिए मन की बातें

और अरमानों के

पल भी जी लेने चाहिये.

ताकि अफ़सोस ना रहे

अधूरे हसरतों ….तमन्नाओं …. की.

ज़िंदगी के रंग – 88

ज़िंदगी के दो छोरों

को बाँधने की कोशिश

ना करना.

हमने इस कोशिश में

जाया किया है

सुनहरे पलों को.

और हाथ आया सिफ़र .

यह तो वह बहाव है .

जो अपना रास्ता

ख़ुद ही ढूँढ लेती है .