विश्वकर्मा पूजा Vishwakarma Day

 Vishwakarma Jayanti / Puja is a day of celebration for  Hindu god, Vishwakarma .He is considered divine architect, Creator of fabulous weapons for the Gods and is credited with Sthapatya Veda, the science of mechanics and architecture.

हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विश्वकर्मा निर्माण एवं सृजन के देवता कहे जाते हैं। माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही इन्द्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक, लंका आदि का निर्माण किया था। इस दिन विशेष रुप से औजार, मशीन तथा सभी औद्योगिक कंपनियों, दुकानों आदि पूजा करने का विधान है।

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मोक्ष  -कविता 


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नचिकेत और यम का संवाद

Kathy Upanishad   was written by achary  Kath. It is legendary story of a little boy, Nachiketa who meets Yama (the Indian deity of death). Their conversation evolves to a discussion of the nature of mankind, knowledge, Soul, Self and liberation.

आचार्य कठ ने  उपनिषद रचना की।  जो कठोपनिषद  कहलाया।  इस में  नचिकेत और यम के बीच  संवाद का  वर्णन है । यह मृत्यु रहस्य और आत्मज्ञान की चर्चा है।

 

 

विश्वजीत  यज्ञ किया  वाजश्रवा ने ,

सर्वस्व दान के संकल्प के साथ।

पर कृप्णता से दान देने लगे वृद्ध गौ।

पुत्र नचिकेत ने पिता को स्मरण कराया,

प्रिय वस्तु दान का नियम।

क्रोधित पिता ने पुत्र  नचिकेत से कहा-

“जा, तुझे करता हूँ, यम को दान।”

नचिकेत  स्वंय  गया यम  के द्वार ।

तीन दिवस  भूखे-प्यासे नचिकेत के

प्रतिबद्धता से प्रसन्न यम ने दिया  उसे तीन वर ।

पहला वर  मांगा -पिता स्नेह, दूसरा -अग्नि विद्या,

तीसरा – मृत्यु रहस्य और आत्मा का  महाज्ञान।              

और जाना आत्मा -परमात्मा , मोक्ष का गुढ़ रहस्य.

यज्ञ किया पिता ने अौर महाज्ञानी बन गया पुत्र ।

 

लुप्त सरस्वती नदी – वैदिक ज्ञान का लोप और कृष्ण द्वयपायन द्वारा पुनः संरक्षण ( महाभारत की रोचक कहानियाँ )

saraswati-river

पौराणिक कथा के अनुसार 12 वर्ष के भयंकर सूखे से सरस्वती नदी  शुष्क हो तिरोहित हो गई। इसका गहरा  प्रभाव मानव जाति पर पड़ा। 

 इस दौरान मानव, मात्र अपने जीवित रहने के प्रयास में ज्ञान से दूर होता गया। इस नदी के तट पर यज्ञ-पूजन करने वाले ऋषीगण  और लोग, भयंकर आकाल के कारण  यहाँ से पलायन कर गए। इस भयंकर आकाल ने सरस्वती नदी के साथ वेद  के ज्ञानों को भी  लुप्त कर दिया।

  सरस्वती ही तब विशालतम, परम पवित्र ,और मुख्य नदी थी।  ऐसा वर्णन वेद, पुराण रामायण, महाभारत, वैदिक सभ्यता आदि में मिलता  है।

     यह देख महर्षि पराशर के पुत्र और भगवान ब्रह्मा के अवतार, वेद व्यास या कृष्ण द्वयपायन ने पुनः सभी ज्ञानपूर्ण वेदों को जमा, संकलित और सरल भाषा में रचित किया । इसे चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद में पुनः जन सामान्य के सामने प्रस्तुत किया। ताकि पुनः  समाज का  निर्माण हो सके। इन्होने वेदों को सरल, और जन साधारण की भाषा में लिखा। जो भाष्य कहलाए और द्वयपायन वेद व्यास कहलाने लगे । 

ऋग्वेद के नदी सूक्त के अनुसार यह पौराणिक नदी पंजाब के पर्वतीय भाग से निकलकर कुरुक्षेत्र और राजपूताना से होते हुए प्रयाग या इलाहाबाद आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर पुण्यतीर्थ त्रिवेणी कहलाती है। मान्यता है कि आज भी प्रयाग में यह अंत:सलिला है यानि धरती के  अंदर ही अंदर  बहती है।

वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समानांतर खुदाई में ५५००-४००० वर्ष पुराने शहर मिले हैं जिन में पीलीबंगा, कालीबंगा और लोथल भी हैं। यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित तथ्य को प्रमाणित करते हैं।

कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि भीषण भूकम्पों के कारण  सरस्वती लुप्त हुईं हैं। ऋग्वेद तथा अन्य पौराणिक वैदिक ग्रंथों में दिये सरस्वती नदी के सन्दर्भों के आधार पर कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि हरियाणा से राजस्थान होकर बहने वाली मौजूदा सूखी हुई घग्घर-हकरा नदी प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी की एक मुख्य सहायक नदी थी।

 

 

 

image from internet.

