जिंदगी के रंग -37 

तेज हवा में झोंके में झूमते ताजे खिले गुलाब 

की पंखुड़ियॉं  झड़ झड़ कर बिखरते देख पूछा –

नाराज नहीँ हो निर्दयी हवा के झोंके से ?

फूल ने कहा यह तो काल चक्र हैँ

 आना – जाना,  खिलना – बिखरना 

नियंता …ईश्वर…. के हाथों में हैँ

 ना की इस अल्हड़ नादान  हवा के  झोंके के वश में 

 फ़िर इससे कैसी  नाराजगी ? ? 

मौसम

हमारे अंदर भी  क्या बदलते मौसम हैं ?

क्या कभी  बसंत अौर कभी पतझङ  होते हैं ?

कभी कभी सुनाई देती है  गिरते पत्तों की उदास सरसराहट

या शरद की हिम शीतल खामोशियाँ

अौर कभी बसंत के खिलते फूलों की खुशबू….

ऋतुअों अौर मन का यह  रहस्य

बङा अबूझ है………

 

 

सूरज धुल कर चाँद

 

कशमकश में दिवस बीत गया….

सूरज धुल कर चाँद हो गया।

तब

आसमान के झिलमिलाते सितारों ने कहा –

हौसला रखो अौर आसमान चुमने की कोशिश करो।

क्योकिं अगर

उतना ऊपर ना भी पहुँच सके,

तब भी हम सितारों तक 

 तो जरुर पहुँच जाअोगे!!!

इम्तहान

 

जिंदगी के सफर में

सारे इम्तहान हमारे हीं हिस्से क्यों?

नतीज़े आये  ना आये ,

 अगला पर्चा शुरु हो जाता है

पत्थर

 

हम गलते-पीघलते नहीं ,
इसलिये 
पत्थर या पाषण कहते हो,
पर खास बात हैं कि
हम पल-पल बदलते नहीं।
अौर तो अौर, हम से
लगी ठोकरें क्या
तुम्हें कम सबक सिखाती हैं??

 

आईना

 

आईना भी इस नासमझी पर

खुद से माफी नहीं मागँने देता।

कि खुद को दर्द क्यों पहुँचाना?

जमाना बैठा है इस काम के लिये।