Psychology and life: The Worst Barrier To Weight Loss

वजन घटाने में एक बङी बाधा : हमारी मानसिक अवस्था Our mental state

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वजन घटाने में एक बङी बाधा : हमारी मानसिक अवस्था Our mental state

हमारी मानसिक अवस्था ऐसी स्थिति के लिये बहुत हद तक जिम्मेदार होती है हम जब बेहद परेशान होते हैं तब हम डिफेंसिव एटीट्यूड अौर Status quo मतलब यथास्थिति या हम जैसे हैं वैसे ही स्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

जब हम मानसिक आघात, ट्रौमा, अनजाने एंग्जायटी, मानसिक दबाव ,डर , अनजानी परिस्थती, या बस्तुअों से घबराये हुए होते हैं अौर अपनी स्थिति बदलना नहीं चाहते हैं। ऐसे में अपनी मानसिक स्थिति को जरूरत से ज्यादा नियंत्रित करने की कोशिश करने लगते है

मानसिक दवाब की स्थिति में हम उल्टा सीधा भोजन , अधिक कैलोरी वाले भोजन, चीनी ऐसी चीजें, खाना की मात्रा बढ़ा देते हैं ।  यह एक तरह का इटिंग डिसऑर्डर है। इसकी वजह से भी वजन नहीं घटता।

उपाय Solution

ऐसे में जरूरत है कि अपनी परेशानियों को समझ कर अपने को संभालने की कोशिश करें। अगर व्यक्तिगत रूप से यह संभव नहीं है तो प्रोफेशनल मदद भी लेनी चाहिए । दूसरी बात है – योग, ध्यान, प्राणायाम, एक्सरसाइज, वाक जैसी आदतों को नियमित रूप से शुरू करें।

इसके अलावा हमें अपनी हॉबी और मन बहलाने के साधन भी पर भी ध्यान देना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए ऐसे मित्रों के साथ समय बिताएं जो आपकी समस्या को समझ कर सहायता करें। सपोर्ट ग्रुप के साथ समय व्यतीत कर अपने को संभालने की कोशिश करनी चाहिए। इन सब के बाद अगर वजन घटाने का नियमित अभ्यास व कोशिश की जाए। तब डाइट और शारीरिक गतिविधियों से असर नजर आने लगता है, क्योंकि अगर मानसिक रूप से स्वस्थ होकर कोशिश की जाए। तब यह जरूर कारागार होता है

सबसे महत्वपूर्ण सुझाव

कभी कभी मानसिक स्थिति ऐसी हो जाती है कि कुछ भी करना लगभग असंभव लगता है । घबरायें नहीं। यह सब बातें मानसिक दवाब के समय सामान्य है। ऐसे में थोड़ा प्रयास करें, दोस्तों, परिवार से मदद लें। थोङे से शुरुआत करें। उदाहरण के लिए तीन प्राणायाम, 5 मिनट के ध्यान, थोङा वाक से शुरू किया जा सकता है

ऐसे लोगों के साथ ना रहने की कोशिश करें। जो नकारात्मक या परेशान करने वाली बातों से आपको परेशान, अशांत, विक्षुब्ध करें।


बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

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बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता  है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाओ असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों  और समस्याओं  को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं  से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों  को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर  टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं  को बताना, नयी जिम्मेदारियों  को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की  भी मदद  ली  जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटि-स्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में  बिना सलाह इसे ना लें।