 

 

 

कोणार्क मंदिर -चमकते सूर्य और बोलते पत्थरों का काला पैगोड़ा ( यात्रा वृतांत और पौराणिक कथा )

          IMG-20150423-WA0001जब सूर्य या अर्क एक  विशेष समय पर, एक ख़ास कोण से उदित होते हैं।  तब  कोणार्क मंदिर मेँ एक दिव्य दृश्य दिखता है। लगता है जैसे सूर्य देव मंदिर के अंदर जगमगा रहें है। शायद  इसलिए यह  मंदिर कोणार्क कहलाया । यहाँ सूर्य को बिरंचि-नारायण भी  कहा जाता है।  इसका काफी काम काले ग्रेनाईट पत्थरों से हुआ है।  इसलिए इसे काला पैगोड़ा भी कहा जाता है। 

पौराणिक मान्यता रही  है कि सूर्य की किरणों में अनेक रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं विशेष कर त्वचा रोग  के उपचार के लिए प्राचीन काल से सूर्य उपासना प्रचलित था। आज भी छठ पूजा और अन्य सूर्य उपासनाएँ प्रचलित है।

 आज, आधुनिक  विज्ञान ने भी सूर्य के किरणों के महत्व को  स्वीकार किया  है।  किवदंती है कि कृष्ण- पुत्र   साम्ब  कोढ़ग्रस्त    हो गए। तब सांब ने  मित्रवन में चंद्रभागा   नदी और  सागर के  संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की। सूर्य देव ने  प्रसन्न हो कर  सांब के  रोगों का  नाश  किया। 

तब साम्ब  चंद्रभागा  नदी में स्नान करने गए । वहाँ  उन्हें  सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली।  मान्यता है कि इस  मूर्ति  के रचनाकर देव शिल्पी   विश्वकर्मा स्वयं  थे। उन्होने  सूर्यदेव के शरीर के तेज़ से   इस मूर्ति का  निर्माण किया  था। साम्ब ने “कोणार्क सूर्य   मंदिर’ बनवा कर इस मूर्ति की वहाँ  स्थापना किया।

यह मंदिर एक  रथ रूप में बना है। जिसे सात घोड़े  खींच  रहें हैं।यह  अद्वितीय सुंदरता और शोभामय शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण उत्कृष्ट मंदिर  है। यह  मनमोहक  स्थापत्यकला का उदाहरण है। पत्थर पर जीवंत  भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र उकेरे हुए हैं।यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है, जिन्हे कामसूत्र  से लिया गया  है।।ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहतें हैं। इस मंदिर में इसी कल्पना को मूर्त रूप में उतारा  गया है।

इस मंदिर के निर्माण कला को कलिंग शैली कहा गया है। यह  पूरा मंदिर अर्क या सूर्य के रथ के रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं। इस मंदिर में  बड़े दिलचस्प तरीके से पहर और महीनों का चित्रण किया गया है। रथ के बारह पहिये/ चक्के या चक्र  लाजवाब नक्कासी से पूर्ण हैं। ये बारह चक्र वर्ष के  बारह महीनों के प्रतीक हैं। इन चक्कों में   आठ अर हैं , जो दिन के  आठ प्रहर के सूचक हैं। आधुनिक घड़ी के उपयोग में आने से पहले तक दिन के समय की पहचान पहर/प्रहर के आधार पर होती थी। आज भी हम दिन के दूसरे प्रहर को आम बोलचाल में दोपहर कहते हैं। इस रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं ।

 कोणार्क  मंदिर युनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व धरोहर है। यह भारत के उड़ीसा राज्य में, पूरी में स्थित  है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 1236 से 1264 के दौरान निर्मित हुआ है। गंग वंश के राजा नृसिंह देव ने इसका निर्माण  करवाया था। इसके निर्माण में काले  ग्रेनाईट पत्थरों का बहुलता से  उपयोग हुआ है। साथ ही लाल बलुआ पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ है। मान्यता हैं कि इसमे दधिनौती या गुम्बज पर एक विशाल चुम्बक लगा था. जिसकी सहायता से इस के अंदर सूर्य की हीराजटित मूर्ति हवा में लटकी रहती थी. विदेशी लुटेरों ने चुम्बक निकाल लिया, जिस से मंदिर ध्वस्त होने लगा. एक मान्यता यह भी हैं कि इस चुम्बक से समुद्र से गुजरने बाले जहाजों के दिशा यंत्र काम करना बंद कर देते थे.

  आज मंदिर का बहुत भाग ध्वस्त हो चुका है। पर इस खंडित और ध्वस्त  मंदिर के सौंदर्य से अभिभूत हो नोबल पुरस्कार प्राप्त कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कभी कहा था-

        “कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।”

कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

                                                                  क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

दिनांक – 9.2.2015, मंगलवार। समय संध्या 4:15
आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

                      ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

                      कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
                    कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

                                       कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
                                     त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती