ज़िंदगी के रंग- 89

मेरी एक पुरानी कविता –

ना जाने क्यों, कभी-कभी पुरानी यादें दरवाजे की दहलीज  से आवाज़ देने लगती हैं। 
AUGUST 16, 2018 REKHA SAHAY

 

एक टुकड़ा ज़िंदगी का

     बानगी है पूरे जीवन के

            जद्दोजहद का.

                उठते – गिरते, हँसते-रोते

                      कभी पूरी , कभी स्लाइसों

                                  में कटी ज़िंदगी

                                      जीते हुए कट हीं जाती है .

                                  इसलिए मन की बातें

                           और अरमानों के

                    पल भी जी लेने चाहिये.

                   ताकि अफ़सोस ना रहे

अधूरे हसरतों ….तमन्नाओं …. की.

जिंदगी के रंग -145

अब क्या लिखें कि तुम्हारे जाने से क्या हुआ ?

अब क्या बताएँ कि तुम्हारे मिलने से क्या हुआ था?

खंडित काव्य में व्यक्त आधा अधूरापन  सा,

हवाओं ने बदला रूख जीवन यात्रा का।

तितिक्षा से…बिन प्रतिकार,

बिना शिकायत, धैर्य से कोशिश है,

भँवर में जो शेष है … बचा है….

उसे बचाने की।

ज़िंदगी के रंग -123

खुशी की खोज में सोंचा नया कुछ करते हैं, खुशी झाँकी अौर बोली

आजमाअो हमें भी, मुस्कुराहट कभी आउट ऑफ़ फैशन नहीं होता .

ज़िंदगी के रंग -111

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star

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ज़िंदगी से हिसाब करना है

आहिस्ता- आहिस्ता…..

पहले दर्द में जीने का सबक़ तो सीख लें.

काली रात के बाद

सुबह के तारे का इंतज़ार है.

इंतज़ार है सुबह के तारे का ……

और उगते सूरज के साथ उसके खो जाने का ……

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star.

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